Thursday, September 24, 2020
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दारा शिकोह: ‘धोखे’ से जिसकी 4 लाख की सेना 40000 वाले औरंगजेब से हारी और इतिहास ने जिसके साथ फिर किया ‘धोखा’

विश्वासपात्र (असल में धोखेबाज) खलीलुल्लाह ने कहा- "हजरत सलामत, आपको जीत मुबारक। अब आप हाथी से उतरकर घोड़े पर बैठिए। पता नहीं कब कोई तीर आपको आकर लग जाए।" - यही वो धोखा था, जिसने 4 लाख Vs 40 हजार सैनिक के युद्ध का रुख बदल दिया।

शाहजहाँ और औरंगजेब जैसे मुगल बादशाहों के बारे में तो पूरी दुनिया जानती है, लेकिन दारा शिकोह को बहुत कम ही लोग जानते होंगे। दरअसल, दारा शिकोह शाहजहाँ के बड़े बेटे और औरंगजेब के बड़े भाई थे। इतिहास में आज के दिन एक भाई ने अपने ही भाई को सत्ता के लिए मरवा दिया था। भारतीय मुगलकालीन इतिहास में 30 अगस्त 1659 को ही मुगल शासक शाहजहाँ के बेटे दारा शिकोह की उसके ही छोटे भाई ने हत्या करवा दी थी। भारतीय इतिहास में भुला दिया गया यह शख्स शाही मुगल परिवार में अनोखा और अद्भुत व्यक्तित्व वाला था।

दारा शिकोह के एक हाथ में पवित्र कुरान थी और दूसरे हाथ में पवित्र उपनिषद। वो मानता था कि हिन्दू और इस्लाम धर्म की बुनियाद एक है। वो नमाज भी पढ़ता था और प्रभु नाम की अँगूठी भी पहनता था। मस्जिद भी जाता था और मंदिर में भी आस्था रखता था। लेकिन सत्ता की लड़ाई में उसे काफिर बताकर मार दिया गया। तभी से ये सवाल भी बना हुआ है कि क्या भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास अलग होता अगर औरंगजेब की जगह दारा शिकोह भारत का बादशाह बनता।

दारा शिकोह वो मुगल शासक है, जिनके साथ इतिहास ने छलावा किया और गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया। उस दारा शिकोह को उसका वाजिब हक दिलाने के लिए मोदी सरकार आगे आई है। जिस दारा शिकोह ने हिन्दू धर्म ग्रंथों का फारसी में अनुवाद किया था। उस दारा शिकोह को इतिहास में दफन पन्नों से बाहर निकालने का बीड़ा मोदी सरकार ने उठाया है। जिस दारा शिकोह के साथ उसके सगे भाई औरंगजेब ने क्रूरता की हदें पार कर दी थी और उसका सिर कलम करवा दिया था, उस दारा शिकोह की कब्र खोजने में मोदी सरकार जुट गई है।

दारा शिकोह की इमेज लिबरल मानी जाती है। वो हिंदू और इस्लामिक ट्रेडिशन को साथ लेकर चलने वाले मुगल थे। दारा शिकोह ने भगवद्गीता और 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। कहा-लिखा तो ये भी गया है कि दारा के सभी धर्मों को साथ लेकर चलने के ख्याल के कारण ही कट्टरपंथियों ने उन्हें इस्लाम-विरोधी करार दे दिया था। इन्हीं हालातों का फायदा उठाकर औरंगज़ेब ने दारा के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। एक सच्चाई यह भी है कि जहाँ एक ओर शाहजहाँ ने दारा शिकोह को सैन्य मुहिमों से दूर रखा वहीं औरंगजेब को 16 वर्ष की आयु में एक बड़ी सैन्य मुहिम की कमान सौंप दी।

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पुरातत्वविद् केके मुहम्मद के मुताबिक शिकोह अपने दौर के बड़े फ्री थिंकर (स्वतंत्र विचारक) थे। उन्होंने उपनिषदों का महत्व समझा और अनुवाद किया। तब इसे पढ़ने की सुविधा सवर्ण हिंदुओं तक सीमित थी। उपनिषदों के दारा के किए फारसी अनुवाद से आज भी फ्री थिंकर्स को प्रेरणा मिलती है। यहाँ तक कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसको स्वीकार किया है।

दारा शिकोह का ध्यान पढ़ाई की तरफ ज्यादा था। आगे चलकर दारा को पढ़ाई की ऐसी लत लगी कि वो कभी धार्मिक पुस्तकों के ध्यान में डूबे रहते, तो कभी जामी और रूमी जैसे महान सूफी संतों के शेर और रूपाईयों में खो जाते। मुगल बादशाह शाहजहाँ के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह में भारतीय संस्कृति कूट-कूट कर भरी हुई थी। वो उदारवादी और बेहद नम्र मुगल शासक थे। वो एक बड़े लेखक भी थे। दारा शिकोह सूफीवाद से बेहद प्रभावित थे। उनके मन में हर धर्म के प्रति सम्मान था। 

