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बॉम्बे HC ने नरेंद्र दाभोलकर हत्या मामले में शरद कालस्कर को दी जमानत, मुख्य गवाहों के बयानों पर जताई गंभीर चिंता: CBI को भी पड़ी फटकार, पढ़ें डिटेल्स

कोर्ट ने अभियोजन के एक प्रमुख गवाह किरण कांबले की गवाही का उल्लेख किया, जिन्होंने बताया था कि उन्हें पटाखों जैसी आवाज सुनाई दी थी लेकिन जिरह के दौरान गोलियों के बीच के अंतराल को लेकर अनिश्चितता व्यक्त की। ट्रायल कोर्ट ने भी दर्ज किया कि वह 'सेकंड और मिनट' के बीच स्पष्ट नहीं थे।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार (29 अप्रैल 2026) को 29 वर्षीय शरद कलास्कर को नास्तिक, तर्कवादी और अंधविश्वास-विरोधी ‘एक्टिविस्ट’ डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में जमानत दे दी। गौरतलब है कि कोर्ट ने कलास्कर की लंबी कैद और हमलावरों में से एक के रूप में उनकी पहचान को लेकर प्रथम दृष्टया संदेह जताते हुए यह कदम उठाया है।

कलास्कर को 50,000 रुपए का जमानत बांड जमा करने का निर्देश दिया गया है। यह फैसला जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रणजीतसिंह भोंसले की डिवीजन बेंच ने सुनाया। CBI ने इस फैसले पर 4 हफ्ते की रोक लगाने की माँग की लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

जस्टिस गडकरी ने कहा, “चूँकि हमने पहले ही कालस्कर की हमलावर के रूप में पहचान पर संदेह जताया है, इसलिए इस आदेश पर रोक लगाने का कोई प्रश्न नहीं उठता।”

जाँच में खामियों की ओर कोर्ट का इशारा

कोर्ट ने अभियोजन के एक प्रमुख गवाह किरण कांबले की गवाही का उल्लेख किया, जिन्होंने बताया था कि उन्हें पटाखों जैसी आवाज सुनाई दी थी लेकिन जिरह के दौरान गोलियों के बीच के अंतराल को लेकर अनिश्चितता व्यक्त की। ट्रायल कोर्ट ने भी दर्ज किया कि वह ‘सेकंड और मिनट’ के बीच स्पष्ट नहीं थे।

खंडपीठ ने बताया, “एक बात रिकॉर्ड में दर्ज नहीं की गई है, जैसे कि ‘उसने पुलिस को बताया था कि पटाखों जैसी आवाज सुनकर उसका ध्यान उस ओर गया। मैंने यह भी बताया था कि दोनों लड़कों में से एक लंबा था और दूसरा थोड़ा छोटा।’ गोलियों के बीच का समय अंतराल एक से दो मिनट या एक से दो सेकंड था।”

अदालत ने कहा कि पुलिस ने कांबले को सिर्फ वही स्केच नहीं दिखाया था जो उसके बताए हुलिए के आधार पर बनाया गया था बल्कि कुछ और लोगों के स्केच भी दिखाए थे। कांबले ने यह भी माना कि उसे याद नहीं है कि 2 सितंबर 2013 को उसे वह स्केच दिखाया गया था या नहीं। सबसे अहम बात यह रही कि उसे एक और स्केच भी दिखाया गया लेकिन उसने कहा कि वह स्केच उसके बताए गए हुलिए से बने स्केच जैसा नहीं था।

उनका बयान ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के समक्ष 12 अप्रैल 2019 को दर्ज किया गया। इसके बाद उन्हें पुणे के पुलिस आयुक्त कार्यालय में घटना के संबंध में जानकारी देने के लिए बुलाया गया। कोर्ट ने उल्लेख करते हुए कहा, “उस समय उन्होंने पुलिस को बताया कि उन्होंने उक्त घटना के बारे में कुछ नहीं देखा था।”

साफ खामियों ने खींचा कोर्ट का ध्यान

दूसरे प्रमुख गवाह विनय केलकर को खड़की स्थित CBI कार्यालय में बुलाया गया, जहाँ उन्हें कई तस्वीरें दिखाई गईं। उन्होंने 10 से 12 तस्वीरों के समूह में से 2 तस्वीरें चुनीं, जिन्हें उन्होंने घटना के समय देखे गए व्यक्तियों की तस्वीरें बताया। उन्होंने आश्वासन दिया कि तस्वीरों में चेहरे 80 से 85% तक मेल खाते हैं।

