Thursday, October 29, 2020
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जब पैदा होते ही अपराधी घोषित हो जाते थे बच्चे… अंग्रेजों का वो कानून, जिसने 160 जनजातियों को हाशिए पर धकेला

इन्हें समाज से इतना अलग-थलग कर दिया और इतना ज्यादा प्रताड़ित किया गया कि ये मुख्यधारा से ही अलग हो गए। लगभग 6 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो इन जनजातीय समूहों का हिस्सा हैं। आज भी ये...

भारत में अंग्रेजों के काल को अंधकार युग के रूप में देखा जाता है क्योंकि यही वो समय था जब यहाँ के किसानों और लघु व्यवसायियों की कमर तोड़ डाली गई। अंग्रेजों ने आदिवासियों और जनजातियों को ही अपराधी घोषित कर दिया। इसके लिए अंग्रेजों द्वारा ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’ लाया गया। भारत में जितने भी संसाधन थे, जिनके इस्तेमाल से यहाँ के ग्रामीण फलते-फूलते थे, उन सब पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया।

कपड़ा उद्योग के मामले में भारत का कोई सानी न था। कहा जाता है कि इसे बर्बाद करने के लिए कई शिल्पकारों के अंगूठे तक काट डाले गए थे। किसानों से जबरदस्ती नील की खेती कराई जाती, जिससे अंग्रेजों को तो फायदा था, लेकिन कृषकों की जमीनें किसी लायक नहीं बचती थीं। देश के प्राकृतिक संसाधनों का जम कर दोहन किया गया। बीमारियाँ फैलती रहीं, महामारियों से लाखों लोग मरते रहें, अंग्रेज उनका शोषण करते रहे।

इसी क्रम में आज हम बात करेंगे अंग्रेजों के इसी ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’ की, जिसे कई क़ानूनों को मिला कर बनाया गया था। इसके तहत भारत की कई जनजातियों को ‘आदतन अपराधी’ घोषित कर दिया गया। इनमें से 160 संजातीय भारतीय समुदायों के लोगों के खिलाफ एक प्रकार का गैर-जमानती वॉरंट जारी कर दिया गया। उन्हें हर सप्ताह थाने में बुलाया जाने लगा। वो अपनी मर्जी से हिल-डुल भी नहीं सकते थे, उनकी गतिविधियों पर कुछ इस तरह से अतिक्रमण हुआ।

कैसे बना ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’?

दरअसल, अंग्रेजों ने ये सब पंजाब और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों से शुरू किया, जहाँ सबसे पहले कुछ जनजातियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। 19वीं शताब्दी के मध्य से ही घुमंतू या विमुक्त जनजातियों को प्रतिबंधित करने का सिलसिला चल निकला था। पुलिस ने इनकी गतिविधियों को सीमित कर रखा था और ब्रिटिश प्रशासन का कहना था कि इससे ‘काफी अच्छे परिणाम’ निकल कर सामने आ रहे हैं।

हालाँकि, अंग्रेजों के द्वारा ये तब शुरू हुईं जब 1860 के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस-प्रशासन की इन हरकतों को अवैध घोषित कर दिया। इसके बाद इन प्रांतों की सरकारें तत्कालीन भारत सरकार (ब्रिटिश सरकार) के पास पहुँचीं और उन्हें ऐसे क़ानून बनाने को कहा, जिससे न सिर्फ इन घुमंतू व विमुक्त जनजातियों की गतिविधियों पर लगाम लगे, बल्कि इसका उल्लंघन करना भी दंडनीय अपराध माना जाए।

फिर इस सम्बन्ध में क़ानून बनाने के लिए एक समिति का गठन किया गया लेकिन उस समिति ने कोर्ट द्वारा उठाई गई आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। कोर्ट की आपत्ति थी कि इससे पुलिस बेवजह लोगों को परेशान करेगी लेकिन अंग्रेजों ने कहा कि ‘अपराधी पुलिस को परेशान करें, इससे अच्छा है कि पुलिस से अपराधी परेशान हों’। साथ ही इस बात को भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि पहले से ही इसे लेकर कई क़ानून बने हुए थे।

इसके साथ ही इस क़ानून को बना कर इसे नॉर्थ-वेस्ट प्रोविंस के साथ-साथ अवध और पंजाब में लागू किया गया। जिन प्रक्रियाओं को कोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया था, उन्हें ही क़ानूनन सही बनाने के लिए एक तरह से इसका बिल ड्राफ्ट किया गया, और उसे एक्ट में बदला गया। जनजातीय समूहों के लोगों को पुलिस थाने जाकर खुद को रजिस्टर कराने का आदेश दिया गया। उन्हें पुलिसिया लाइसेंस के बिना गाँव से बाहर कहीं भी जाने से प्रतिबंधित कर दिया गया।