दारा शिकोह की खूबियों की वजह से पिता शाहजहाँ उन्हें बेहद पसंद किया करते थे और अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। लेकिन दारा शिकोह के भाई औरंगजेब को ये कतई मंजूर नहीं था। दिल्ली सल्तनत हासिल करने के लिए औरंगजेब ने दारा शिकोह के साथ तीन-तीन युद्ध लड़े और तीनों में उसकी मात हुई। बाद में औरंगजेब दारा शिकोह को मौत की सजा देकर जबरन बादशाह बन गया। 

इतिहास में औरंगजेब की खूब चर्चा हुई है और दारा शिकोह को नजरअंदाज कर दिया गया है। सच्चे मायने में एक धर्मनिरपेक्ष मूर्त वाले दारा शिकोह को काफिर तक करार दिया गया था। इतिहासकारों ने भी औरंगजेब का ही महिमामंडन किया। लेकिन दारा शिकोह को वो पहचान नहीं दी, जिनके वो हकदार थे। देश भर में औरंगजेब के नाम से तमाम सड़के मिल जाएँगी। लेकिन दारा शिकोह के नाम पर एक स्मारक तक नहीं बना। हालाँकि 2017 में दिल्ली के डलहौजी मार्ग का नाम बदलकर दारा शिकोह रोड जरूर कर दिया गया था। 

औरंगजेब ने जब साल 1659 में एक भरोसेमंद सिपाही के जरिए दारा शिकोह का सर कलम करवा दिया था तब सिर आगरा में दफनाया गया था और धड़ को दिल्ली में। शाहजहाँनामा के मुताबिक औरंगजेब से हारने के बाद दारा शिकोह को जंजीरों से जकड़कर दिल्ली लाया गया और उसके सिर को काटकर आगरा फोर्ट भेजा गया, जबकि उनके धड़ को हुमायूँ के मकबरे के परिसर में दफनाया गया था।

दारा शिकोह इतिहास की सबसे बड़ी सेना लेकर औरंगजेब से लड़ने गया था। लेकिन उसकी सेना में सैनिकों से ज्यादा छोटे दुकानदार, मजदूर, दस्तकार और यहाँ तक की भांडे-बर्तन बेचने वाले भी शामिल थे। उन्हें लड़ने का कोई अनुभव नहीं था, सिर्फ दारा शिकोह के आदेश पर उन्हें सेना में भर्ती कर लिया गया था। दारा शिकोह के पास 4 लाख सैनिक थे और औरंगजेब के पास सिर्फ 40 हजार।

दारा को हराने में उसके अपने ही विश्वासपात्र का हाथ था। दारा शिकोह ने कभी उसे बुरी तरह से अपमानित किया था। उसने दारा से जंग के मैदान में बदला चुकाया। दारा हाथी पर थे और वह जंग लगभग जीत चुके थे। औरंगजेब के पास गिनती के सैनिक रह गए थे। उसी वक्त उनके एक विश्वासपात्र खलीलुल्लाह ने कहा- हजरत सलामत, आपको जीत मुबारक। अब आप हाथी से उतरकर घोड़े पर बैठिए। पता नहीं कब कोई तीर आपको आकर लग जाए। अगर ऐसा हो गया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। दारा शिकोह बिना सोच विचार किए हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हो गए।

उधर जैसे ही दारा हाथी से उतरे, उनके सैनिकों के बीच दारा के मरने की अफवाह फैल गई। औरंगजेब ने इसका फायदा उठाया। दारा के सैनिक उनका साथ छोड़कर भाग गए और औरंगजेब और मुराद की मुट्ठीभर सेना ने जंग जीत लिया।

जंग हारने के बाद दारा शिकोह यहाँ-वहाँ भटकते रहे। कभी वो मुल्तान तो कभी थट्‌टा और कभी अजमेर भागे। आखिरकार औरंगजेब के एक सैनिक के हाथों वो पकड़े गए। दिल्ली में उन्हें बुरी तरह से अपमानित किया गया। उन्हें बीमार और गंदे हाथी पर घुमाया गया। दारा शिकोह को भिखमंगों जैसे कपड़े पहनाए गए थे।

दारा शिकोह को औरंगजेब ने कैदखाने में डाल दिया। बाद में एक रात जब दारा और उनका बेटा कैदखाने में ही अपने लिए खाना बना रहे थे तो औरंगजेब के एक गुलाम नजीर ने उनका सिर काट डाला। 

