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अमेरिकी टैरिफ का भारत ने निकाला तोड़, निर्यात के लिए यूरोप-एशिया में मिले नए बाजार: सी फूड से लेकर ज्वैलरी तक के एक्सपोर्ट में आया उछाल

भारत के निर्यात में मरीन प्रोडक्ट्स जैसे झींगा और सी फूड में भी अच्छी ग्रोथ हुई है। ऑटो पार्टस और जेम्स ज्वेलरी का निर्यात नॉन यूएस देशों को काफी बढ़ गया है। मरीन प्रोडक्ट्स में चीन लगभग 60 परसेंट, जापान 37 परसेंट और थाईलैंड में लगभग 70 परसेंट ज्यादा निर्यात हुआ। EU में भी काफी डिमांड रही।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के थोपे गए भारी भरकम 50 फीसटी टैरिफ 27 अगस्त से लागू हो चुके हैं। इसको लेकर दुनियभर की निगाहें भारत की ओर थी। विशेषज्ञ भी मान रहे थे कि भारत के निर्यात पर इसका जबरदस्त असर पड़ेगा, लेकिन शुरुआती 3 महीने में भारतीय कंपनियों ने कमाल कर दिया है।

कई सेक्टर जैसे झींगा और सी फूड, जेम्स और ज्वेलरी, ऑटो सेक्टर और बिजली से जुड़े सामान अब यूरोप, चीन, जापान, थाइलेंड और यूएई जैसे नए देशों में बिक रहे हैं। दरअसल इस सामानों से जुड़ी कंपनियाँ अपने शिपमेंट का कुछ हिस्सा दूसरे एशियाई और यूरोपियन मार्केट में भेजने में कामयाब रही हैं।

दूसरी तरफ केन्द्र सरकार ने भी पूरा जोर लगा दिया है। सरकार ने इन कंपनियों को 45 हजार करोड़ की मदद की है। रूस और यूरोप का बाजार उनके लिए खुल गया है।

इसका असर ये हुआ है कि भारत की ग्रोथ रेट वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में 8% की वृद्धि दर्ज की है, जबकि दूसरी तिमाही में इसके 8.2% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। इससे कहा जा सकता है कि भारत 2030 तक तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

सी फूड को मिला दूसरा बाजार

भारत की सी फ़ूड इंडस्ट्री लगातार अपनी ग्लोबल मौजूदगी बढ़ा रही है। इसकी अमेरिका पर निर्भरता कम हुई है। ट्रंप प्रशासन के भारी टैरिफ के असर को कम करने के लिए एक्सपोर्टर अब नए मार्केट पर फोकस कर रहे हैं।

टैरिफ के असर को कम करने के लिए सरकार ने डायवर्सिफिकेशन पर जोर दिया। खासकर मरीन प्रोडक्ट्स में। टैरिफ बढ़ने के बाद यूरोपीय यूनियन के देश भारत का दूसरा सबसे बड़ा सी फूड मार्केट बन गया है। एक्सपोर्ट की जाने वाली भारतीय मरीन यूनिट्स की संख्या 25 फीसदी बढ़ गई है। 102 नई यूनिट्स को मंजूरी मिली है, साथ ही पुरानी 502 यूनिट्स को भी हरी झंडी दे दी गई है। इनकी मंजूरियाँ कई सालों से अटकी हुई थीं।

केयरएज रेटिंग्स के मुताबिक, FY26 के पहले पाँच महीनों में भारत का झींगा एक्सपोर्ट अच्छा परफॉर्म कर रहा है। एक्सपोर्ट वैल्यू साल-दर-साल 18 परसेंट बढ़कर $2.43 बिलियन यानी 2175 करोड़ हो गया है।

यह ग्रोथ काफी हद तक नॉन-US मार्केट में तेज बढ़ोतरी की वजह से हुई। इन इलाकों से एक्सपोर्ट वैल्यू 30 परसेंट बढ़ गई, जिससे साफ पता चलता है कि भारतीय एक्सपोर्टर अलग-अलग ग्लोबल मार्केट तलाश रहे हैं। अमेरिका को छोड़कर दूसरे ग्लोबल बाजार में FY24-25 में 51 फीसदी हिस्सा था, जो FY25-26 के पहले 5 महीनों में बढ़कर 57 फीसदी हो गया है।

चीन सी फूड का टॉप नॉन-US खरीदार के रूप में सामने आया है। यहाँ 16 परसेंट ज्यादा समुद्री फुड निर्यात की गई। सबसे बड़े रीप्रोसेसिंग सेंटरों में एक जापान को सी फूड का निर्यात स्थिर रहा वहीं वियतनाम में निर्यात दोगुना हो गया। दरअसल वियतनाम एक री-एक्सपोर्ट हब के तौर पर उभरा है।