ये लाइसेंस भी जिले के कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित हुआ करता था। जब वो एक गाँव से दूर गाँव जाते थे तो रास्ते पर पड़ने वाली हर पुलिस चौकी पर उन्हें ये लाइसेंस दिखाने होते थे। रहने का गाँव बदलने के लिए भी पुलिस की अनुमति लेनी पड़ती थी। एक बार चेतावनी के बाद दोबारा अगर इन ‘आपराधिक जनजातीय समुदायों’ का कोई भी व्यक्ति बिना लाइसेंस के पाया जाता था तो उसे 3 साल तक की कड़ी जेल की सज़ा दिए जाने का प्रावधान था।

‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’: क्या था इस अत्याचारी क़ानून में?

यहाँ तक कि इस क़ानून में ज़मींदारों तक को नहीं बख्शा गया था। उन पर जिम्मेदारी डाल दी गई कि वो ‘क्रिमिनल ट्राइब्स’ के लोगों को चिह्नित कर उनका रजिस्ट्रेशन करवाएँ और उन्हें ढूँढ कर भी निकालें। फिर बाद में इसे मद्रास प्रान्त में लागू करने की ओर सरकार बढ़ी, जहाँ घुमंतू जनजातियों के पक्ष में प्रान्त के अधिकारियों के होने के बावजूद उनकी एक न सुनी गई। 1876 में इसे बंगाल में लागू किया गया और उसके बाद इन जनजातियों को एक ‘आपराधिक गैंग’ ही घोषित कर दिया गया।

असल में ब्रिटिश सरकार की दमनकारी आर्थिक नीतियों ने इन जनजातियों के व्यापर को भी ठप्प कर दिया था। उनकी नमक वाली नीति से भी इन पर खासा दुष्प्रभाव पड़ा था। 1911 में इस क़ानून को पुलिस कमीशन की रिपोर्ट के बाद और सख्त कर दिया गया, जिसमें सिफारिश की गई थी कि पुलिस को इन जनजातियों के खिलाफ सख्ती के लिए और शक्तियाँ दी जाएँ। प्रांतीय सरकारों को भी ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ के तहत किसी भी जनजाति को ‘अपराधी’ घोषित करने की शक्ति दे दी गई।

इस क़ानून को लागू करने से पहले जिस ब्रिटिश अधिकारी टीवी स्टीफेंस ने पैरवी की थी, उसका तर्क भी काफी अजीब था। उसका कहना था कि भारत में एक जाति के लोग सदियों से एक ही प्रकार के कारोबार करते आ रहे हैं, जैसे बुनाई, शिल्पकारी और लोहार वाले काम। उसका कहना था कि इसी तरह से कुछ जनजातियाँ ज़रूर ऐसी हैं, जिनके लोग अपराध को ही अपना प्रोफेशन मानते हैं क्योंकि उनके बाप-दादा भी यही करते आ रहे थे।

अंग्रेजों का मानना था कि ये जनजाति समूहों के लोग भी सदियों से अपराध ही करते आ रहे हैं और आगे भी इनके वंशज गैर-क़ानूनी कार्य ही करते रहेंगे। इससे हुआ ये कि इन समुदायों में बच्चे का जन्म होते ही वो ‘जन्मजात अपराधी’ हो जाता था, बिना कुछ किए ही। लेकिन, 20वीं शताब्दी आते-आते अंग्रेजों ने सारी हदें पार कर दी। बच्चों को उनके परिवार और माता-पिता से दूर कर के कहीं और बसाया जाने लगा।

इस बसावट को ‘सुधार’ का नाम दिया गया। आज जब चीन के शिनजियांग में उइगर परिवार के बच्चों को उनके परिवार और क्षेत्र से शुरू में ही दूर कर दिया जाता है, ऐसे में हम सोच सकते हैं कि उस वक़्त अंग्रेज कैसे यह करते रहे होंगे। आगे कभी कोई विद्रोह ही न हो, इसके लिए इन लोगों के फिंगरप्रिंट्स तक ले लिए गए। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसे सिविल लिबर्टी का हनन करार दिया था। ये था अंग्रेजों का अत्याचारी ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’।

