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भारत में 4 करोड़ पीड़ित, दुनियाभर में 17 करोड़… 14 साल की चर्चा के बाद PCOS का नाम बदलकर किया PMOS: जानिए इससे महिलाओं के इलाज में कैसे होगा फायदा

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम महिलाओं से जुड़ी एक मेटाबॉलिक समस्या है। इसे ओवेरियन और गायनेकोलॉजिकल से जुड़ी समस्या माना जाता था, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है।

महिलाओं में होने वाली आम हार्मोनल दिक्कतें, जिसे मेडिकल की भाषा में PCOS यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम कहा जाता है, उसका नाम बदल दिया गया है। अब इसे PMOS यानी पोलीइंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम कहा जाएगा। विशेषज्ञों ने ये बदलाव बीमारी को सही तरीके से समझने में मदद करने के लिए किया है।

प्राग में आयोजित यूरोपीय एंडोक्रिनोलॉजी कॉन्ग्रेस में नए नाम की घोषणा के बाद ‘द लैंसेट’ ने 12 मई 2026 को इसे प्रकाशित किया। गौरतलब है कि दुनिया भर में हर 8 में से 1 महिला यानी करीब 170 मिलियन से ज्यादा महिलाएँ PMOS से पीड़ित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनुमान लगाया है कि प्रजनन आयु वाली 10% से 13% महिलाएँ इस समस्या से गर हैं।

कई क्षेत्रों में यह समस्या ज्यादा है। उदाहरण के लिए, उत्तरी यूरोप में यह समस्या दक्षिण एशिया की तुलना में कम है। हालाँकि डब्ल्यूएचओ यह भी बताता है कि इस विकार से पीड़ित 70% से अधिक महिलाएँ इसके बारे में जानती भी नहीं।

एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के एमआरसी (मेडिकल रिसर्च काउंसिल) सेंटर फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ के प्रोफेसर कॉलिन डंकन के हवाले से ‘द गार्जियन’ ने कहा है कि यह पुराना शब्द संभवतः तब प्रचलित हुआ, जब शोधकर्ताओं ने शुरू में महिला मरीजों के ओवरी की जाँच की और उनमें तरल पदार्थ से भरी कई छोटी-छोटी ग्रंथियाँ पाई गई। ये थैलियाँ फॉलिकल्स हैं, जो अंडाणु धारण करने वाली संरचनाएँ हैं। उन्होंने आगे कहा कि ये सिस्ट नहीं हैं।

स्वस्थ महिलाओं में हर महीने ओवरी के अंदर कई फॉलिकल्स विकसित होते हैं। अंततः, इनमें से एक मेच्योर होकर अंडाणु उत्पन्न करता है जबकि अन्य नष्ट हो जाते हैं। अगर महिला बीमार हो, तो कुछ फॉलिकल्स का विकास रुक जाता है और वे अंडाणु में नहीं बदल पाता। इसके लक्षण आमतौर पर टीनएज के शुरुआत में दिखने लगते हैं, लेकिन यह एक ऐसी समस्या है जो महिलाओं को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित कर सकती है।

क्यों बदला गया नाम

PCOS के नाम से ऐसा लगता था कि ये सिर्फ ओवरी के सिस्ट से जुड़ी बीमारी है, लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता। ये बीमारी सिर्फ पीरियड्स या ओवरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर पर असर डाल सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बीमारी को बेहतर तरीके से समझाने के लिए नया नाम PMOS दिया गया है। यह महिलाओं में होने वाले हॉर्मोनल और मेटाबॉलिक दिक्कतों को बताता है। इसमें वे सारी समस्याएँ मसलन पीरियड्स अनियमित होना, फर्टिलिटी, वजन असंतुलित होना, त्वचा संबंधी बीमारी और मेंटल हेल्थ भी आ सकते हैं।

शुरुआत में इसे केवल प्रजनन संबंधी बीमारी माना जाता था और उस समय इसे स्टीन लेवेंथल सिंड्रोम के नाम से जाना जाता था। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह इंसुलिन प्रतिरोध या रक्त में सामान्य इंसुलिन स्तर पर शरीर की प्रतिक्रिया करने में असमर्थता से भी जुड़ा हुआ है।

पीएमओएस के लक्षण

पीएमओएस की समस्या आने पर महिलाओं में पीरियड की साइकिल बिगड़ सकते हैं। चेहरे पर ज्यादा बाल या मुँहासे आ सकते हैं। वजन बढ़ना, प्रेग्नेंसी में दिक्कत, एंजायटी और डिप्रेशन जैसे लक्षण पाए जाते हैं। कई बार मरीज दिल की बीमारी, हाई कॉलेस्ट्रॉल, फैटी लीवर, स्लीपिंग दिक्कतें और डायबटीज, ब्लड प्रेशर का शिकार हो जाता है।

