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दलित अस्मिता की पहचान, सनातन संस्कृति के संरक्षक: जानिए कौन थे महाराजा बिजली पासी, जिनके किलों का पुनरुद्धार कराने में जुटी योगी सरकार

यूपी सरकार महाराजा बिजली पासी के किलों के पुनरुद्धार के लिए निरंतर कार्य कर रही है और उनसे जुड़ी वीर परंपरा को आगे बढ़ाने वाले सभी महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रही है।

महाराजा बिजली पासी की जयंती हर साल 25 दिसंबर को धूम-धाम से मनाई जाती है। उन्हें उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में बहुजन नायक और दलित गौरव का प्रतीक माना जाता है। उनकी जयंती पर लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके शौर्य, पराक्रम और सनातन परंपरा की रक्षा में दिए गए योगदान को याद करते हैं।

लखनऊ के महान योद्धा महाराजा बिजली पासी ने विदेशी आक्रांताओं और हुकूमतों के खिलाफ डटकर संघर्ष किया और सनातन संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। अब यूपी सरकार महाराजा बिजली पासी के किलों के पुनरुद्धार के लिए निरंतर कार्य कर रही है और उनसे जुड़ी वीर परंपरा को आगे बढ़ाने वाले सभी महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रही है।

अवध के स्वतंत्र शासक: 12वीं सदी के स्वाभिमानी राजा

इतिहासकारों के अनुसार, महाराजा बिजली पासी 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अवध प्रांत के बिजनौरगढ़ के शक्तिशाली और स्वतंत्र शासक थे। उनका शासनकाल लगभग 1148 ईस्वी से 1184 ईस्वी तक माना जाता है। उस समय अवध का यह क्षेत्र राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

महाराजा बिजली पासी ने किसी भी बड़े साम्राज्य या राजा की अधीनता स्वीकार नहीं की और एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में अपने राज्य का संचालन किया। उनका शासन इस बात का प्रमाण है कि उस दौर में दलित समाज केवल शोषण का शिकार नहीं था, बल्कि उसने शासन किया, युद्ध जीते और अपनी राजनीतिक पहचान बनाई।

माता-पिता की स्मृति में नगर और किलों की स्थापना

महाराजा बिजली पासी के पिता का नाम नथावन देव और माता का नाम बिजना था। उन्होंने सबसे पहले अपनी माता की स्मृति में ‘बिजनागढ़’ की स्थापना की, जो आगे चलकर बिजनौरगढ़ कहलाया और आज के बिजनौर क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।

इसके बाद उन्होंने अपने पिता की याद में बिजनौरगढ़ से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर दिशा में ‘नथवागढ़’ की स्थापना की। यह केवल नगर निर्माण नहीं था, बल्कि अपने वंश, परिवार और सांस्कृतिक जड़ों को सम्मान देने की उनकी सोच को दर्शाता है। इन नगरों और किलों के माध्यम से उन्होंने अपने राज्य को संगठित और सुदृढ़ किया।

12 किले और सैन्य शक्ति का विस्तार

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि महाराजा बिजली पासी ने अपने शासनकाल में कुल 12 किलों का निर्माण कराया था। ये किले उनकी मजबूत सैन्य रणनीति और दूरदर्शिता का प्रमाण थे। उस दौर में किलों का निर्माण किसी भी राज्य की शक्ति, सुरक्षा और प्रभाव का प्रतीक माना जाता था।

राजा बिजली पासी किला, कर्नल हडसन द्वारा बनाया गया चित्र (फोटो साभार: everybodywiki)

इन किलों ने न केवल उनके राज्य की सीमाओं की रक्षा की, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में उनके प्रभाव को भी स्थापित किया। आज भी इन किलों के अवशेष पासी समाज और दलित वर्ग के लिए स्वाभिमान और गौरव का केंद्र हैं।

राजा जयचंद को चुनौती और वीरगति की कथा

महाराजा बिजली पासी की वीरता का सबसे चर्चित अध्याय कन्नौज के शक्तिशाली राजा जयचंद के साथ हुए युद्ध हैं। लोक कथाओं और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने जयचंद की विशाल सेना को दो बार पराजित किया था। उस समय जयचंद ने कौशांबी के कड़ा क्षेत्र में किले का निर्माण कर कुछ समय तक वहाँ निवास भी किया था।

इसके बावजूद महाराजा बिजली पासी ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी। माना जाता है कि वर्ष 1184 ईस्वी में गांजर के युद्ध के दौरान उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की, हालाँकि इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद भी हैं। फिर भी उनका संघर्ष और पराक्रम आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

दलित अस्मिता का प्रतीक और सरकारी सम्मान

महाराजा बिजली पासी का महत्व केवल एक योद्धा तक सीमित नहीं है। वह दलित समाज के गौरवशाली अतीत और आत्मसम्मान के प्रतीक हैं। बहुजन नायक कांशीराम के सुझाव और प्रयासों से उनकी योद्धा छवि को राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई पहचान मिली।

भारत सरकार ने वर्ष 2000 में उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया, जो उनके योगदान की राष्ट्रीय मान्यता का प्रतीक है। इसके अलावा योगी आदित्यनाथ सरकार ने 27 अगस्त 2024 को निहालगढ़ रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘महाराजा बिजली पासी रेलवे स्टेशन’ कर दिया था। यह कदम उनके इतिहास और योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

हर वर्ष 25 दिसंबर को महाराजा बिजली पासी की जयंती पर उनके किलों और ऐतिहासिक स्थलों पर श्रद्धांजलि सभाएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक आयोजन होते हैं। यह दिन न केवल अतीत को याद करने का अवसर है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि स्वाभिमान, साहस और स्वतंत्रता की लड़ाई हर दौर में प्रासंगिक रहती है। महाराजा बिजली पासी की विरासत आज भी वंचित और दलित समाज को अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती है।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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