ट्रांसजेंडर समुदाय को भी बना दिया गया अपराधी

इस क़ानून का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव जिन लोगों पर पड़ा, उनमें ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी शामिल थे। आज जब आधुनिकता के नाम पर अंग्रेज इसकी पैरवी करते नहीं थकते तो उन्हें अपना ये काला इतिहास भी याद करना चाहिए। इन्हें ‘Enunch’ समुदाय बता कर इनकी धर-पकड़ तेज़ कर दी गई। हालाँकि, आज़ादी के बाद मद्रास प्रान्त में तत्कालीन कम्युनिस्ट नेताओं ने इसका विरोध किया, जिसके बाद वहाँ इस क़ानून को रद्द किया गया।

1950 में एक समिति बना कर इसकी जाँच करने को कहा गया कि इस क़ानून की देश को ज़रूरत है भी या नहीं। जाँच में पाया गया कि ये पूरा का पूरा क़ानून ही भारतीय संविधान का उल्लंघन करता है। कई अन्य क़ानूनों के जरिए आदतन अपराधियों पर लगाम लगाने की कोशिश की गई लेकिन अंग्रेजों के ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’ का दंश ऐसा था कि वो समाज से और भी ज्यादा कट गए, अलग रहने लगे।

गरीबी तो थी ही, ऊपर से इनमें से कई समूहों को सालों तक एससी-एसटी समुदाय में भी नहीं गिना गया, जिससे इन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल सके। आज जिस जाति-व्यवस्था या ‘ब्राह्मणों’ को अन्य जातियों से भेदभाव के लिए दोष दिया जाता है, उन्हें समझना चाहिए कि यही वो क़ानून था, जो अंग्रेजों का था, और जिसने जाति-समुदाय के आधार पर लोगों को जन्म से ही अपराधी घोषित करना शुरू कर दिया था। इससे बड़ा भेदभाव क्या होगा?

आज जब हम बिरसा मुंडा जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की पूजा करते हैं, एक समय था जब अंग्रेजों ने आदिवासियों को ही अपराधी घोषित कर डाला था। यहाँ तक कि सिखों के कुछ समूहों को भी आपराधिक जनजाति की श्रेणी में डाल दिया गया था। 1971 वाले क़ानून में प्रांतीय सरकारों को आज़ादी थी कि वो किसी भी जनजाति को गवर्नर जनरल से सिफारिश कर के उसे आपराधिक समूह घोषित करवा दे।

‘जन्मजात अपराधी’ के सिद्धांत वाला अंग्रेजों का काला कानून

प्रांतीय सरकारों से कहा गया कि वो इन जनजातीय समूहों के बारे में रिपोर्ट तैयार कर के भेजने के क्रम में ये भी बताएँ कि ये लोग अपना जीवन-यापन कैसे करते हैं। साथ ही न्यायिक व्यवस्था को इस पर सवाल उठाने नहीं दिए गए, जिससे जजों को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार ख़त्म हो गया। बताया गया कि इन समुदायों के लोग वहीं रह सकते हैं, जहाँ स्थानीय प्रशासन कहे। एसपी के पास रजिस्टर में इन लोगों के नाम होते थे, जिसकी सूचना मजिस्ट्रेट को देनी होती थी।

अंग्रेजों के ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ का एक अंश (साभार: कोलंबिया यूनिवर्सिटी)

अगर छोटी सी गलती भी हुई तो इसके लिए कम से कम 6 महीने की सजा के साथ-साथ जुर्माने का प्रावधान था। साथ ही गाँव के प्रधानों और जमींदारों को आदेश दिया गया कि वो घुमंतू जनजातियों के लोगों का सारा ब्यौरा सरकार को सौंपें और बताएँ कि वो लोग किसकी जमीन में कितने दिनों से रह रहे हैं। अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो उनके लिए भी सजा का प्रावधान किया गया। परिणाम ये हुआ कि अंग्रेजों के कारण जो सीधे-सादे लोग थे, उनमें भी आपराधिक प्रवृत्ति घर करने लगी।

आज भारत में 313 से भी अधिक घुमंतू जनजातियाँ हैं, जो आज भी अंग्रेजों के इस अत्याचार का दंश झेल रहे हैं। इन्हें समाज से इतना अलग-थलग कर दिया और इतना ज्यादा प्रताड़ित किया गया कि ये मुख्यधारा से ही अलग हो गए। लगभग 6 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो इन जनजातीय समूहों का हिस्सा हैं। अंग्रेजों ने अपने उस क़ानून में मुस्लिम समुदाय को भी जोड़ा था, तभी ‘Caste’ की जगह ‘Tribes’ शब्द का इस्तेमाल कर खेल किया गया।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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