टॉप कोर्ट ने कहा है कि रेस्टोरेंट में नॉन वेज पहले बनता था या नहीं ये जानने का अधिकार भी ग्राहकों को है
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एनके सिंह की खंडपीठ ने रेस्टोरेंट के क्यूआर कोड लगाने के यूपी सरकार के आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने होटल और रेस्टोरेंट को औदेश दिया है कि नियम के मुताबिक अपना नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर दिखाने के आदेश का पालन करें। कोर्ट ने कहा कि ग्राहकों को ये जानने का अधिकार है कि रेस्टोरेंट सिर्फ वेज खाना परोसता है या वेज- नॉन वेज दोनों परोसता है।
अगर रेस्टोरेंट में पहले नॉन वेज परोसा जाता था तो ये जानकारी भी ग्राहकों को दी जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ये ग्राहकों के पसंद का सवाल है।
यूपी सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि “इस देश में ऐसे लोग हैं जो अपने भाई के घर में मांसाहारी खाना बनने पर खाना नहीं खाते। भक्तों की भावनाएँ भी जुड़ी हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर रेस्टोरेंट में पूरे साल शाकाहारी खाना परोसा जाता है और वहाँ नॉन वेज भी बेचा जाने लगा है तो ग्राहक को ये जानकारी होना चाहिए क्योंकि ग्राहक राजा होता है। कोर्ट ने कहा कि कुछ लोग लहसुन-प्याज भी नहीं खाते हैं और कुछ वेजिटेरियन रेस्टोरेंट में खाना भी खाना पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में ग्राहकों की पसंद का ख्याल रखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि लाइसेंस से ये पता होता है कि ये वेज रेस्टोरेंट है या नॉन वेज रेस्टोरेंट है या दोनों। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि दुकानदार कौन है? बल्कि ग्राहक को ये पता होना चाहिए कि यहाँ क्या-क्या बनता है।
दरअसल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकार ने काँवड़ यात्रा को देखते हुए यात्रा मार्ग पर लगे रेस्टोरेंट और खाने-पीने के सभी दुकानों पर नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर लिखना तय कर दिया है। दुकान पर क्यूआर कोड लगाने और स्कैन की सुविधा भी अनिवार्य किया गया था।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार के आदेश को वामपंथी प्रोफेसर अपूर्वानंद झा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और हुजैफा अहमदी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील हैं।


