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VB-G RAM G में राज्य सरकारें भी देंगी 40% तक पैसा, जवाबदेही बढ़ाने के लिए बदला गया फंडिंग पैटर्न: समझिए- 2 गुना ज्यादा बजट से ग्रामीणों को कैसे मिलेगा फायदा

नए जी राम-जी बिल के तहत रोजगार से जुड़ी योजनाओं का खर्च अब केवल केंद्र सरकार पर निर्भर नहीं रहेगा। नए बिल में फंडिंग का नया पैटर्न सेट किया गया है।

संसद में विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)- VB-G RAM G विधेयक या जी राम-जी विधेयक पास हो गया। विपक्ष ने इसका नाम बदलने को लेकर विरोध किया, जबकि सरकार ने इसे महात्मा गाँधी नेशनल रूरल एम्पलॉयमेंट गारंटी एक्ट (MGNREGA या मनरेगा) की जगह कई बदलावों के साथ ग्रामीण विकास को नई दिशा देने वाला कदम बताया।

लोकसभा में सरकार ने कहा कि मनरेगा 20 साल पहले बनाई गई योजना है, तब से अब तक ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवर्तन हुए हैं। इसीलिए मनरेगा की जगह जी राम-जी कानून विकसित ग्रामीण भारत को ध्यान में रखते हुए लाया गया है। केंद्र सरकार ने VB-G RAM G योजना की फंडिंग को लेकर बड़ा बदलाव किया है। अब केंद्र सरकार ने इसकी फंडिंग में राज्य सरकारों को भी भागीदार बनाया है, ताकि इससे राज्यों की जवाबदेही भी बढ़ सके।

राज्य सरकार की फंडिंग का क्या है नया पैटर्न?

नए जी राम-जी बिल के तहत रोजगार से जुड़ी योजनाओं का खर्च अब केवल केंद्र सरकार पर निर्भर नहीं रहेगा। इस नए प्रस्ताव में साफ किया गया है कि राज्य सरकारों को भी रोजगार उपलब्ध कराने के लिए अपने बजट से पैसा देना होगा। नए बिल में फंडिंग का नया पैटर्न सेट किया गया है।

पुराने मनरेगा स्कीम में राज्य सरकारों को मजदूरी से जुड़ी कोई भी धनराशि नहीं देनी पड़ती थी। हालाँकि योजना से जुड़े कामों में सामग्री और अन्य खर्च राज्य सरकार देते थे, पर मनरेगा के तहत पूरी फंडिंग केंद्र सरकार देती थी। लेकिन अब इसमें बदलाव किया गया है।

प्रस्ताव के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघायल, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम), हिमालयी राज्यों (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) में रोजगार से जुड़े कुल खर्च का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देगी, जबकि 10 प्रतिशत राशि राज्य सरकार को अपने बजट से देनी होगी।

मनरेगा और जी राम-जी में मूलभूत अंतर (फोटो साभार: PIB)

वहीं अन्य सभी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और केरल में रोजगार से जुड़े खर्च का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी।

समझें- कितना खर्च करेगी सरकार? राज्यों का हिस्सा कितना होगा

केंद्र सरकार ने संसद में बताया है कि विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविक मिशन (ग्रामीण)- VB-G RAM G के लिए हर साल करीब ₹1,51,282 करोड़ का खर्च आएगा। ये राशि मजदूरी, सामग्री और प्रशासनिक कामों पर खर्च की जाएगी। इस राशि में राज्यों का हिस्सा भी शामिल है।

हालाँकि कुल ₹1,51,282 करोड़ में से केंद्र सरकार का अनुमानित हिस्सा ₹95,692.31 करोड़ होगा। इसके तहत केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के मानक लागत-साझाकरण अनुपात, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 की बढ़ी राशि और बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषण का प्रावधान है।