जिरह के दौरान उन्होंने बताया कि घटना के दिन ही पुलिस ने उनके सहयोग से व्यक्तियों के स्केच बनाए थे। हालाँकि केलकर को यह याद नहीं था कि 30 जनवरी 2015 को उनके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर दूसरा स्केच बनाया गया था या नहीं। लगभग एक वर्ष बाद उन्हें मीनानाथ नामक व्यक्ति के साथ खड़की स्थित CBI कार्यालय में बुलाया गया, जहाँ उन्हें कुछ स्केच दिखाए गए।

उनके हस्ताक्षर कागजों के पीछे लिए गए और केलकर ने कहा कि समानता 70 से 80% के बीच थी। फिर भी, उन्होंने खुलासा किया कि स्केच उनके द्वारा दिए गए विवरण को सटीक रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता था। 20 अगस्त 2013 को उनके द्वारा वाहन चला रहे व्यक्ति के विवरण के आधार पर एक चित्र बनाया गया था।

कोर्ट ने कहा, “इस गवाह ने यह स्वीकार किया है कि CBI अधिकारी द्वारा पूछताछ के दौरान ऐसा नहीं हुआ कि उसने बताया हो कि स्केच में दिखाया गया व्यक्ति वाहन चला रहा था और वह उसके घर के सामने से गुजरा था।”

4 सितंबर 2016 को जाँच एजेंसी को दिए गए बयान को पढ़कर सुनाया गया और उन्होंने जवाब दिया कि वह गलत था। इसके अलावा वह 2015-2016 से पढ़ने के लिए चश्मा उपयोग कर रहे हैं और घटना के लगभग 20 से 25 मिनट बाद स्नान करने के बाद घटनास्थल पर गए। वह अपने घर के पास स्थित कार्यालय जाने की योजना बना रहे थे।

कोर्ट ने कहा, “उन्होंने यह देखने के लिए इंतजार नहीं किया कि कोई घायल की मदद कर रहा है या नहीं। उन्होंने तुरंत घर में किसी को घटना के बारे में नहीं बताया। इस गवाह ने स्वीकार किया कि स्नान करने के बाद वह कार्यालय जाने की तैयारी में घर से बाहर आए थे।”

केलकर बालकनी में उसी स्थिति में थे जब हमलावर उनकी ओर आए और दोपहिया वाहन स्टार्ट किया। बेंच ने घटना के बाद तुरंत प्रतिक्रिया न देने को अनुचित बताया। यह दोहराया गया कि उन्होंने घटना को अपनी बालकनी से लगभग 500 मीटर की दूरी से देखा।

कोर्ट ने 27 दिसंबर 2018 को दिए गए उनके बयान का हवाला देते हुए बताया कि उन्होंने कहा था, “मैं, विनय केलकर, यह घोषित करता हूँ कि हत्या की घटना 5 वर्ष पहले हुई थी और वह स्थान मुझसे काफी दूर था। मैं घोषित करता हूँ कि संदिग्धों के चेहरे अपराधियों से मिलते-जुलते हैं, हालाँकि मैं उन्हें पूरी तरह पहचान नहीं सकता।”

कोर्ट ने CBI को लगाई फटकार और आवेदक के पक्ष में दिया फैसला

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन ने हमलावर के रूप में उसकी पहचान स्थापित करने के लिए मुख्य रूप से दो प्रत्यक्षदर्शियों पर भरोसा किया, जो आवेदन में एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। उनकी गवाही और जिरह की सावधानीपूर्वक समीक्षा करने के बाद उन्हें ऐसे ‘संयोगवश गवाह’ बताया गया जिनका कथित रूप से घटना देखने के बाद का व्यवहार सामान्य मानवीय व्यवहार से मेल नहीं खाता।

बेंच ने कहा, “हालाँकि उन्होंने मृतक दाभोलकर पर हुए भयानक हमले को देखा, फिर भी दोनों गवाहों ने पहले अपने दैनिक कार्यों को प्राथमिकता दी और उसके बाद आराम से पुलिस के पास जानकारी देने गए। हमारे अनुसार इन दोनों गवाहों का व्यवहार सामान्य समझ वाले व्यक्ति का नहीं है और यह कोर्ट के मन में इस बात पर संदेह उत्पन्न करता है कि क्या उन्होंने वास्तव में घटना देखी थी।”

यह बताया गया कि हत्या 20 अगस्त 2013 को हुई थी, जबकि कालस्कर को 3 सितंबर 2018 को गिरफ्तार किया गया। कोर्ट ने CBI के उस प्रयास की भी आलोचना की जिसमें पहचान स्थापित करने के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) के बजाय फोटो पहचान का उपयोग किया गया।

