Wednesday, July 28, 2021
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महाभारत-कालीन शिव मंदिर जो मृत को भी देता है जीवन: #महाशिवरात्रि पर उत्तराखंड से Exclusive रिपोर्टिंग

लाखामंडल गाँव देहरादून से 128 किमी, चकराता से 60 किमी और पहाड़ों की रानी मसूरी से 75 किमी की दूरी पर है। लाखामंडल की प्राचीनता को कौरव-पांडवों से जोड़कर देखा जाता है।

उत्तराखंड का आदिकालीन सभ्यताओं से गहरा नाता रहा है। यहाँ ऐसे अनेक स्थान मौजूद हैं, जहाँ ऐतिहासिक एवं पौराणिक काल के अवशेष बिखरे पड़े हैं। इन्हीं में एक स्थल है देहरादून जिले के जौनसार-बावर का लाखामंडल गाँव। माना जाता है कि द्वापर युग में दुर्योधन ने पाँचों पांडवों और उनकी माता कुंती को जीवित जलाने के लिए यहाँ लाक्षागृह का निर्माण किया था। एएसआइ को खुदाई के दौरान यहाँ मिले सैकड़ों शिवलिंग व दुर्लभ मूर्तियाँ इसकी तस्दीक करती हैं। युवा पत्रकार आशीष नौटियाल की यह फोटो-फीचर रिपोर्ट लाखामंडल पर ही है।

यमुना नदी के उत्तरी छोर पर स्थित देहरादून जिले के जौनसार-बावर का लाखामंडल गाँव ऐतिहासिक ही नहीं पौराणिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है। समुद्रतल से 1372 मीटर की ऊँचाई पर स्थित लाखामंडल गाँव देहरादून से 128 किमी, चकराता से 60 किमी और पहाड़ों की रानी मसूरी से 75 किमी की दूरी पर है। लाखामंडल की प्राचीनता को कौरव-पांडवों से जोड़कर देखा जाता है।

गढ़वाल की पारंपरिक शैली में बना मंदिर परिसर
मुख्य मंदिर जिसे युधिष्ठिर ने बनाया था
मंदिर का रक्षक प्रहरी
रक्षक प्रहरी की सामने से ली गई तस्वीर

मान्यता है कि कौरवों ने पांडवों व उनकी माता कुंती को जीवित जलाने के लिए ही यहाँ लाक्षागृह (लाख का घर) का निर्माण कराया था। स्थानीय लोग बताते हैं कि लाखामंडल में वह ऐतिहासिक गुफा आज भी मौजूद है, जिससे होकर पांडव सकुशल बाहर निकल आए थे। लोगों का कहना है कि इसके बाद पांडवों ने ‘चक्रनगरी’ में एक माह बिताया, जिसे आज चकराता कहते हैं। लाखामंडल के अलावा हनोल, थैना व मैंद्रथ में खुदाई के दौरान मिले पौराणिक शिवलिंग व मूर्तियाँ गवाह हैं कि इस क्षेत्र में पांडवों का वास रहा है।

लोग इन्हें भीम की गदा बताते हैं। ASI की ख़ुदाई में यहाँ लगातार ऐसी आकृतियाँ और भगवान की मूर्तियाँ निकलती हैं
पांडव गुफा का द्वार
पांडव गुफा के अंदर बैठकर बाबा ‘चिल’ करते हुए
बाबाजी ‘calm’ मूड में

कहते हैं कि पांडवों के अज्ञातवास काल में युधिष्ठिर ने लाखामंडल स्थित लाक्षेश्वर मंदिर के प्रांगण में जिस शिवलिंग की स्थापना की थी, वह आज भी विद्यमान है। इसी लिंग के सामने दो द्वारपालों की मूर्तियाँ हैं, जो पश्चिम की ओर मुँह करके खड़े हैं। इनमें से एक का हाथ कटा हुआ है। शिव को समर्पित लाक्षेश्वर मंदिर 12-13 वीं सदी में निर्मित नागर शैली का मंदिर है।

यात्रियों को मंदिर के बारे में समझाते हुए स्थानीय बुजुर्ग। यह यूट्यूब पर भी मंदिर के बारे में बताते हुए दिख जाते हैं। हालाँकि यह मंदिर से ज्यादा यह बताते हैं कि ‘उटूब’ पर भी आता हूँ।
मंदिर में श्रद्धालु करा रहे फोटो सैशन
मंदिर के बाहर का दृश्य- शांति और सुकून देने वाला
शिवलिंग का जलाभिषेक करते श्रद्धालु
मंदिर के द्वार की शोभा बढ़ाती हुई घंटिया

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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