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बांग्लादेशी घुसपैठियों से असम को बचाने में 850+ बलिदान, 22 साल के खरगेश्वर पहले बलिदानी: 40000+ फर्जी वोटों के लिए कॉन्ग्रेस सरकार ने मारी थी गोली

असम ने जब बांग्लादेशी नागरिकों को बाहर निकालने के लिए आंदोलन शुरू किया तो 22 साल के खरगेश्वर तालुकदार का बलिदान पहला दर्ज किया गया। इसी दिन को याद करते हुए असम का 'शहीद दिवस' मनाया जाता है। असम आंदोलन में 850 से अधिक लोगों ने असम की पहचान के लिए जान गवाईं।

असम 10 दिसंबर को ‘बलिदान/शहीद दिवस’ (Swahid Divas) के तौर पर याद करता है। साल 1979 में इसी तारीख को अपनी मिट्टी के लिए असम के 22 साल के खरगेश्वर तालुकदार बलिदान हुए थे। वे उन 850+ लोगों में पहले बलिदानी थे, जिन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठियों से अपनी जमीन की रक्षा करते हुए प्राण गवाए थे। उनपर बेरहमी से हमला कर हत्या कर दी गई और उनके शरीर को सड़क किनारे एक खाई में फेंक दिया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के 46वें ‘शहीद दिवस’ पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया। पोस्ट में प्रधानमंत्री ने लिखा, “आज शहीद दिवस पर हम असम आंदोलन में शामिल सभी लोगों के पराक्रम को याद करते हैं। यह आंदोलन हमारे इतिहास में हमेशा एक प्रमुख स्थान रखेगा। हम असम आंदोलन में भाग लेने वालों के सपनों को साकार करने, विशेष रूप से असम की संस्कृति को मजबूत करने और राज्य के संपूर्ण विकास के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं।”

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी खरगेश्वर तालुकदार और उन 850 बलिदानी को याद करते हुए स्वाहिद स्मारक का उद्घाटन किया और उन्हें श्रद्धांजलि दी। सीएम ने कहा कि मातृभूमि के प्रति उनका प्रेम हमेशा हमारे लिए प्रेरणा रहेगा क्योंकि आज हम उनके सर्वोच्च बलिदान को याद करते हैं। आइए इस 46वें शहीद दिवस पर जानते हैं कि कैसे असम के लोगों ने अपनी पहचान के लिए क्रांति की। कैसे खरगेश्वर तालुकदार का बलिदान पूरे असमवासियों की मशाल की लौ बनकर साबित हुआ।

असम में क्रांति की शुरुआत

साल 1970 और 1980 के दशक में, जब असम में 1950 से हो रहे बांग्लादेशियों के घुसपैठ के चलते विद्रोह की ज्वाला उठने लगी। असमवासियों को अपनी पहचान, अपनी भाषा, अपनी जमीन और संस्कृति खोने का डर था। इसी विद्रोह में खरगेश्वर तालुकदार नाम के एक 22 साल के ऑल असम छात्र संघ (AASU) के छात्र नेता को बेरहमी से मार दिया गया। AASU ही असम आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था।

खरगेश्वर तालुकदार की हत्या से असम में क्रांति शुरू हो गई। तब यह सिर्फ हत्या नहीं थी बल्कि एक चेतावनी के रूप में ली गई। इस घटना ने नाराज असमवासियों में प्रतिशोध की ज्वाला जगा दी। उस दिन से असम में असंतोष खुलकर सामने आने लगा। AASU और ऑल असम गना संग्राम परिषद (AAGSP) के नेतृत्व में शुरू हुए संघर्ष को हर वर्ग लोगों का समर्थन मिलने लगा। छात्र-संघ, किसान, बौद्धिक वर्ग और आम लोगों ने मिलकर आवाज उठाई।

असम की तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने इसे अंजाम दिया था। बीजेपी का आरोप है कि ऐसा 40000+ बांग्लादेशी वोटरों के चक्कर में किया गया था।

असम आंदोलन का नतीजा

खरगेश्वर तालुकदार की हत्या ने पूरे असम को झकझोर कर रख दिया। अब यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं रहा बल्कि व्यक्तिगत और भावनात्मक संघर्ष बन चुका था। बांग्लादेशी घुसपैठ की चिंता से शुरू हुआ ये संघर्ष अब एक आंदोलन में बदल चुका था।

