Saturday, July 24, 2021
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स्कूली किताबों से हटे मुगलों का फर्जी इतिहास: RSS संबंधी संगठनों ने की संसदीय समिति से सुधार की माँग

स्कूल शिक्षा विभाग ने सदस्यों को सूचित किया कि एनसीईआरटी हमारे राष्ट्रीय नायकों और देश की घटनाओं के बारे में 'गैर-ऐतिहासिक तथ्यों' और 'विकृतियों' से जुडी तमाम शिकायतों का विश्लेषण करेगा और जाँच के लिए एक पैनल गठित करने जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े दक्षिणपंथी संगठन भारतीय शिक्षा मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (SSUN), शिक्षाविद जेएस राजपूत और शंकर शरण ने बुधवार (जनवरी 13, 2021) को स्कूल की पाठ्यपुस्तक और पाठ्यक्रम में सुधारों पर चर्चा करने के लिए एक संसदीय पैनल से मुलाकात की। इस संगठन के प्रतिनिधियों ने NCERT द्वारा मुगलों के फर्जी महिमामंडन आदि ‘गैर-ऐतिहासिक दावों’ को पाठ्यक्रम से हटाने की भी माँग की और भारतीय इतिहास की महान महिलाओं की भूमिका को उजागर करने पर जोर दिया।।

दरअसल, यह खुलासा हाल ही में एक RTI के जरिए सामने आया था कि NCERT के पास कक्षा-12 के पाठ्यक्रम में शामिल किए गए उन दावों का कोई आधिकारिक स्रोत नहीं है, जिसमें बताया जाता है कि मुगलों ने नष्ट हो चुके मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शिक्षा शाखा, विद्या भारती के पूर्व प्रमुख दीना नाथ बत्रा की अध्यक्षता वाले SSUN को मंगलवार (जनवरी 12, 2021) को शिक्षा, महिलाओं, बच्चों, युवाओं और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति की बैठक में आमंत्रित किया गया था। बैठक में स्कूली शिक्षा, NCERT और CBSE विभाग के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत, एनसीईआरटी के शंकर शरण, एसएसयूएन और आरएसएस से जुड़े भारतीय शिक्षा मंडल (बीएसएम) ने समिति के समक्ष अपना पक्ष रखा।

पैनल में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (SSUN) ने कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘अंतराल’ में चित्रकार एमएफ हुसैन के एक अध्याय पर आपत्ति जताई। न्यास ने कहा कि छात्रों के लिए ऐसे व्यक्ति के जीवन का अध्ययन करना अनावश्यक है, जिस पर अश्लीलता को बढ़ावा देने और धार्मिक भावनाओं को अपमानित करने का आरोप लगा हो।

आरएसएस से जुड़े संगठन ने कक्षा 6 इतिहास की पाठ्यपुस्तक के अध्याय 5 में ‘वर्ण व्यवस्था’ पर दिए गए खंड पर भी आपत्ति जताई है, जिसमें कहा गया है कि ‘पंडितों ने लोगों को चार समूहों में विभाजित किया है, जिन्हें वर्ण कहा जाता है’ और दावा किया जाता है कि ‘पंडितों के कहने पर इन समूहों के वर्गीकरण का आधार उनके ‘जन्म’ को बनाया गया। न्यास ने पूछा कि क्या कक्षा 6 के छात्रों के मन में एक वर्ग के प्रति शत्रुता को बढ़ावा देना उचित है?

समाचार पत्र ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनावरण के बाद पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों के विचार माँगे गए थे। वर्ष 2005 के बाद से पाठ्यपुस्तकों की कोई समीक्षा नहीं हुई है। इसलिए यह कार्य शुरू हो गया है और आने वाले दिनों में विशेषज्ञों और संगठनों के विचारों को सुना जाएगा। उन्होंने कहा, चूँकि यह एक सर्वदलीय संसदीय पैनल है, इसलिए इस सम्बन्ध में अलग-अलग मतों को सुना जाएगा।

शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति की बैठक में चर्चा किए गए मुद्दों में बोर्ड परीक्षा के लिए व्यापक प्रश्न बैंक के विचार के साथ-साथ स्कूलों को फिर से खोलने पर भी विचार किया गया। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी के विधायक विनय सहस्रबुद्धे इस समिति के प्रमुख हैं।

स्कूल शिक्षा विभाग ने सदस्यों को सूचित किया कि एनसीईआरटी हमारे राष्ट्रीय नायकों और देश की घटनाओं के बारे में ‘गैर-ऐतिहासिक तथ्यों’ और ‘विकृतियों’ से जुडी तमाम शिकायतों का विश्लेषण करेगा और जाँच के लिए एक पैनल गठित करने जा रही है।

विवादित रहा है ‘मार्क्सवादी हाथों से लिखा’ गया भारत का इतिहास

नई शिक्षा नीति के उद्घाटन के बाद से ही स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम और विषय निरंतर ही चर्चा का विषय रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी परंपरागत ‘मार्क्सवादी साहित्य’ की जगह वास्तविक तथ्यों को बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की बात हमेशा से ही बहस का विषय रहा है और हाल ही के कुछ दिनों में यह तेज हुई है।

NCERT के अंतर्गत पढ़ाए जाने वाले विषय और उसके लेखकों के वामपंथी रुझानों पर अक्सर ही सवालिया निशान भी उठते आए हैं। ऐसा ही एक उदाहरण एक RTI के माध्यम से भी प्रकाश में आया है। इस RTI के जारी यह तथ्य सामने आया है कि जिन मुगलों का महिमाकरण हमारे पाठ्यक्रमों में अक्सर होता आया है, उसका कोई आधिकारिक स्रोत मौजूद ही नहीं है और यह एकदम काल्पनिक बात है।

ऐसे में, लोगों की माँग यही है कि स्कूलों के पाठ्यक्रम को नए नजरिए से लिखे जाने और समीक्षा की आवश्यकता रही है। नई शिक्षा नीति-2020 को कैबिनेट की मंज़ूरी मिलने के बाद लोग यही चाहते हैं कि नया पाठ्यक्रम तथ्यपरक हो और इसमें वामपंथी अजेंडे के लिए शून्य जगह रहे। इससे पहले, वर्ष 1986 में शिक्षा नीति लागू की गई थी और 1992 में इस नीति में कुछ संशोधन किए गए थे।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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