Wednesday, August 12, 2020
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ब्रिटिशर्स के खिलाफ सशस्त्र आदिवासी विद्रोह के नायक थे अल्लूरी सीताराम राजू: आज जिनकी जयंती है

मात्र 27 साल की उम्र में ही अल्लूरी सीताराम राजू वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन इससे पहले उन्होंने मान्यम क्षेत्र में ब्रिटिश साम्राज्य को बड़ी चुनौती दी। अफसोस की बात है कि सीताराम राजू को राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस से कभी भी कोई समर्थन नहीं मिला। बजाए समर्थन के, उन्होंने ब्रिटिशर्स द्वारा रामपा विद्रोह का दमन और राजू की हत्या का स्वागत किया।

आज आदिवासी समाज को विदेशी सत्ता के दमनकारी शासन के खिलाफ एकजुट करने वाले दक्षिण भारत के महान क्रांतिकारी अल्लुरी सीताराम राजू ( Alluri Sitarama Raju) की जयंती है। राजू ने 1921 के असहयोग आंदोलन के बाद ब्रिटिश विरोधी भावना पर जोर दिया और बाद में क्षेत्र में स्थित औपनिवेशिक ताकतों और उनके सहयोगियों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का आह्वान किया।

अल्लूरी को सबसे अधिक अंग्रेजों के खिलाफ रम्पा विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने ब्रिटिशर्स के खिलाफ विद्रोह करने के लिए विशाखापट्टनम और पूर्वी गोदावरी जिलों के आदिवासी लोगों को संगठित किया था।

सशस्त्र क्रांतिकारी बनने से पहले, अल्लुरी सीताराम राजू ने असहयोग और सविनय अवज्ञा के गाँधीवादी तरीकों का प्रयोग करते हुए 1882 वन अधिनियम के निरसन का प्रयास किया था। उन्होंने आदिवासी आबादी से वन उपयोग के अधिकार को जब्त करने के विरोध में 1922 में रम्पा विद्रोह (Rampa Rebellion) की शुरुआत की।

रम्पा विद्रोह 1922 और 1924 के बीच लड़ा गया था। अल्लुरी और उनके लोगों ने कई पुलिस स्टेशनों पर हमला किया और कई ब्रिटिश अधिकारियों को मार डाला और उनकी लड़ाई के लिए हथियार और गोला-बारूद चुरा लिया। लोगों ने उन्हें ‘मान्यम वीरुडू’ नाम से सम्मानित किया, जिसका अर्थ है- ‘जंगलों का नायक’।

1986 में, इंडिया पोस्ट ने अल्लूरी सीताराम राजू के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया
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अल्लूरी सीताराम राजू भारत के आदिवासी क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ हथियार उठा लिए थे। राजू के विद्रोह का मुख्य कारण 1882 का मद्रास वन अधिनियम था, जिसने संसाधनों के इस्तेमाल करने से वनवासियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। विद्रोह बाद में क्षेत्र में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ पूर्ण सशस्त्र संघर्ष में बदल गया।

आज सबसे महान भारतीय क्रांतिकारियों में से एक, अल्लूरी सीता राम राजू की जयंती है, जिन्होंने महज 27 की उम्र में सीमित संसाधनों के साथ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया और गरीब, अनपढ़ आदिवासियों को शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ प्रेरित किया।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कुछ ऐसे महान किन्तु उपेक्षित आंदोलनों में से एक ब्रिटिश शासन के खिलाफ विभिन्न आदिवासी विद्रोह थे। दरअसल, इस कानून के जरिए आदिवासियों को जलावन लकड़ी के लिए पेड़ काटने से मना कर दिया गया था, उनकी पारंपरिक पोडू की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

आदिवासियों का अक्सर उन ठेकेदारों द्वारा शोषण किया जाता था, जो उन क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण के लिए श्रम के रूप में उनका इस्तेमाल करते थे। पूर्वी भारत के आदिवासी इलाकों में कई विरोध प्रदर्शन हुए, विशेष रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिमी ओडिशा, बंगाल में। इनमें से जो सबसे प्रसिद्ध थे वह थे बिरसा मुंडा!