यह व्यक्ति के मनोविज्ञान को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाता है, जिससे डिप्रेशन, चिंता, जीवन की गुणवत्ता में कमी और खाने संबंधी दिक्कतें आती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी महिलाओं में ये ‘पुरुष वाले हार्मोन’ मौजूद होते हैं, लेकिन पीएमओएस से पीड़ित महिलाओं में इनकी मात्रा अत्यधिक होती है। फॉलिकल-स्टिम्युलेटिंग हार्मोन और ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन के बीच असंतुलन से स्थिति बिगड़ती है। इसके अलावा दूसरी वजहों से भी हॉर्मोनल दिक्कतें आती हैं।

(साभार- pmc.ncbi.nlm.nih.gov)

मोटापा इस बीमारी की एक वजह है। इसके कारण अतिरिक्त एंड्रोजन को अवशोषित करने वाले प्रोटीन का स्तर कम हो जाता है साथ ही यह इंसुलिन प्रतिरोध से भी जुड़ा हुआ है। पीएमओएस एक जेनेटिक बीमारी है, जो परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। एक्सपर्ट डंकन के मुताबिक, “इसका अर्थ है कि पॉलीसिस्टिक अंडाशय के बिना भी पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम हो सकता है, या अनियमित मासिक धर्म के बिना भी पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम हो सकता है।” वर्तमान में रोटरडैम सिस्टम का उपयोग इसके इलाज के लिए किया जाता है।

नाम में बदलाव और महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए इसका महत्व

पिछले 14 वर्षों से 56 रिसर्चर और संस्थानों ने पीसीओएस का नाम बदलने की वकालत की। एक सर्वेक्षण के दौरान 14360 जवाब मिले।

कुल मिलाकर 22000 लोगों को शामिल करते हुए एक व्यापक अभियान के बाद ऐतिहासिक निर्णय लिया गया और नाम बदलकर पीएमओएस किया गया। इसका शॉर्ट नाम है – पॉलीएंडोक्राइन यानी कई हार्मोन सिस्टम वाला। मेटाबोलिक: मेटाबॉलिज्म से जुड़ा इंसुलिन, ब्लड शुगर कंट्रोल, ब्लड प्रेशर जैसी समस्या है। ओवेरियन यानी ओवरी और सिंड्रोम यानी लक्षणों का एक साथ होना।

इसको देखते हुए विशेषज्ञों ने पीसीओएस का नाम बदला, क्योंकि इसमें सिर्फ पीरियड्स से जुड़ी समस्याएँ आती हैं। नया नाम यह बताता है कि यह सिर्फ ओवरी की ही नहीं, बल्कि पूरे शरीर में इससे दिक्कत आ सकती है। जानकारों के मुताबिक, नाम बदलने से बीमारी के प्रति जागरुकता बढ़ेगी और महिलाओं को सही इलाज मिल पाएगा।

भारत के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में पीएमओएस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, खासकर शहरी युवा महिलाओं और टीनएजर में। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (PCMR) की पीसीओएस जाँच में पाया गया है कि इससे पीड़ित महिलाओं की संख्या 3.7% से लेकर 22% तक हो सकती हैं। जानकारों के मुताबिक, दिनचर्या में गड़बड़ी, शहरी जीवनशैली, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन, बढ़ता मोटापा, नींद नहीं आना और तनाव महिलाओं में तेजी से बढ़ा है।

ऐसी महिलाओं में कम उम्र में ही मेटाबॉलिज्म संबंधी समस्याओं का खतरा होता है। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पीएमओएस से पीड़ित लगभग एक तिहाई भारतीय महिलाओं में मेटाबोलिक सिंड्रोम पाया जाता है।

नाम बदलने से महिलाओं को होगा फायदा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, इस स्थिति से जुड़े लक्षणों को कई जगहों पर सामाजिक रूप से हीन भावना से देखा जाता है। इससे परिवारिक और सामाजिक संबंध, नौकरी के अवसर में कमी, अपनेपन की भावना, मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचता है। डिप्रेशन, चिंता, नकारात्मक भावनाएँ इनलोगों में अधिक होती है।

महिलाओं में अपने शरीर के प्रति जागरूकता की कमी देखी गई है। महिलाएँ अपनी स्थिति को बाहरी दुनिया के सामने व्यक्त करने में असमर्थ होती हैं, तो वे खुद को अलग-थलग और एकांत में रहना पसंद करती हैं। इसे मासिक धर्म और प्रेग्नेंसी से जुड़े होने के कारण इस विषय पर खुल कर बात नहीं करतीं।

पीसीओएस का नाम बदलकर पीएमओएस करना सिर्फ शब्दावली में बदलाव नहीं है। यह बताता है कि लोगों में मेडिकल साइंस को लेकर समझ बढ़ रही है। हालाँकि अभी और भी जागरुकता की जरूरत है। अगर महिलाएँ अपनी समस्या नहीं बताएँगी, तो उसका इलाज कैसे होगा।

(मूलरूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade. Nearing three years in the profession.

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