Sunday, June 23, 2024
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’83’ में Pak फ़ौज ‘अच्छी’, ‘बजरंगी भाईजान’ में वहाँ के मौलवी ‘बहुत अच्छे’: कट्टर इस्लामी टीम के पुराने बल्लेबाज हैं कबीर खान, नोटिस किया?

हाल ही में रिलीज हुई फिल्म '83' में दिखाया गया है कि भारतीय सेना के निवेदन पर पाकस्तानी फौजी सीमा पर गोलीबारी रोक देते हैं, ताकि भारतीय सैनिक शांति से स्कोर सुन सकें। जबकि सच्चाई ये है कि जून 2019 में जब पाकिस्तान ने विश्व कप मैच में पाकिस्तान को हराया था, तो उस दिन भी पाकिस्तानी फ़ौज ने सीजफायर का उल्लंघन किया था।

दिसंबर 2021 में रिलीज हुई फिल्म ’83’ का निर्देशन कबीर खान ने किया है। इस फिल्म में जिस तरह से पाकिस्तान और उसकी फ़ौज का महिमामंडन किया गया है और ‘अच्छा मुस्लिम’ वाले कॉन्सेप्ट को आगे बढ़ाया गया है। वैसे ये सब नया नहीं है, क्योंकि बॉलीवुड सलीम-जावेद के जमाने से ही इस तरह के हिन्दूफोबिया भरे प्रोपेगंडा में लगा हुआ है। अब कबीर खान जैसे फिल्म निर्देशक इसी धारा की अगली उपज हैं, जो हिन्दू विरोधी दृश्यों के माध्यम से हिन्दू धर्म को बदनाम करने में लगे हुए हैं।

असल में पीला उसकी बात करते हैं, जो कबीर खान की सबसे बड़ी फिल्म है। 2015 में आई ‘बजरंगी भाईजान’ उस समय तक की सबसे ज्यादा चलने वाली फिल्मों में से एक थी और बाद में चीन में भी रिलीज होकर इसने अच्छा कारोबार किया। इसके बाद फिल्म को चीन में रिलीज किया गया, जहाँ ये बड़ी हिट रही। आमिर खान ने चीन में जो बाजार बनाया है, उसका खान तिकड़ी की फायदा बाकी भारतीय फिल्मों को भी मिलता रहा है। लेकिन, हनुमान जी के नाम पर बनाई गई इस फिल्म में हिन्दुओं के विरोध में काफी कुछ दिखाया गया।

उदाहरण के लिए कुछ दृश्यों को लेते हैं। ‘बजरंगी भाईजान’ में सलमान खान ने पवन कुमार चतुर्वेदी नाम के एक ब्राह्मण का किरदार निभाया है, जो शुद्ध शाकाहारी है और साथ ही हनुमान जी का एक बड़ा भक्त भी। हिन्दू, और उसमें भी खासकर ब्राह्मण मिल जाए तो बॉलीवुड के लिए काम आसान हो जाता है। उन्हें जितना भी बदनाम किया जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें न विरोध का भय होता है, न उनकी भावनाओं का। इसीलिए, इस फिल्म में भी एक छोटी सी मुस्लिम लड़की का किरदार है, जो पीड़ित है।

सलमान खान जब उस लड़की से मिलते हैं तो उन्हें उसे मांस-मछली खिलाना होता है, जबकि वो खुद शुद्ध शाकाहारी होते हैं। साथ ही उन्हें मस्जिद में जाना होता है, क्योंकि वो लड़की नमाज पढ़ती है। उस लड़की को देह व्यापार में धकेलने वाली एक हिन्दू वेशभूषा वाली महिला होती है। जबकि सीमा पर पाकिस्तानी फ़ौज काफी दयावान होती है, जो ‘बजरंगी भाईजान’ को नेक कार्य के लिए पाकिस्तान में जाने देती है। वहाँ एक मौलवी मिलता है, जो अपनी जान पर खेल कर इन दोनों की जान बचाता है।

इसके अलावा एक पत्रकार मिलता है। वो भी अपनी जान जोखिम में डाल कर भारतीयों की मदद करता है। क्या आपने कभी वास्तविकता में पाकिस्तानी मौलवियों को ऐसा करते देखा है? असल में वहाँ के मस्जिदों में लड़कियों को सिर कलम करने की ट्रेनिंग दी जाती है। मौलवी ईशनिंदा का केस करा देते हैं। वहाँ के क्रिकेटर तक ‘गजवा-ए-हिन्द’ का समर्थन करते हुए जिहाद फैलाते हैं। किसी महिला को ‘हूर’ बना कर प्रदर्शनी लगाई जाती है। जबरन धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनता है तो मुल्ला-मौलवी इसके विरोध में सड़क पर उतर आते हैं। मदरसे में रेप होता है। कहीं अब्बा मौलवी ही अपनी बेटियों का रेप करता है।