अल्लूरी सीताराम राजू के बारे में ट्विटर पर ‘हिस्ट्री अंडर युअर फ़ीट’ एकाउंट ने विस्तार से लिखा है –

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को कवर करने वाला एजेंसी क्षेत्र, पूर्वी घाट के साथ ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र की सीमा से लगे दोनों राज्यों के उत्तरी भागों के आदिवासी इलाकों को दिया गया नाम है।

आंध्र प्रदेश में विजाग, विजयनगरम, श्रीकाकुलम, पूर्व और पश्चिम गोदावरी, और तेलंगाना के खम्मम, वारंगल, आदिलाबाद, करीमनगर के जिलों को कवर करने वाला एक विशाल क्षेत्र है, जहाँ पहाड़ियों, घाटियों, घने जंगलों के बीच आदिवासी रहते हैं।

1882 का दमनकारी मद्रास वन अधिनियम, इस एजेंसी क्षेत्र के आदिवासियों के लिए एक अभिशाप था, जिन्हें जलाऊ लकड़ी के लिए पेड़ों को काटने और उनके पारंपरिक व्यवसायों को करने से रोक दिया गया था।

ऐसे समय में, अल्लूरी सीताराम राजू एजेंसी क्षेत्र में आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने के लिए सामने आए, और उन्हें सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित किया। मात्र 27 वर्ष की अल्पायु में, वह सीमित संसाधनों के साथ सशस्त्र विद्रोह को बढ़ावा देने और गरीबों, अंग्रेजों के खिलाफ अनपढ़ आदिवासी को प्रेरित करने में कामयाब रहे।

4 जुलाई का दिन था, जब अमेरिका ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र हो गया। उसी वर्ष रामाराजू का जन्म 1897 में विशाखापत्तनम जिले के पांडरंगी में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज मूल रूप से पूर्वी गोदावरी जिले के राजोलु से थे।

उनके माता-पिता वेंकटरामा राजू और सूर्यनारायणम्मा, मूल रूप से पश्चिम गोदावरी जिले के मोगल्लू के रहने वाले थे। उनकी एक बहन सीताम्मा और एक भाई सत्यनारायण राजू थे। उनका असली नाम श्रीरामराजू था, जो कि उनके नाना के नाम पर था।

जब राजू सिर्फ 6 साल के थे, तभी उन्होंने अपने पिता को खो दिया और आर्थिक कठिनाइयों के कारण उसके परिवार को बहुत नुकसान उठाना पड़ा था। उनके चाचा रामकृष्ण राजू ने परिवार की आर्थिक मदद करने के साथ-साथ राजू की शिक्षा में भी मदद की।

1909 में वे भीमावरम में मिशन हाई स्कूल में शामिल हो गए जहाँ वो कोवाड़ा से रोजाना पैदल ही जाते। उन्होंने अपने दोस्त से चिनचिनदा से नरसापुर के पास एक छोटे से गाँव में घुड़सवारी सीखी। उन्होंने बाद में राजमुंदरी, रामपचोदावरम, काकीनाडा के विभिन्न स्कूलों में अध्ययन किया।

वर्ष 1918 में, जब उनका परिवार तुनी में रहता था, राजू पास की पहाड़ियों, घाटियों का दौरा करते थे, जहाँ वह वहाँ रहने वाले आदिवासियों के संपर्क में आते थे, और उनकी स्थिति देखते थे।

कम उम्र से ही उनके मन में राष्ट्रवादी भावनाएँ थीं, और वे ईश्वर पर गहरा विश्वास करते थे। वह नियमित रूप से देवी पूजा करते, साथ ही लंबे समय तक ध्यान में बिताते थे।

विशाखापत्तनम जिले में अल्लूरी सीताराम राजू की मूर्ति

उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब वे 1916 में उत्तर के दौरे पर गए। वह कुछ समय के लिए सुरेंद्रनाथ बनर्जी के साथ रहे, और लखनऊ में कॉन्ग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया। उन्होंने वाराणसी प्रवास के दौरान संस्कृत सीखी, उज्जैन, हरिद्वार, इंदौर, बड़ौदा, अमृतसर भी गए।

यह उनके लिए सीखने का दौर था, जब उन्होंने दवा, पशु प्रजनन पर किताबें पढ़ीं, और इन विषयों पर खुद भी लिखने लगे। 1918 में वह फिर एक बार उत्तर भारत के दौरे पर गए। इस बार कृष्णादेवी पेटा लौटने से पहलेउन्होंने नासिक, पुणे, मुंबई, बस्तर, मैसूर का दौरा किया।