आंदोलन अब अपनी आवाज ऊँची कर चुका था। इतनी ऊँची कि असम की तत्कालीन मुख्यमंत्री गोलाप बोरबोरा के नेतृत्व वाली हजारिका सरकार बढ़ती अशांति को नियंत्रित करने में असमर्थ रही। असमवासियों का सरकार पर से विश्वास उठ गया था। लोगों का कहना था कि तत्कालीन सरकार बांग्लादेशी घुसपैठ को नजरअंदाज कर कर रही है।

उधर, असम में बढ़ती अशांति को देखते हुए केंद्र सरकार को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए 12 दिसंबर 1979 को असम में राष्ट्रपति शासन लागू किया। यह असम के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव था।

विधानसभा चुनाव बहिष्कार और नेल्ली नरसंहार

असम की विरासत को बचाने के लिए चल रहे बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन के बीच 1983 में केंद्र सरकार ने विधानसभा चुनाव करवाने का फैसला किया, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना था कि नागरिकता का मुद्दा हल हुए बिना चुनाव कराना असम की असली जनसंख्या के साथ अन्याय है। नतीजा यह हुआ कि पूरे प्रदेश में चुनावों का अभूतपूर्व बहिष्कार हुआ।

फिर फरवरी 1983 में नेल्ली नरसंहार हुआ, जो जो प्रदेश के इतिहास में काले पन्नों में दर्ज किया गया। त्रिभुवन प्रसाद तिवारी कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश में इस दौरान 8019 हिंसक घटनाएँ हुई। 248292 लाख लोगों को राहत शिविरों में रहना पड़ा, जबकि 225951 लोग बेघर हुए। करीब 22 रेलवे की संपत्तियों का नुकसान हुआ और 85 रेलवे ट्रैक प्रभावित हुए। 22436 प्राइवेट घरों को आग के हवाले कर दिया गया।

पर इन कठिन दौरों के बीच भी असम के युवाओं और नागरिकों का हौसला नहीं टूटा। इन सबके बीच भी खागेश्वर तालुकदार की छवि हर पल उभरती रही, जो असम के अस्तित्व के लिए किए जा रहे बलिदानों की निरंतर याद दिलाती रही। उनकी मृत्यु इस आंदोलन का प्रतीक बन गई थी और सड़कों पर उतरने वाला हर प्रदर्शनकारी उनकी स्मृति में ही प्रदर्शन कर रहा था।

केंद्र सरकार के साथ ‘असम समझौता’

आखिरकार 15 अगस्त 1985 का वो दिन आया, देश के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर असम के लिए भी एक नए चैप्टर की शुरुआत हुई। लंबे संघर्ष के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार, AASU और AAGSP के बीच ऐतिहासिक ‘असम समझौते’ (Assam Accord) पर बात बनी।

इस समझौते ने पहली बार स्पष्ट रूप से यह तय किया कि असम में किसे ‘विदेशी’ माना जाएगा और किसे नहीं। इसमें कहा गया कि 01 जनवरी 1966 से पहले जो लोग असम आए, वे नागरिक माने जाएँगे। 1966 से 24 मार्च 1971 के बीच आने वालों को अस्थायी तौर पर नागरिक अधिकारों से 10 साल के लिए वंचित रखा जाएगा, लेकिन वे प्रदेश में रह सकेंगे।

और 24 मार्च 1971 के बाद जो लोग आए, उनकी पहचान की जाएगी और अगर वे अवैध पाए जाते हैं तो उन्हें देश छोड़ना होगा। साथ ही केंद्र सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया कि असम की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषा की पहचान की रक्षा के लिए विशेष कदम उठाए जाएँगे। समझौते को असम आंदोलन की जीत माना गया।

असम के शहीद दिवस का महत्व और अधूरे वादे

असम में मनाया जाने वाला ‘शहीद दिवस’ सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की याद है, जिन्होंने असम की पहचान, संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। आज के समय में जब बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा तूल पकड़ रहा है, ऐसे में असम आंदोलन को याद किया जाना चाहिए।

इस आंदोलन के दौरान किए गए कई वादे अभी भी पूरे नहीं हो पाए हैं। बांग्लादेशी घुसपैठ, असम की पहचान और नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर अब भी बहस जारी है। ‘असम समझौते’ में तय किए गए प्रावधान आज भी पूरी तरह लागू नहीं हुए हैं। इसलिए ‘शहीद दिवस’ केवल अतीत की याद नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है कि हमें असम की संस्कृति, भाषा और सामाजिक संरचना की रक्षा के लिए सतर्क रहना होगा। यह चेतावनी है कि असम की पहचान कोई साधारण बात नहीं, बल्कि वह विरासत है जिसे बचाने के लिए कई लोगों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया।

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पूजा राणा
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