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अभिनन्दन का Pak भी कुछ न बिगाड़ सका, उसके फैन को दंगाइयों ने देश में ही मार डाला…

रतनलाल वीरगति को प्राप्त हुए हैं, दुनिया का हर दर्जा उनके कारनामे से नीचे ही है। लेकिन, जब भी आप रतनलाल को याद करें, सीएए विरोधी दंगाइयों की करतूतों को भी ज़रूर याद करें।

दिल्ली में सोमवार (फरवरी 24, 2020) को दिन भर दंगाइयों का तांडव चला। जाफराबाद, मौजपुर, बाबरपुर, गोकुलपुरी, करावल नगर, भजनपुरा, घोंडा से लेकर चाँदबाग़ तक, अताताइयों ने किसी भी जगह को शांत नहीं रहने दिया। जमकर आगजनी की गई। हिन्दुओं के घरों को जलाने की ख़बरें आई हैं। लेकिन, सबसे ज्यादा दुखद रहा हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल का बलिदान होना। दंगाइयों ने एक भरे-पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया। सीएए विरोध के नाम पर हिंसा करने वाले इन लोगों को इस बात का एहसास होना चाहिए कि उन्होंने इस देश को कितनी बड़ी क्षति पहुँचाई है।

रतनलाल के साथियों ने बताया है कि वो अभिनन्दन वर्तमान के प्रशंसक थे। वही अभिनन्दन, जो मौत के मुँह में जाकर सकुशल लौट आए थे। जिनके लिए पूरा देश प्रार्थना कर रहा था। जिन्होंने मिग-21 जैसे पुराने इंटरसेप्टर एयरक्राफ्ट से एफ-16 जैसे सुपरसोनिक मल्टीरोल फाइटिंग फाल्कन को मार गिराया था। हमारी विडम्बना ये है कि जिस अभिनन्दन का आतंकियों का पनाहगार पाकिस्तान तक कुछ नहीं बिगाड़ पाता, उससे प्रेरित पुलिस का एक जवान अपने ही देश में मार डाला जाता है। सरकार का विरोध करने वाले हिंदुत्व का विरोध करते हैं और फिर देश के जवानों के ही दुश्मन बन जाते हैं।

हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल के बारे में उनके परिवार व जानने वालों ने बतया है कि वो शांतिप्रिय थे। तीन बच्चों के पिता थे वो। वो मरे नहीं हैं, उनकी हत्या हुई है। उनके हत्यारे सीएए के ख़िलाफ़ विरोध करने वाला हर वो आदमी हैं, जिसने हिंसा भड़काने में योगदान दिया है। फरवरी 2018 में अपने साथियों के बीच हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल चर्चा का विषय थे, क्योंकि उनकी मूँछें भारतीय वायुसेना के जाँबाज विंग कमांडर अभिनन्दन वर्तमान से मिलती-जुलती थी। इसके ठीक एक साल बाद, आज रतनलाल इस दुनिया में नहीं हैं। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।

वो एक योद्धा की तरह वीरगति को प्राप्त हुए, नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में सीएए विरोधी दंगाइयों से लड़ते हुए। उन्होंने 1998 में कॉन्स्टेबल के रूप में दिल्ली पुलिस ज्वाइन की थी। वह गोकुलपुरी में पोस्टेड थे। रतनलाल के साथी उन्हें एक बहादुर और आत्मविश्वासी पुलिसकर्मी के रूप में जानते हैं, जिन्होंने सफलतापूर्वक कई छापेमारियों को अंजाम दिया। गोकुलपुरी के पुलिसकर्मी उन्हें याद कर रहे हैं, क्योंकि हर कठिन परिस्थिति में वो आगे से नेतृत्व करते थे।

एडिशनल डीसीपी बृजेन्द्र यादव के अंतर्गत भी रतनलाल काम कर चुके थे। भावुक यादव बताते हैं कि वो एक क्षमतावान जवान थे, जो कभी थकते नहीं थे और उनका व्यवहार एकदम सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहता था। गोकुलपुरी के एसीपी रहे यादव बताते हैं कि अपने उस कार्यकाल के दौरान उन्होंने रतनलाल की कई बार प्रशंसा की थी और उन्हें सम्मानित किया था। हम आगे उन दंगाइयों के बारे में बात करेंगे, जिन्होंने रतनलाल की जान ले ली, लेकिन उससे पहले आपको उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानकारी होनी चाहिए।