विभिन्न मार्शल आर्ट, आयुर्वेद में अपने कौशल के साथ, राजू तुनी, नरसीपट्टनम के आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए एक नेता और प्रेरणास्रोत बन गया। उन्होंने मान्याम क्षेत्र में आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ाई शुरू की, और शराबबंदी, जातिवाद के खिलाफ भी अभियान चलाया।

बहुत से आदिम क्षेत्र में आदिवासियों की दयनीय दशा थी। इन सभी जगहों पर अंग्रेज हर प्रकार का शोषण क्र रहे थे। आदिवासियों का प्रयोग मजदूरों के रूप में किया जाता था, उनकी भूमि पर कब्जा कर लिया जाता था और उनकी महिलाओं का भी यौन शोषण किया जाता था।

उन्होंने पोडू (खेती को स्थानांतरित करने) और वन उपज बेचने के लिए लोगों का जीवन नारकीय बना दिया था और औपनिवेशिक शोषण ने आदिवासियों की हालत और भी बदतर बना दी। ठेकेदारों के सहयोग से, आदिवासियों को सड़कों के निर्माण के लिए कुली के रूप में काम करवाया जाता, और बदले में उनकी सेवाओं के लिए भुगतान भी नहीं किया जाता था।

ठेकेदार आदिवासियों के साथ गुलामों की तरह व्यवहार करते, उन्हें कड़ी मेहनत करने पर विवश करते, उन्हें भुगतान नहीं करते, और निर्दयता से मारते थे। आदिवासियों को ठेकेदारों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए इस्तेमाल किया गया, उनकी महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया जाता रहा। यह सब देखना राजू के लिए वास्तव में दयनीय और कष्टदायक था।

आदिवासियों के दुख और शोषण को देखते हुए, उन्होंने आदिवासियों के साथ खड़े होने और उनके अधिकारों के लिए लड़ने का फैसला किया। उन्होंने उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करना शुरू किया। उनके साहस और दृढ़ संकल्प को प्रभावित किया और उन्हें उनके साथ हुए अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया।

बदले में आदिवासियों ने मार्गदर्शन और सलाह के लिए उसकी ओर रुख किया और वह जल्द ही वहाँ के 30-40 आदिवासी गाँवों के लिए एक नेता बन गया। उसने उन्हें ताड़ी (स्थानीय शराब) पीने की आदत छोड़ने की राय दी, उन्हें गुरिल्ला युद्ध और युद्ध अभ्यास सिखाए।

गामा बंधु गैंटम डोरा और मल्लू डोरा, कांकिपति पडालु, अगीराजू उनके कुछ भरोसेमंद ‘लेफ्टिनेंट’ बन गए। यह सब देख बस्तियन, चिंतपूर्णी डिवीजन के तहसीलदार (अब विजाग जिले में) सभी ब्रिटिश अधिकारियों में से सबसे ज्यादा नाराज थे।

वह नरसीपट्टनम से लाम्बासिंगी तक सड़क के निर्माण के लिए इस्तेमाल की जाने वाली आदिवासी कूलियों के शोषण के लिए कुख्यात था। अधिक वेतन की माँग करने वाले आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया जाता था। उच्च अधिकारियों से इस बारे में राजू ने शिकायतें की लेकिन उनकी एक भी नहीं सुनी गई।

बदले में अधिकारियों ने बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों की भनक लगी। जिस कारण नरसीपट्टनम, अडेटेगैला में राजू की जासूसी शुरू कर दी गईं और कुछ समय तक राजू को पकड़े जाने के भय से निर्वासन में रहना पड़ा।

राजू ने एक बार फिर 1922 में फाजुल्ला खान की मदद से मानतम क्षेत्र में प्रवेश किया। फजुल्ला खान पोलावरम के उप-शासक थे जो कि आदिवासियों से सहानुभूति रखते थे। 2 साल के करीब, राजू अंग्रेजों के खिलाफ सबसे भयानक विद्रोह का नेतृत्व करते रहे और उन्होंने अंग्रेजों की नींव हिलाकर रख दी।

मल्लू डोरा, गैंटम डोरा, पडालु, अगीराजू के साथ, वह अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में वे लगभग 150 सेनानियों की एक टीम का नेतृत्व कर रहे थे। अगस्त 22, 1922- मान्यम विद्रोह (Manyam rebellion) अल्लूरी सीताराम राजू ने शुरू किया था, जिसमें रामपछोड़ावरम एजेंसी में चिंतपल्ली पुलिस स्टेशन पर पहला हमला किया गया।