कोर्ट ने कहा, “हालाँकि जाँच एजेंसी के पास कालस्कर की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड कराने का पूरा अवसर था लेकिन जाँच अधिकारी ने उसकी पहचान स्थापित करने के लिए उसके फोटो गवाहों को दिखाए, जबकि वह पहले से ही हिरासत में था।” कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसी पहचान अपनी विश्वसनीयता खो देती है।

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा, “पहचान परेड अनिवार्य नहीं है, न ही आरोपित इसे अपने अधिकार के रूप में माँग सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जाँच सही दिशा में चल रही है और बाद में कोर्ट में दी जाने वाली गवाही को समर्थन प्रदान करना है। यदि आरोपित गवाह या पीड़ित के लिए पूरी तरह अजनबी है, तो पहचान परेड वांछनीय होती है, जब तक कि गवाह ने उसे कुछ समय तक देखा न हो।”

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि कालस्कर 3 सितंबर 2018 से जेल में है और उसने प्री-ट्रायल और पोस्ट-कन्विक्शन दोनों चरणों में 7.5 वर्ष से अधिक का कारावास झेला है। साथ ही अपीलों के चलते उसके मामले की अंतिम सुनवाई जल्द होने की संभावना कम है।

बेंच ने कहा, “आवेदन के समग्र दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, हमारा मत है कि अपील लंबित रहने के दौरान उस पर लगाई गई वास्तविक सजा को निलंबित किया जा सकता है और आवेदक को जमानत पर रिहा किया जा सकता है।”

मामले की पृष्ठभूमि

67 वर्षीय डॉ नरेंद्र दाभोलकर, जो महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति चलाते थे, को पुणे में सुबह की सैर के दौरान दो बाइक सवार लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। CBI ने सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर को आरोपित बताया। 2014 में बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद यह मामला CBI को सौंपा गया था, इससे पहले इसकी जाँच पुणे पुलिस कर रही थी।

10 मई 2024 को पुणे सत्र कोर्ट ने दोनों को आजीवन कारावास और 5 लाख जुर्माने की सजा सुनाई। हालाँकि डॉ वीरेंद्रसिंह तावड़े, विक्रम भावे और संजीव पुनालेकर को घटना से जोड़ने के लिए पर्याप्त सबूत न होने के कारण बरी कर दिया गया।

इसके बाद कालस्कर ने 2024 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर फैसले को चुनौती दी और अंतिम सुनवाई तक जमानत की माँग की। यह उल्लेखनीय है कि पूरे मामले पर लगातार मीडिया ट्रायल हावी रहा, जिसमें आशीष खेतान द्वारा किया गया स्टिंग ऑपरेशन और दाभोलकर की आत्मा से संपर्क करने के उद्देश्य से प्लांचेट सत्र जैसी बातें भी शामिल थीं।

सनातन संस्था मीडिया ट्रायल का मुख्य केंद्र बन गया क्योंकि उसने 2003 के उस अंधविश्वास विरोधी विधेयक का विरोध किया था, जिसका उद्देश्य काला जादू, बलि और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के रूप में वर्गीकृत कार्यों को अपराध घोषित करना था।

इस बीच जाँच के दौरान कई त्रुटियाँ सामने आईं, जैसे साक्ष्यों का गलत प्रबंधन और एजेंसी द्वारा अपने मैनुअल के अनुसार आवश्यक पहचान परेड न कराना। इसी तरह कई महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित रह गए क्योंकि जाँचकर्ताओं ने कई सुरागों और साक्ष्यों को गलत तरीके से संभाला या नजरअंदाज किया।

मामले में पहली दो गिरफ्तारियाँ विकास खंडेलवाल और मनीष नागोरी की थीं, जिन्हें बैलिस्टिक साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तार किया गया था, जो कथित तौर पर हत्या में इस्तेमाल हथियार से जुड़े थे। हालाँकि बाद में यह विकास निर्णायक नहीं माना गया और घटनास्थल पर मौजूद गवाह उन्हें पहचानने में असफल रहे, जिसके कारण उन्हें रिहा कर दिया गया।

इसी तरह घटनास्थल पर विदेशी सामग्री की रहस्यमयी मौजूदगी और हत्या में इस्तेमाल हथियार के अंतिम निपटान को लेकर भी कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकल सका। जाँच में महत्वपूर्ण खामियाँ थीं, जो संकेत देती हैं कि या तो अयोग्यता थी या जानबूझकर बाधा डाली गई।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade. Nearing three years in the profession.

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