खास बात ये है कि केंद्र सरकार ने जो बजट इस योजना के लिए रखा है, वो मौजूदा 2025-26 में मनरेगा के लिए रखी गई ₹86,000 करोड़ के फंड से करीब 2 गुना होगा। अकेले केंद्र सरकार का खर्च भी पिछले खर्च से बढ़ेगा। जाहिर सी बात है कि अब तक लोगों को मिलने वाले 100 दिन के रोजगार की जगह जब 125 दिन का रोजगार मिलेगा, तो उनकी कमाई भी बढ़ेगी और सरकारों का खर्च भी।

राज्य पहले के ढाँचे के तहत, पहले से ही सामग्री और प्रशासनिक लागतों का एक हिस्सा वहन कर रहे थे, पर ये प्रक्रिया हमेशा विवादित रहती थी। राज्य अपने हिस्से के पैसों की माँग करते रहते थे, लेकिन अब केंद्र और राज्यों के खर्च का आँकड़ा साफ होने से न सिर्फ ये विवाद सुलझेगा, बल्कि फंड को लेकर पारदर्शिता भी आएगी।

राज्य की साझा फंडिंग से रोजगार में देरी का बहाना कैसे होगा खत्म?

अब रोजगार उपलब्ध कराने में देरी का बहाना खत्म हो जाएगा क्योंकि ‘जी राम-जी’ बिल में फंडिंग की जिम्मेदारी सिर्फ केंद्र सरकार तक सीमित नहीं रखी गई है। पहले मनरेगा में रोजगार के लिए पैसा पूरी तरह से केंद्र सरकार देती थी। लेकिन अब इस नई योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकारों की अनिवार्य वित्तीय हिस्सेदारी तय की गई है।

यानी अगर किसी राज्य में रोजगार की माँग बढ़ती है, तो वह यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि केंद्र से पैसा नहीं आया है। राज्यों को भी अपने बजट से तय हिस्सा देना होगा, जिससे फंड की उपलब्धता बनी रहेगी और काम शुरू करने में अनावश्यक देरी नहीं होगी। सरकार का कहना है कि यह प्रावधान मनरेगा के दौरान सामने आने वाली फंडिंग से जुड़ी अड़चनों को दूर करेगा।

इसके अलावा में फंड जारी करने की समयसीमा और जवाबदेही को भी स्पष्ट रूप से तय किया गया है। केंद्र या राज्य, दोनों में से अगर कोई तय समय पर पैसा जारी नहीं करता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी। इससे रोजगार के काम फाइलों में अटकने के बजाए जमीनी स्तर पर जल्दी शुरू हो सकेंगे।

रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया कैसे होगी तेज और प्रभावशाली?

नए ‘जी राम-जी’ विधेयक में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मिलने में तेजी और प्रभावशीलता दोनों बढ़ेंगी क्योंकि इसमें मनरेगा की तुलना में कई बदलाव किए गए हैं। सबसे पहले रोजगार की गारंटी 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिनों तक कर दी गई है, यानी अब हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को साल में 125 दिन मजदूरी का वैध अधिकार मिलेगा, जिससे काम के दिनों और आय दोनों में वृद्धि होगी। इससे गाँवों में ज्यादा दिन काम उपलब्ध किया जाएगा, जिससे ग्रामीणों को सालभर अधिक आमदनी हो सकेगी।

दूसरा, नए बिल में काम के भुगतान का तरीका भी सुधारा गया है। मजदूरी का भुगतान हफ्ते में एक बार या 15 दिनों के भीतर किया जाना अनिवार्य होगा, जिससे मजदूरों को पैसे जल्दी और नियमित तौर पर मिलेंगे और उन्हें लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

इसके अलावा योजना को चार प्रमुख क्षेत्रों- जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से जुड़े काम और आपदा-रोधई ढाँचे में विभाजित किया गया है, जिससे कामों की विविधता और गुणवत्ता बढ़ेगी और ग्रामीणों को विभिन्न प्रकार के अवसर मिलेंगे। इसका उद्देश्य है कि अब काम बिखरे हुए नहीं होंगे, बल्कि गाँव की असली जरूरतों के हिसाब से तय किए जाएँगे।

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पूजा राणा
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