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‘कूर्म पीठ’ पर बना शक्तिपीठ, कच्छप मरने से पहले लेते हैं माँ का आशीर्वाद: जानें माता त्रिपुरसुंदरी मंदिर के कछुए क्यों हैं खास, अनुष्ठानों में भी विशेष महत्व

त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ का कछुओं से काफी गहरा संबंध है। ये शक्तिपीठ ऐसा लगता है मानो कछुए के पीठ पर स्थित हो। वहीँ पास के कल्याण सागर झील में दुर्लभ बोस्तामी कछुए बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। इनका आध्यात्मिक रूप से काफी महत्व है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुनर्निर्मित त्रिपुरसुंदरी मंदिर का उद्घाटन 22 सितंबर 2025 को किया। 51 शक्तिपीठों में शामिल देवी त्रिपुरीश्वरी का यह मंदिर अपनी दिव्यता, तांत्रिक साधना के लिए जाना जाता है। राज्य के गोमती जिले के उदयपुर शहर में यह स्थित है और कछुओं से इसका संबंध काफी दिलचस्प है।

महाराजा धन्य माणिक्य ने मंदिर की स्थापना 1501 ई. में की थी। 524 साल पुराना यह मंदिर एक छोटी पहाड़ी की चोटी पर बना है, जो कछुए की पीठ जैसी दिखती है। इसीलिए त्रिपुरसुंदरी मंदिर को कूर्म पीठ (कूर्म का अर्थ कछुआ होता है) के नाम से भी जाना जाता है।

शक्तिपीठ मंदिर के बगल में कल्याण सागर झील है। इस कृत्रिम झील में दुर्लभ बोस्तामी कछुओं का घर है। इससे झील की खूबसूरती बढ़ गई है।

बोस्तामी कछुआ विलुप्त जीव माना जाता है, लेकिन त्रिपुरसुंदरी मंदिर (जिसे उदयपुर माताबाड़ी भी कहा जाता है) के परिसर में ये आसानी से दिख जाएँगे।

ये आकार में बड़े होते हैं और अक्सर मीठे पानी की झील के किनारे तक आ जाते हैं। शक्तिपीठ में आने वाले भक्त अनुष्ठान के रूप में बोस्तामी कछुओं को ब्रेड क्रम्ब्स, बिस्कुट और मुरमुरे खिलाते हैं।

2.75 एकड़ में फैले इस झील में मछली पकड़ना और कछुओं को बाहर निकालना सख्त मना है। त्रिपुरसुंदरी मंदिर के बगल में होने की वजह से कल्याण सागर झील को भी पवित्र माना जाता है।

यह आस्था, विरासत और जैव विविधता के बीच के अनोखे संबंध को भी दर्शाता है। कल्याण सागर और बोस्तामी कछुए की परंपरा और एक-दूसरे पर निर्भरता देखने लायक है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रेंगने वाले जीव अपनी मृत्यु से पहले त्रिपुरसुंदरी मंदिर के चरणों में जाते हैं और देवी का आशीर्वाद लेते हैं।

बोस्तामी कछुओं की देखभाल माताबारी मंदिर समिति द्वारा की जाती है।

त्रिपुरा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएसपीसीबी) ने झील के पास प्लास्टिक बैग न ले जाने को लेकर सख्त हिदायत दी है। बोर्ड समय-समय पर झील के पानी की गुणवत्ता की जाँच भी करता है।

झील में बोस्तामी कछुओं की एक अच्छी आबादी हो गई है। ये दुर्लभ सरीसृप त्रिपुरसुंदरी मंदिर के आध्यात्मिक पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न अंग हैं।

हिंदू धर्म में आस्था और प्रकृति का गहरा तालमेल देखने को मिलता है। शक्तिपीठ में बोस्तामी कछुओं की मौजूदगी और लोगों की श्रद्धा अनोखे आध्यात्मिक संबंध को भी उजागर करता है।

बीजेपी के नेतृत्व वाली त्रिपुरा सरकार ने हाल के वर्षों में पवित्र कछुओं के संरक्षण के लिए काफी प्रयास किए हैं।

सरकार ने वैश्विक संरक्षण संगठन, टर्टल सर्वाइवल अलायंस के साथ मिलकर इसका वैज्ञानिक अध्ययन भी शुरू किया है।

एक साल के इस कार्यक्रम का उद्देश्य कछुओं की पूरी आबादी की गणना करना, उनके स्वास्थ्य का आकलन करना और दीर्घकालिक संरक्षण रणनीतियाँ तैयार करना है। कल्याण सागर की पवित्रता बनाए रखने के लिए श्रद्धालुओं के बीच जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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