300 विद्रोहियों के साथ, राजू ने स्टेशन पर हमला किया। वहाँ मौजूद अभिलेखों को फाड़ दिया, और हथियारों और गोला-बारूद को वहाँ से हटा दिया। 11 बंदूकें, 5 तलवारें, 1390 कारतूस वहाँ से निकाल लिए गए थे। यह जानकारी खुद अल्लूरी सीताराम राजू ने व्यक्तिगत रूप से रजिस्टर में दर्ज की थी।

यह गुरिल्ला हमले बढ़ते गए। इसके बाद कृष्णदेवपेट्टा पर अगला हमला हुआ और वहाँ से हथियार ले लिए गए। 24 अगस्त को, राजवोमाँझी पर हमला किया गया था, और वहाँ की पुलिस के कुछ प्रतिरोध के बाद उसे काबू कर लिया गया था। वेरय्या डोरा, जो कि वहाँ एक कैदी था, उसे मुक्त कर दिया गया और वह भी राजू के साथ विद्रोह में जुड़ गया।

अंग्रेजों ने कैबार्ड और हैटर (Cabard and Haiter) को वापस भेज दिया, जिन्होंने राजू और उसके सहयोगियों के साथ चिंतपल्ली क्षेत्र में हमले करने शुरू कर दिए थे। इसका नतीजा यह हुआ कि राजू द्वारा किए गए छापामार हमले में वे दोनों मारे गए, और पार्टी के बाकी सदस्यों को पीछे हटना पड़ा।

जनता अब इस जीत के साथ पूरी तरह से राजू और उनकी क्रांतिकारियों की टीम के समर्थन में आ गई थी। राजू द्वारा किए गए कुछ सबसे साहसिक हमले में से एक अट्टेतेगला पुलिस स्टेशन (Addateegala police station) पर किया गया हमला था, जिस पर अंग्रेजों द्वारा कड़ी सुरक्षा का बन्दोबस्त किया गया था।

राजू ने अपने साथियों के साथ इस स्टेशन पर हमला किया और वहाँ की पुलिस पर हावी हो गए। उन्होंने सभी हथियार छीन लिए। यह मनम क्षेत्र में ब्रिटिश आधिपत्य के लिए बहुत बड़ा आघात था।

रामपचोड़वरम पुलिस स्टेशन पर 19 अक्टूबर को हमला किया गया था, और इसे खत्म करने के बाद, वहाँ के लोग राजू को बधाई देने के लिए भारी संख्या में बाहर निकले। अल्लूरी सीताराम राजू अब तक मनम में एक लोक नायक बन गए थे।

वह अब अंग्रेजों के लिए टेढ़ी खीर बन गए थे। यही वजह थी कि उन्हें पकड़ने के लिए सांडर्स को कमान सौंपी गई और बड़े सैन्य बल के साथ सांडर्स के नेतृत्व में भेजा गया। इस लड़ाई में राजू ने इन सेनाओं को हराया और सांडर्स को मुँह की खानी पड़ी।

जब भी राजू और उनके साथ किसी भारतीय पुलिसकर्मियों को पकड़ते तो वे उन्हें मारते नहीं बल्कि उन्हें जाने के लिए कहते। हालाँकि, अंग्रेजों ने इसके बाद जासूसों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया और साथ ही राजू के कुछ साथियों को भी लालच दिया, जिन्हें राजू को पकड़ने का प्रलोभन दिया जाता था।

राजू को पहला झटका दिसंबर 06, 1922 को लगा, जब पेद्दागडेपलेम में एक लड़ाई में अंग्रेजों ने अपनी सेना के साथ तोपों का इस्तेमाल किया। उस लड़ाई में राजू के करीबियों में से 4 की मौत हो गई, और अंग्रेजों के सेना ने कुछ हथियारों पर कब्जा कर लिया।

एक और छापे में ब्रिटिश सेना के द्वारा राजू के 8 और लोग भी मारे गए। कुछ समय के लिए यह अफवाह भी फैली थी कि राजू की भी मृत्यु हो गई है, लेकिन अफवाहों के बावजूद भी अंग्रेज उन पर नज़र रखते थे।