उनका जन्म राजस्थान के सीकर में हुए था। तीन भाइयों और एक बहन के बीच रतनलाल सबसे बड़े थे। वो अपने पीछे तीन बच्चों को छोड़ गए हैं- 11 (कनक) और 12 (सिद्धि) साल की दो लड़कियाँ और 8 साल का बेटा (राम)। वो अपनी पत्नी व बच्चों के साथ नार्थ दिल्ली के बुराड़ी में रहते थे। उन्होंने बच्चों से वादा किया था कि अबकी पूरा परिवार होली खेलने गाँव जाएगा, सीकर के फतेहपुर तिहावली में। क़रीब एक दशक पहले रतनलाल के पिता का निधन हो गया था। सोचिए, उस माँ पर क्या बीत रही होगी, जिसका सबसे बड़ा बेटा चला गया। अब तक उनकी माँ को रतनलाल की मौत की सूचना नहीं दी गई थी। वो सोशल मीडिया से दूर रहती हैं, उन्हें नहीं पता कि सीएए विरोधियों ने उनके बेटे की हत्या कर दी है।

रतनलाल के छोटे भाई ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से बात करते हुए बताया कि वो शुरू से ही पुलिस की वर्दी पहनना चाहते थे। उनके भीतर धैर्य की अद्भुत क्षमता थी। उनके भाई बताते हैं कि उन्होंने कभी रतनलाल को आपा खोते या किसी पर चिल्लाते नहीं देखा था। क़रीब एक महीने पहले पूरा परिवार मिला था, जब एक रिश्तेदार की मौत हो गई थी। उनके छोटे भाई दिनेश कहते हैं कि आज उन्होंने अपने भाई को खोया है, कल को उनकी जगह कोई और हो सकता है। उनका बयान सही है क्योंकि दिल्ली में कई ऐसे मोहम्मद शाहरुख़ घूम रहे हैं, जो पुलिस पर फायरिंग करते चलते हैं। लिबरल गैंग ऐसे शाहरुखों के बचाव में सदैव तत्पर हैं। उन्हें लगातार एहसास दिलाया जा रहा है कि वो एकदम ठीक कर रहे हैं।

रतनलाल ने 2013 में दो आदिवासी महिलाओं का बलात्कार करने वाले को धर दबोचा था। सीमापुरी के एक रेस्टॉरेंट में कुछ पहलवानों ने तबाही मचाई थी, तब उनसे रतनलाल ही निपटने गए थे। उनके साथी बताते हैं कि जब भी कोई कठिन टास्क आता तो वो आगे बढ़ कर उसे करने के लिए निकल पड़ते थे। गाँव वालों की माँग है कि उनकी धरती के लाल को ‘शहीद’ का दर्जा दिया जाए। रतनलाल वीरगति को प्राप्त हुए हैं, दुनिया का हर दर्जा उनके कारनामे से नीचे ही है। लेकिन, जब भी आप रतनलाल को याद करें, सीएए विरोधी दंगाइयों की करतूतों को भी ज़रूर याद करें।

दुख की बात तो ये है कि अभी तक किसी भी नेता ने रतनलाल या उनके परिवार से मुलाकात नहीं की है। उनके लिए आवाज़ नहीं उठाई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हत्यारों से अपील करते हैं कि वो शांत हो जाएँ। यही केजरीवाल जब कोई हिन्दू चींटी भी मार दे तो रामायण और गीता का उपदेश देने लगते हैं। भगवद्गीता को लेकर झूठ बोलते हैं। क्या इससे हत्यारों, दंगाइयों और उपद्रवियों को बढ़ावा नहीं मिलता? सीएए विरोधी हिंसा का समर्थन कर रहा हर एक नेता उसी तरह दोषी है, जैसे कश्मीर में अलगावादियों और आतंकियों को संरक्षण देने वाले नेतागण थे। इनमें से कई आज जेल व नज़रबंदी की हवा खा रहे हैं।

अगर रतनलाल की जगह कोई दंगाई मारा गया होता, तो उसके दरवाजे पर अब तक नेताओं का मेला लग गया होता। यूपी में हमने देखा कि कैसे हर एक दंगाई के घर जाकर कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने अपना समर्थन दिया। यही प्रियंका गाँधी जेएनयू के दंगाइयों से मिलने भी पहुँचीं। और रतनलाल? देश के लिए जान देने वाले, दंगाइयों के हाथों मारे जाने वाले और अपना पूरा जीवन जनता की सुरक्षा में खपा देने वाले जवान के लिए कोई नेता आवाज़ क्यों नहीं उठा रहा? वो ऐसा क्यों नहीं बोल रहा कि सीएए विरोधियों ने ग़लत किया है और उन पर कार्रवाई हो। हिंसा की निंदा करने वालों से सवाल है कि तुम हिंसा करने वालों का नाम क्यों नहीं ले रहे?

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अनुपम कुमार सिंह
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भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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