अवीक चंदा की किताब ‘दारा शिकोह, द मैन हू वुड बी किंग’ के मुताबिक, औरंगजेब ने दारा शिकोह के कटे हुए सिर को शाहजहाँ के पास तोहफे के तौर पर भिजवाया और उनके धड़ को दिल्ली में ही हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया। वहीं इटैलियन इतिहासकार निकोलाओ मनूची ने अपनी किताब ‘स्टोरिया दो मोगोर’ में लिखा है कि औरंगजेब के आदेश पर दारा के सिर को ताजमहल के प्रांगण में गाड़ दिया गया, क्योंकि उसका मानना था कि शाहजहाँ जब भी अपनी बेगम के मकबरे को देखेंगे तो उन्हें बार-बार ये ख्याल आएगा कि उनके सबसे प्रिय और बड़े बेटे दारा का सिर वहाँ सड़ रहा है। 

दारा के परिवार का भी बुरा हाल हुआ। उनके एक बेटे को मार दिया गया। दूसरे को ग्वालियर के किले में कैद कर लिया गया। दारा की बेगम अपनी जान बचाने के लिए लाहौर भाग गई। बाद में उन्होंने जहर खाकर जान दे दी।

औरंगजेब ने दारा शिकोह की हत्या करने वाले गुलाम को भी नहीं छोड़ा। दारा को अपमानित कर हाथी पर घुमाने वाले जीवन खाँ और उनका सिर काटने वाले गुलाम नजीर को पहले उसने इनाम देकर विदा किया। फिर रास्ते में दोनों के सिर कटवा दिए।

ये एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जहाँ औरंगजेब ने हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं, मान्यताओं को नष्ट करने का काम किया, वहीं उसके भाई दारा शिकोह ने हमेशा सर्वधर्म समभाव की बात कही। दारा शिकोह धार्मिक सहिष्णुता और धर्म निरपेक्षता का हिमायती रहा। दारा शिकोह के लिए दूसरे धर्मों की आस्था के बारे में जानकारी हासिल करना राजनीति से प्रेरित नहीं था। इसमें किसी राज्य विस्तार या राज्य संभालने जैसी कोई कवायद नहीं शामिल थी। 

दारा शिकोह विद्वान था। वो भारतीय उपनिषद और भारतीय दर्शन की अच्छी जानकारी रखता था। इतिहासकार बताते हैं कि वो विनम्र और उदार ह्रिदय का था। दारा के सबसे बड़े योगदानों में उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद करना माना जाता है। इन अनुवादित किताबों को उसने ‘सिर्रेअकबर‘ यानी महान रहस्य का नाम दिया था। फारसी भाषा में अनुवाद कराए जाने का मुख्य कारण ये था कि फारसी मुगलिया कोर्ट में इस्तेमाल की जाती थी। हिंदुओं का भी विद्वान वर्ग इस भाषा के साथ बखूबी परिचित था।

फारसी में दारा शिकोह के ग्रंथ हैं- सारीनतुल् औलिया, सकीनतुल् औलिया, हसनातुल् आरफीन (सूफी संतों की जीवनियाँ), तरीकतुल् हकीकत, रिसाल-ए-हकनुमा, आलमे नासूत, आलमे मलकूत (सूफी दर्शन के प्रतिपादक ग्रंथ), सिर्र-ए-अकबर (उपनिषदों का अनुवाद)। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ का भी फारसी भाषा में अनुवाद किया। ‘मज्म-उल्-बहरैन्’ फारसी में उनकी अमर कृति है, जिसमें उन्होंने इस्लाम और वेदांत की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बताई हैं। इसके अलावा दारा शिकोह ने ‘समुद्रसंगम’ (मज़्म-उल-बहरैन) नाम से संस्कृत में भी रचना की। 

दारा शिकोह ने पुस्तकालय भी बनवाए। शुरुआत में इसे दारा शिकोह के पुस्तकालय के रूप में जाना जाता था। बाद में इसे पंजाब के वाइसराय सर ओचर्लोनी के निवास में बदल दिया गया। फिर इसे कुछ सरकारी कॉलेज में बदल दिया गया। उसके बाद, इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कार्यालय के कार्यालय के रूप में मदरसा जिला नगरपालिका बोर्ड में स्थापित किया गया।

फिलहाल यह पूरी तरह से बंद हो चुका है। कहा जाता है कि उस समय इस पुस्तकालय में अरबी, संस्कृत, फारसी में लगभग 250000 ग्रंथ थे और बहुत सारी अनुवादित लिपियाँ भी थीं। 2011 में, शीला दीक्षित सरकार ने पुस्तकालय को शहर के प्रदर्शनी हॉल में तब्दील कर दिया।

उल्लेखनीय है कि अलीगढ़ में दारा शिकोह फाउंडेशन के अध्यक्ष आमिर रशीद ने पिछले दिनों कहा था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद के निर्माण के बजाय, दारा शिकोह के नाम पर मस्जिद का निर्माण किया जाए, जिन्हें हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच सद्भाव फैलाने के लिए जाना जाता है।

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