यूरोपियन यूनियन में मजबूत डिमांड और भारतीय एक्सपोर्टर्स द्वारा सहुलियत दिए जाने से बेल्जियम को दोगुना सी फूड निर्यात हुआ है और यह $0.14 बिलियन यानी करीब 125 करोड़ पहुँच गया।

कुल मिलाकर FY26 के पहले पाँच महीनों में बढ़ी हुई एक्सपोर्ट वैल्यू का 86 परसेंट नॉन-US मार्केट से आया है।

टैरिफ बढ़ने के बाद अमेरिका में कम हुआ निर्यात

पारंपरिक रूप से भारत का सबसे बड़ा झींगा बाज़ार रहे अमेरिका में स्थिति थोड़ी अलग है। FY25- 26 की शुरुआत से, US मार्केट में आने वाले भारतीय झींगे पर कई टैक्स लगे हैं, जिसमें मौजूदा एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी के अलावा ज्यादा रेसिप्रोकल ड्यूटी भी शामिल है। अप्रैल और अगस्त 2025 के बीच, भारत का असरदार टैरिफ रेट लगभग 18 परसेंट था, जो कॉम्पिटिटर इक्वाडोर और इंडोनेशिया के 13-14 परसेंट से ज्यादा था।

अगस्त के बाद, भारत का टैरिफ का बोझ बढ़कर 58 परसेंट हो गया। भारत के प्रतिस्पर्धा वाले देश इक्वाडोर और इंडोनेशिया के लिए टैरिफ 18-49 परसेंट के बीच था। इससे US रिटेल और फूड सर्विस चैनल में भारत की कीमत की पहुँच कम हो गई है, जबकि प्रतियोगी सप्लायर को बढ़त मिली है।

जेम्स और ज्वेलरी को मिला बाजार

कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री के मुताबिक, सितंबर में US को जेम्स और ज्वेलरी का एक्सपोर्ट कुल 76 % गिरा है, लेकिन कुल निर्यात सिर्फ 1.5 फीसदी गिरा। यूएई को 79 फीसदी से ज्यादा निर्यात किया गया। वहीं हांगकांग को 11 फीसदी और बेल्जियम को 8 फीसदी ज्यादा निर्यात किया गया। इससे जेम्स एंड ज्वैलरी के क्षेत्र में पड़ने वाला जबरदस्त झटका काफी कम हो गया।

ऑटो पार्टस का बाजार संभला

ऑटो कंपोनेंट्स में भी ऐसा ही पैटर्न देखने को मिला। सितंबर में US को 12 परसेंट कम निर्यात किया जा सका। इसकी भरपाई जर्मनी, यूएई और थाईलैंड ने कर दी। इन देशों में कुल ऑटो कंपोनेंट एक्सपोर्ट 8 परसेंट बढ़ गए हैं।

संघर्ष करने वाले सेक्टर में सूती कपड़े, जूते, स्पोर्ट्स के सामान और कालीन

अमेरिकी टैरिफ से लड़ने में कई ऐसे सेक्टर हैं, जिन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें कॉटन टेक्सटाइल उद्योग, स्पोर्ट्स इंडस्ट्री, कालीन उद्योग और लेदर उद्योग शामिल हैं। चीन और ASEAN इकॉनमी से कड़े कॉम्पिटिशन और छोटी यूनिट्स की कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से इन उद्योगों को संघर्ष करना पड़ रहा है।

स्पोर्ट्स के सामान का करीब 40 फीसदी हिस्सा अमेरिका को निर्यात किया जाता था। इस क्षेत्र में दूसरा विकल्प अभी तक नहीं मिल पाया है। अमेरिका में ज्यादा टैरिफ की वजह से अक्टूबर में कुल निर्यात 6 फीसदी कम हो गया।

सूती कपड़ा उद्योग, जो पहले से ही वियतनाम और बांग्लादेश से कड़ी टक्कर के बीच बहुत मुश्किल से अपनी स्थिति बना पा रहा था, उसे भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इन सामानों को UAE, स्पेन, इटली और सऊदी अरब पहले से ज्यादा निर्यात किया गया। US जाने वाले सामानों में 25 फीसदी की गिरावट के बाद सितंबर 2025 में इस कैटेगरी में कुल 6 फीसदी निर्यात गिर गया।

जूता उद्योग में भी ऐसी ही कमी आई है। US के एक्सपोर्ट में भारी गिरावट के बाद कुल एक्सपोर्ट में 10 फीसदी की गिरावट आई। इसके बावजूद जिन क्षेत्रों ने अपने निर्यात को

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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