लेकिन, कबीर खान की फिल्म में सारे पाकिस्तानी अच्छे होते हैं। वहाँ का मौलवी पुलिसकर्मियों से पंगा लेकर भारतीय नागरिकों को बचाता है। वहाँ का पत्रकार कॉमेडी करता है और सीधा-सादा होता है। जबकि वास्तविकता में सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी पत्रकार भारत के खिलाफ ज़हर उगलते नहीं थकते। इसका सीधा अर्थ है कि कबीर खान पाकिस्तान का प्रोपेगंडा आगे बढ़ा रहे हैं। इस्लामी कट्टरवादी सोच को हवा दे रहे हैं। साथ ही वो हिन्दुओं को तो नीचा दिखा ही रहे हैं।

जिन पाकिस्तानी फौजियों के कारण कई भारतीय नागरिकों और सैनिकों की जान गई है, लेकिन कबीर खान की फिल्म में वो मानवता के प्रतीक होता हैं – एकदम उलटा। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ’83’ में दिखाया गया है कि भारतीय सेना के निवेदन पर पाकस्तानी फौजी सीमा पर गोलीबारी रोक देते हैं, ताकि भारतीय सैनिक शांति से स्कोर सुन सकें। जबकि सच्चाई ये है कि जून 2019 में जब पाकिस्तान ने विश्व कप मैच में पाकिस्तान को हराया था, तो उस दिन भी पाकिस्तानी फ़ौज ने सीजफायर का उल्लंघन किया था।

इसके अलावा ’83’ में एक ‘अच्छा मुस्लिम’ भी है, जो बुजुर्ग है और इस्लामी टोपी पहनता है। वो भारत का मैच देखने के लिए इतना बेचैन होता है कि कर्फ्यू के दौरान भी पुलिसकर्मियों से छिप कर अपना एंटीना ठीक करता है। जीत के जश्न में आगे बढ़ कर शामिल होता है। जबकि वास्तविकता ये है कि कई मुस्लिम बहुल इलाकों में हालिया T20 विश्व कप में पाकिस्तान के हाथों भारत की हार के बाद पटाखे छोड़े गए। लिबरल जमात ने इसे ‘करवा चौथ के पटाखे’ बता कर ख़ारिज किया। कबीर खान ने ऐसी घटनाओं को छिपाने के लिए ’83’ के सहारे कहानी रची।

इसी तरह 2009 में कबीर खान की एक फिल्म आई थी ‘न्यूयॉर्क’, जिसमें आतंकवादियों को ही पीड़ित दिखा दिया गया था। इसी तरह उनकी फिल्म ‘काबुल एक्सप्रेस’ में ‘देखा खुदा कैसे तुझे बनाया काफिर से इंसान’ जैसे गानों के सहारे सलामी कट्टरपंथी सोच को आगे बढ़ाया गया है। कबीर खान की अगली फिल्म का नाम ‘पवन पुत्र भाईजान’ हो सकता है, जिसमें सलमान खान ही अभिनेता होंगे। हनुमान जी के नाम से एक बार फिर से हिन्दू विरोधी प्रोपेगंडा चलेगा।

फिल्मों में ही नहीं, वास्तविकता में भी कबीर खान ऐसे ही बयान देते रहते हैं। हाल ही में उन्होंने मुगलों को भारत का निर्माता करार दिया। उन मुगलों को, जो हिन्दुओं के नरसंहार और मंदिरों को ध्वस्त करने के लिए कुख्यात रहे हैं। फिल्म के माध्यम से आतंकवादियों के साथ सहानुभूति पैदा करना और मीडिया के माध्यम से इस्लामी आक्रांताओं का गुणगान – यही कबीर खान का काम है। भारतीयों की हत्या में मजे लेने वाली पाकिस्तानी फ़ौज का महिमामंडन भी वो करते रहे हैं।

अपनी फिल्म ‘काबुल एक्सप्रेस’ में तो उन्होंने पाकिस्तानी अभिनेता सलमान शाहिद को बतौर अभिनेता लिया था। उन्होंने अपनी फिल्म ‘फैंटम’ में भले ही प्लॉट आतंकवादियों के सफाए का रखा हो, लेकिन उसमें भी मुख्य किरदार एक भारतीय पुलिस अधिकारी मुस्लिम ही होता है और उसके नाम में ‘खान’ होता है। इसी तरह ‘ट्यूबलाइट’ के जरिए चीन के प्रति सहानुभूति बनाने की कोशिश की गई है। एक चीन की युवती को पीड़ित बता कर फिल्म की कहानी रची गई है।

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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