Thursday, January 28, 2021
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CAA के विरोध में हैं BHU के 51 प्रोफेसर? वामपंथी प्रोपेगेंडा के शिकार कई प्रोफेसरों ने कहा- धोखे से लिया गया हस्ताक्षर

समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अजीत कुमार पांडेय ने बताया कि किस से तरह से बिना मूल उद्देश्य को बताए उनका हस्ताक्षर लिया गया। इसके साथ ही विभिन्न मीडिया संस्थानों पर उनके नाम से चलाए जा रहे बयान का भी उन्होंने खण्डन किया है। उन्होंने कहा है कि वो सीएए का विरोध नहीं करते हैं।

ख़बर आई थी कि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के 51 प्रोफेसरों ने केंद्र सरकार के नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हस्ताक्षर अभियान चला कर के विरोध जताया है? जिसे कई मीडिया संस्थानों ने छापा भी, बिना उन प्रोफेसरों से बात किए या कन्फर्म किए। जबकि पत्र का स्वरूप और शैली देखकर कई लोगों ने संदेह जताया था कि ये भी वामपंथी प्रोपेगेंडा हो सकता है। शाम होते-होते BHU में CAA समर्थक छात्रों और कई प्रोफेसरों ने इसे खारिज करना शुरू कर दिया। छात्रों ने तो बाकायदा इस वामपंथी प्रोपेगेंडा के जवाब में उन्हीं की शैली में पोस्टर वॉर भी छेड़ दिया।

सबसे पहले एक नजर आप उस पर्चे को देख सकते हैं, जिसे सीएए-NRC के विरोध में कहकर 51 प्रोफेसरों के नाम और हस्ताक्षर के साथ सर्कुलेट किया गया था।

बीएचयू के प्रोफेसरों का CAA के विरोध में कथित प्रेस रिलीज-1

बाकायदा बीएचयू के प्रोफेसरों के नाम से एक प्रेस रिलीज जारी हुआ, जिसके बारे में दावा किया गया कि सीएए-NRC के विरोध को 51 प्रोफेसरों ने हस्ताक्षर करके समर्थन दिया है। आप 51 प्रोफेसरों के हस्ताक्षर देख सकते हैं, जिनके बारे में दावा किया गया कि वो सरकार के इस कानून के विरोध में हैं।


बीएचयू के प्रोफेसरों का CAA के विरोध में कथित प्रेस रिलीज-2 और 51 प्रोफेसरों के हस्ताक्षर वाला पैम्पलेट

इसी रिलीज के आधार कुछ मीडिया संस्थानों ने ये खबर चलाई कि बीएचयू के प्रोफेसरों ने हस्ताक्षर कर सीएए और NRC का विरोध किया है।

‘भाषा’ (PTI) ने बीएचयू को लेकर चलाई खबर

जनसत्ता ने भी दावा किया कि बीएचयू के 51 प्रोफेसर सीएए और NRC के विरोध में हैं और उन्होंने केंद्र सरकार के इस क़दम का विरोध किया है। हालाँकि, ‘जनसत्ता’ ने ‘भाषा’ के हवाले से ये ख़बर चलाई थी। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने भी ‘पीटीआई’ के हवाले से ही इस ख़बर को आगे बढ़ाया। साथ ही कई अन्य मीडिया समूहों ने भी।

इस खबर के बाहर आते ही BHU के छात्रों ने उन प्रोफेसरों से मिलकर कारण जानना चाहा तो कई प्रोफेसरों ने इस प्रेस रिलीज से अनभिज्ञता जाहिर की। बता दें कि बड़े पैमाने पर BHU के छात्रों ने सरकार के नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन किया था। और इसके सम्बन्ध में रैली निकालकर एकजुटता भी प्रदर्शित की थी। हालाँकि वामपंथी संगठन जॉइंट एक्शन कमिटी के तहत मुट्ठी भर छात्रों ने CAA और NRC का विरोध भी किया गया था। जिनकी संख्या कम होने के कारण उन्हें BHU के राष्ट्रवादी छात्रों का आक्रोश और विरोध भी झेलना पड़ा था। मीडिया गिरोह ने यहाँ भी विरोध की खबर को प्रमुखता दी थी और समर्थन की खबर को दबा दिया था।

अब जब छात्रों के अनुसार वामपंथी धड़े के द्वारा ही छल से हस्ताक्षर करा कर एक CAA और NRC के विरोध में पर्चा रिलीज किया गया तो इसके विरोध में छात्रों ने प्रोफेसरों के हस्ताक्षर वाले कागज का पोस्टर बनाकर पूरे बीएचयू में पोस्टर वॉर छेड़ दिया। BHU के CAA और NRC समर्थक छात्रों ने वामपंथी और देश विरोधी तथाकथित प्रेस रिलीज का मुखर विरोध करते हुए, प्रतिउत्तर में जो पोस्टर लगाए हैं उन पोस्टरों में लिखा है, “रोहिंग्या की गोद में खेले हैं, ये हाफिज के चेले हैं‘” कई अन्य पोस्टरों में लिखा हुआ है- “ये घुसपैठियों के यार हैं, पहचान लो ये गद्दार हैं।

