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क्या ‘पंडत’ के बिना नहीं बन सकती थी ‘घूसखोर’: बिल्लू ‘बार्बर’ से लेकर ‘मोची-सोनार’ पर हुआ बवाल, फिर भी नहीं सुधरा बॉलीवुड

बात यहाँ सिर्फ ब्राह्मण या पंडित तक सीमित नहीं रही है। यहाँ भोगी 'बिल्लू बार्बर' और माधुरी दीक्षित के गाने 'आजा नचले' विवाद में दलित समुदाय भी रहा, जातिवाद पर विवाद 'शूद्र' फिल्म पर भी हुआ। हर बार जातिवाद का खेल हुआ, लोगों ने हल्ला भी मचाया। लेकिन नतीजा क्या निकला? इसी जातिवाद के खेल में 'घूसखोर पंडत' नया नाम?

नेटफ्लिक्स की आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ नाम को लेकर विवाद तेज हो गया है। आपत्ति इस बात पर है कि फिल्म के टाइटल में ‘पंडत’ शब्द के साथ ‘घूसखोर’ जैसे क्राइम शब्द को जोड़ा गया, जो ब्राह्मण और पंडितों की छवि को बदनाम करने के लिहाज से रखा गया है। यहाँ अभी फिल्म रिलीज भी नहीं हुई, लेकिन टाइटल ने ही खेल कर दिया। बॉलीवुड में ‘जातिवाद’ का वही खेल, जो पहले भी फिल्म और गानों के ऐसे टाइटल देकर किया जा चुका है।

इससे पहले भी बॉलीवुड में जाति और पेशों से जुड़े शब्दों से सामाजिक भेदभाव पैदा करने की साजिश रची गई है। ऐसा ही मामला साल 2007 में माधुरी दीक्षित की फिल्म ‘आजा नचले‘ के साथ भी सामने आया था। फिल्म के टाइटल गीत में ‘बोले मोची भी खुद को सुनार’ पंक्ति जोड़कर मोची और दलित समुदायों के लोगों को नीचा दिखाया गया। विवाद हुआ, यूपी, पंजाब और हरियाणा में फिल्म पर बैन लगा।

विवाद बढ़ा, तो गाने के बोल बदलकर ‘मेरे दर पे दीवानों की बहार है’ कर दिए गए। दुनियाभर में प्रेम का चोला डालकर घूमने वाले ‘यश राज फिल्म’ ने सार्वजनिक तौर पर माफी तक माँगनी पढ़ी। यह सब बस मामला शांत कराने के लिए हुआ।

क्योंकि इसके बाद 2009 में ‘बिल्लू बार्बर‘ आई। यहाँ भी वही विवाद, सीधे फिल्म के नाम पर था। नाई समुदाय ने ‘बार्बर’ शब्द को अपमानजनक तौर पर देखा गया। यहाँ भी फिल्म रिलीज से पहले सबकुछ हुआ। विवाद बढ़ा, तो फिल्म निर्माता शाहरुख खान ने फिल्म के नाम से ‘बार्बर’ शब्द को हटा लिया। यहाँ भी मामला जल्दबाजी में सुलझा लिया गया।

लेकिन साल 2012 में एक और ऐसी फिल्म बनी- शूद्र। इस बार सीधा हमला हुआ। पूरी फिल्म सवर्ण समाज को बाँटने पर आधारित थी, खासकर ब्राह्मण और ठाकुर। फिल्म के ट्रेलर में ही विचलित करने वाले दृश्य थे, जैसे कि मंत्रोच्चारण करने पर एक बच्चे की जीभ काट देना या पैरों में घुंघरू बाँधकर चलना। फिल्म को लेकर कई राज्यों में विरोध हुआ, रिलीज तक रोक दी गई।

लेकिन फिल्म के मेकर्स ने सेंसर बोर्ड की मंजूरी का हवाला देते हुए कुछ नहीं किया। बल्कि जातिवाद फैलाने वाली इस फिल्म के निर्देशक संजीव जायसवाल ने इसमें समाज की गलती निकाली और कहा– जातिवाद समाज में ‘जहर’ है और उनकी फिल्म जातिवाद के खिलाफ आवाज है। मतलब खुद की गलती, पर खुद ही सीनाजोरी। फिल्म आई भी… विवाद भी हुआ, पर नतीजा कुछ नहीं निकला।

विवाद सिर्फ जातिवाद तक नहीं सिमटा। बात धर्म तक भी पहुँची। चाहे वो साल 2017 में ‘फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के गाने में ‘राधा‘ शब्द के साथ ‘सेक्सी’ लगाकर किया गया हो, या इसी तरह साल 2022 में फिल्म ‘पठान’ में दीपिका पादुकोण ‘भगवा रंग’ की बिकीनी में ‘बेशरम रंग’ ही क्यों न गुनगुना रही हो। इन पर भी हल्ला मचा… FIR दर्ज की गईं… ये भी रिलीज से पहले ही चर्चा में बने। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।

अब यहाँ फिल्मों को लेकर ये पुराने विवाद याद किया जाना जरूरी भी है। क्योंकि ये सभी विवाद आज के दौर की ‘घूसखोर पंडत‘ की ही परछाई है, जो फिल्मों के वही जातिवाद के पैटर्न को झलकाता है। जो लोग इस नाम पर उठे विवाद को अब भी हल्के में ले रहे हैं, उन्हें खासतौर पर समझना होगा कि फिल्मों और गानों में शब्दों के जरिए पहचान को निशाना बनाने का खेल बरसों से चलता आ रहा है।

बात यहाँ सिर्फ ब्राह्मण या पंडित तक सीमित नहीं रही है। यहाँ भोगी दलित समुदाय भी है, जो ऐसे टाइटल और कंटेंट का विरोध कर चुका है, जहाँ जाति और पेशा लिखकर पहचान बनाई जाती है। यही नहीं, फिल्मों में हिंदू देवी-देवताओं, धार्मिक प्रतीकों और सनातन परंपराओं से जुड़े नाम और शब्द चुनकर भी यह खेल खेला गया है।

हर बार फिल्म की कहानी से पहले नाम और शब्द चर्चा में आया और रिलीज से पहले ही विरोध शुरू हुआ। कुछ मामलों में माफी माँग ली गई, तो कुछ मे विवाद को कुछ समय के लिए शांत कराने के लिए टरका दिए गए। लेकिन खेल नहीं रुका, अब इस खेल में ‘घूसखोर पंडत‘ नया नाम है। जहाँ फिल्म आने से पहले ही ‘नाम’ से जातिवाद पर विवाद को तूल मिल गया है।

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पूजा राणा
पूजा राणाhttps://hindi.opindia.com/
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