Wednesday, September 23, 2020
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मक़बूल शेरवानी: कश्मीर के रखवाले मुस्लिमों की कहानी (भाग 2)

यूँ तो बारामुला से श्रीनगर एकदम सीधा सपाट मात्र 60-65 किमी का रास्ता है लेकिन मक़बूल शेरवानी ने पाकिस्तान की फ़ौज को गलत रास्ता बता दिया और पहाड़ों से होकर जाने की सलाह दी।

सन 1947 में अंग्रेज़ों ने स्वतंत्रता के उपहार स्वरूप दो डोमिनियन दिए थे- भारत और पाकिस्तान। उस समय कश्मीर के महाराजा हरि सिंह यह तय नहीं कर पा रहे थे कि भारत और पाकिस्तान में से किसके साथ जाएँ। उधर पाकिस्तान ने अपनी चालें सोच रखी थीं। सोची समझी रणनीति के तहत पाकिस्तान ने क़बाइलियों की फ़ौज जम्मू कश्मीर राज्य की तरफ भेज दीं।

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क़बाइलियों के साथ मिलकर पाकिस्तानी फ़ौज ने बारामुला में शैतानी क़हर ढाया। हिन्दू, मुस्लिम, सिख जो भी उन्हें रास्ते में मिला उसे मारा-काटा। मारकाट करने के साथ ही क़रीब 280 ट्रक लूटकर पाकिस्तान ले गए। बारामुला को बर्बाद करने के बाद पाकिस्तानी फ़ौज श्रीनगर की तरफ बढ़ी। रास्ते में उन्हें एक 19 वर्षीय लड़का मक़बूल शेरवानी मिला जिससे पाकिस्तानी फ़ौज ने श्रीनगर जाने का रास्ता पूछा।

यूँ तो बारामुला से श्रीनगर एकदम सीधा सपाट मात्र 60-65 किमी का रास्ता है लेकिन मक़बूल शेरवानी ने पाकिस्तान की फ़ौज को गलत रास्ता बता दिया और पहाड़ों से होकर जाने की सलाह दी। इसके कारण पाकिस्तानियों को श्रीनगर जाने में देर हुई और भारतीय सेना को कश्मीर में तैनात होने के लिए पर्याप्त समय मिला।

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मक़बूल शेरवानी ने पाकिस्तान की फौजों को बरगला दिया यह कहकर कि भारतीय सेनाएँ बारामुला तक पहुँच गई हैं। पाकिस्तानी फ़ौज इस बहकावे में आ गई और उसे श्रीनगर पहुँचने में देर हुई जिसके कारण भारतीय सेना की 1 सिख रेजिमेंट 27 अक्टूबर को श्रीनगर पहुँची और कबाइलियों को खदेड़ने में सफल हुई। उस दिन को भारतीय सेना ‘इन्फैंट्री डे’ के रूप में मनाती है।

मक़बूल शेरवानी के इस कृत्य को आज भी याद किया जाता है और बारामुला में भारतीय सेना ने उसका स्मारक भी बनवाया है। प्रसिद्ध उपन्यासकार मुल्कराज आनंद मक़बूल शेरवानी से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने उसके ऊपर एक उपन्यास लिखा जिसका शीर्षक था: Death of a Hero. इस उपन्यास में एक स्थान पर मक़बूल शेरवानी से फैक्ट्री का मालिक सय्यद मुरातिब अली कहता है कि हालात ख़राब हैं और कश्मीर छोड़कर भाग जाना चाहिए। इसपर मक़बूल उत्तर देता है कि वो नहीं भागेगा। मक़बूल कहता है कि यदि हमें ‘मुस्लिम कट्टरपंथियों’ से उसी तरह आज़ादी चाहिए जैसे अंग्रेज़ों की गुलामी से ली थी तो हमें संघर्ष करना होगा।

मक़बूल का यह संघर्ष उसकी साँसें चलने तक चला था। जब पाकिस्तानियों को पता चला कि एक उन्हें एक किशोर ने बेवकूफ़ बना दिया था तब वे लौटे और मुल्कराज आनंद के इस हीरो को वास्तव में इतना मारा कि हैवानियत की भी रूह काँप गई। मारने से पहले उन्होंने मक़बूल को पाकिस्तानी फ़ौज में शामिल होने का न्योता भी दिया था लेकिन मक़बूल ने साफ़ इनकार कर दिया था। तब उन्होंने मक़बूल को मार कर सलीब पर टाँग दिया था ताकि देखने वाले हमेशा ख़ौफ़ में रहें। इतने पर भी खूनी खेल खेलने से मन नहीं भरा तो उसके मृत शरीर में दस पंद्रह गोलियाँ और दाग दीं।

कश्मीर में पाकिस्तान परस्त मानसिकता से लोहा लेने वाला अकेला मक़बूल शेरवानी ही नहीं हुआ। नब्बे के दशक में अलगाववादी आतंकी गुटों के खिलाफ आत्मसमर्पण कर चुके आतंकियों की ‘इख़्वान’ फ़ौज खड़ी की गई थी जिसका नायक था कूका परे। कूका परे ने आतंकवादियों के सफाए में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसकी सज़ा आतंकवादियों ने 2003 में उसकी जान लेकर दी थी जब वह क्रिकेट मैच का उद्घाटन करने जा रहा था।

जून 2017 में श्रीनगर में नौहट्टा मस्जिद के पास पाकिस्तान और अल-क़ायदा समर्थन में नारे लगाने वालों की भीड़ ने डीएसपी अयूब पंडित की हत्या कर दी थी। इसी प्रकार गत वर्ष राइफलमैन औरंगज़ेब को मार दिया गया था। औरंगज़ेब उस टीम का हिस्सा थे जिसने हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन कमांडर समीर टाइगर को ढेर किया था। औरंगज़ेब को मारने से पहले आतंकियों ने डेढ़ मिनट का वीडियो बनाया था। वीडियो बनाने के पीछे वही मानसिकता थी जिसने सत्तर साल पहले मक़बूल शेरवानी की हत्या कर सलीब पर लटका दिया था।

इसी तरह छुट्टियों में घर आए लेफ्टिनेंट उमर फ़ैयाज़ को शोपियाँ में तब मार दिया गया था जब वे निहत्थे थे। उनके हत्यारों और अन्य आतंकियों को पकड़ने के लिए 25 नवंबर 2018 को एक ऑपरेशन चलाया गया जिसमें राष्ट्रीय राइफल्स के लांस नायक नज़ीर अहमद वानी ने सर्वोच्च बलिदान दिया। नज़ीर वानी को उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। आतंकियों की नज़र में नज़ीर भी खटकते थे क्योंकि वह भी पहले इख़्वान के सदस्य रह चुके थे।

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