बीएचयू में सीएए समर्थकों के पैम्प्लेट्स पर लिखा गया- “ये घुसपैठियों के यार हैं

ऑपइंडिया ने छात्रों से बात की तो बताया गया कि BHU के ज़्यादातर प्रोफ़ेसर देश विरोधी नहीं हैं। ये चंद वामपंथी प्रोफेसरों, छात्रों और उनके उनके अफवाह तंत्र द्वारा फैलाया गया एक प्रोपेगेंडा है। जिसकी पोल खुद कई प्रोफेसरों ने ही खोल दी। कई प्रोफेसरों ने आरोप लगाया है कि उनसे धोखे से हस्ताक्षर करा लिया गया था कि CAA और NRC पर अकादमिक चर्चा होगी। और बिना उनकी अनुमति के ऐसा प्रचारित कर दिया कि ये सारे प्रोफेसर सीएए-NRC के विरोध में हैं। कई प्रोफेसरों ने अपने बयान में कहा कि ये झूठ है। हम सरकार के खिलाफ नहीं हैं तो कुछ वामपंथी प्रोफेसरों ने हामी भी भरी कि उन्हें इस सरकार से कोई काम नहीं है तो वे इसका विरोध करते हैं। लेकिन यहाँ भी देश विरोधी प्रोफेसरों की संख्या बहुत कम है। कहा जा रहा है ऐसे ही कुछ वामपंथी प्रोफेसरों ने गलत मंशा से बाकी प्रोफेसरों का धोखे से हस्ताक्षर लेकर PTI के माध्यम से छपवा दिया।

समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अजीत कुमार पांडेय ने बताया कि किस से तरह से बिना मूल उद्देश्य को बताए उनका हस्ताक्षर लिया गया। इसके साथ ही विभिन्न मीडिया संस्थानों पर उनके नाम से चलाए जा रहे बयान का भी उन्होंने खण्डन किया है। उन्होंने कहा है कि वो सीएए-NRC का विरोध नहीं करते हैं। प्रोफेसर पांडेय ने कहा:

“मैंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है, जिसमें सीएए, एनआरसी या फिर एनपीआर का विरोध किया गया हो। ऐसी बातें मिथ्या है। ये झूठ है कि मैं सीएए का विरोधी हूँ। यूनिवर्सिटी के शिक्षक होने के नाते हमारे हर बयान के पीछे कुछ कारण होता है। हम एक लोकतंत्र में रहते हैं और जनता के फायदे के लिए सरकार जो भी करने की कोशिश कर रही है, उसका समर्थन किया जाना चाहिए। जनसत्ता ने मेरे से कोई बातचीत नहीं की है। सीएए जनता के फ़ायदे के लिए है। आम जनता को फायदा होना चाहिए।”

प्रोफेसर पांडेय ने वामपंथियों के साज़िश का भंडाफोड़ करते हुए आगे बताया:

अगर कहीं दिक्कत है तो सरकार चर्चा करेगी। इस बारे में सीधे प्रधानमंत्री को भी लिखा जा सकता है। अगर सरकार के काम में कोई खामी है तो हमें उसे ध्यान दिलाना चाहिए। मैं आश्चर्यचकित हूँ। मैंने सरकार या सीएए के ख़िलाफ़ कोई बयान नहीं दिया। जिस पैम्पलेट में प्रोफेसरों का हस्ताक्षर दिख रहा है, उसे धोखे से साइन कराया गया। कहा गया कि सीएए पर चर्चा होगी और हस्ताक्षर ले लिया गया। जब सीएए जनता के फायदे के लिए है, तो उसके विरोध में स्टैंड क्यों लूँगा मैं?”


समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अजीत कुमार पांडेय का बयान

कई और प्रोफेसरों ने भी इस बात की पुष्टि की कि उनका हस्ताक्षर बिना प्रयोजन बताए लिया गया था। इससे यह साबित हो जाता है कि जिस पैम्पलेट में प्रोफेसरों के हस्ताक्षर के साथ दावा किया गया था कि वो सभी सीएए-NRC के विरोध में हैं, वो फ़र्ज़ी निकला। उस पैम्पलेट में कहा गया था कि ये क़ानून स्वीकार्य नहीं है और ये बँटवारे की भावना फैला रहा है। जबकि अब कई प्रोफेसरों ने खुलेआम ऐसी किसी बात का समर्थन करने से इनकार किया है।

इस खंडन के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को लेकर फैलाया जा रहे लेफ्ट-कॉन्ग्रेसी प्रोपेगण्डे की पोल खुल गई है। जिन 51 शिक्षको को लेकर पूरे देश मे यह माहौल बनाया जा रहा था कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के बहुत सारे शिक्षक CAA और NRC के ख़िलाफ़ हैं, वह फेक और झूठा साबित हुआ।

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रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

 

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