आख़िरकार अप्रैल 17, 1923 को राजू को फिर से अन्नवरम में देखा गया, जहाँ लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया। राजू को पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार पहले से कहीं अधिक दृढ़ थी। उन्हें पकड़ने के लिए जासूसों का इस्तेमाल किया गया। राजू और उनके समर्थकों पर नज़र रखने वाले लोगों के बीच नियमित झड़पें होने लगीं।

इसी क्रम में राजू के भरोसेमंद लेफ्टिनेंट मल्लू डोरा को पकड़ लिया गया। हालाँकि, अंग्रेज राजू के ठिकाने का पता नहीं लगा सके। उन्हें पकड़ने के लिए अब ब्रिटिश सैनिक आदिवासियों पर अत्याचार करने लगे और कहीं अधिक हिंसक हो गए थे।

मान्यम क्षेत्र में स्पेशल कमिश्नर रदरफोर्ड को राजू को पकड़ने के लिए नियुक्त किया गया। सशर्त विद्रोह के दमन के लिए रदरफोर्ड का खूब नाम था। राजू के सबसे बहादुर लेफ्टिनेंट में से एक अगीराजू को भीषण मुठभेड़ के बाद पकड़ लिया गया और अंडमान में भेज दिया गया।

रदरफोर्ड ने एक आदेश भेजा, कि यदि राजू ने एक हफ्ते में आत्मसमर्पण नहीं किया, तो मान्यम क्षेत्र के लोगों को सामूहिक रूप से मार दिया जाएगा। राजू उस समय मम्पा मुंसब के घर में रह रहे थे, और जब उन्हें पता चला कि आदिवासियों को उनके ठिकाने का पता लगाने के लिए परेशान किया जा रहा है, तो उनका दिल पिघल गया। वह नहीं चाहते थे कि आदिवासी उसकी खातिर पीड़ित हों और उन्होंने सरकार के सामने आत्मसमर्पण करने का फैसला किया।

लेकिन सरकार के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाए मई 07, 1924 को उन्होंने सरकार को एक सूचना भेजी, कि वह कोइयूर में हैं, और उन्हें वहाँ से गिरफ्तार करने के लिए कहा। मई 07, 1924 को राजू को पुलिस ने पकड़ लिया, और एक वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारी गुडाल ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। यह आत्मसमर्पण के बदले अंग्रेजों द्वारा किया गया स्पष्ट विश्वासघात था।

सशस्त्र संघर्ष के बाद चिंतपल्ली के जंगलों में ब्रिटिश सेना द्वारा राजू को पकड़ लिया गया। वह क्रूर तरीके से मारे गए, उनके शरीर को कोयुरी गाँव में एक पेड़ से बाँध दिया गया और उनपर गोलियाँ चलाकर उन्हें मारा गया। राजू का दुर्ग कृष्णा देवी पेटा गाँव में स्थित है।

चित्र साभार- सोशल मीडिया

मात्र 27 साल की उम्र में ही अल्लूरी सीताराम राजू वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन इससे पहले उन्होंने मान्यम क्षेत्र में ब्रिटिश साम्राज्य को बड़ी चुनौती दी। अफसोस की बात है कि सीताराम राजू को राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस से कभी भी कोई समर्थन नहीं मिला। बजाए समर्थन के, उन्होंने ब्रिटिशर्स द्वारा रामपा विद्रोह का दमन और राजू की हत्या का स्वागत किया।

स्वातंत्र्य साप्ताहिक पत्रिका ने यहाँ तक दावा किया कि अल्लूरी सीताराम राजू जैसे लोगों को मार दिया जाना चाहिए, और कृष्ण पत्रिका ने यहाँ तक कहा कि पुलिस को लोगों को क्रांतिकारियों से खुद को बचाने के लिए अधिक हथियार दिए जाने चाहिए।

यह अलग बात है कि उनकी मृत्यु के बाद उन्हीं पत्रिकाओं ने राजू की प्रशंसा ‘एक और शिवाजी’ और राणा प्रताप के रूप में की, जबकि सत्याग्रही ने उन्हें ‘एक और जॉर्ज वाशिंगटन’ कहा था।

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने राजू को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था – “मैं राष्ट्रीय आंदोलन के लिए अल्लूरी सीताराम राजू की सेवाओं की प्रशंसा करना अपना सौभाग्य मानता हूँ। भारत के युवाओं को उन्हें एक प्रेरणा के रूप में देखना चाहिए।”

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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