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कभी आपसी विवाद में घुसाया जातिवाद, कभी वसूली के लिए ठोका SC-ST एक्ट: फतेहपुर में परिवार के 3 लोगों की आत्महत्या का मामला पहला नहीं, पढ़ें कानून के दुरुपयोग के 5 मामले

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में एक ही परिवार के तीन सदस्यों ने कर्ज के बोझ और एससी-एसटी एक्ट में फँसाने की धमकी से तंग आकर सामूहिक आत्महत्या कर ली। सवाल उठ रहे हैं कि क्या कानून का दुरुपयोग मौत का कारण बन गया?

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में एक ही परिवार के 3 लोगों द्वारा आत्महत्या का मामला सामने आया है। यहाँ अमर श्रीवास्तव, उनकी माँ सुशीला श्रीवास्तव और चाचा सुनील श्रीवास्तव अपने घर में मृत पाए गए। उन्होंने पहले जहर का सेवन किया, फिर ब्लेड से काट लिया। इस मामले में अमर श्रीवास्तव का सुसाइड नोट सामने आया है, जिसमें उन्होंने खुद को प्रताड़ित बताया है और कहा है कि रुपयों के लेन-देन के बीच कुछ लोग एससी-एसटी एक्ट में फँसाकर जेल भेजने की धमकी दे रहे थे, जिसके बाद उनके पास कोई चारा नहीं बचा, सिवाय खुद की जान देने के।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, फतेहपुर जिले के चौफेरवा गाँव में अमर श्रीवास्तव (29 वर्ष), उनकी माँ सुशीला श्रीवास्तव (55 वर्ष) और चाचा सुनील श्रीवास्तव एक साथ मृत पाए गए। शुरुआती जाँच में तीनों के हाथ और गले की नसें कटी हुई मिलीं, जिससे हत्या की आशंका जताई गई। लेकिन घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट ने जाँच की दिशा बदल दी।

अमर के कथित सुसाइड नोट में लिखा था कि आर्थिक तंगी, कर्ज के बोझ और कुछ लोगों द्वारा एससी/एसटी एक्ट लगाकर ब्लैकमेल करने की धमकी के कारण वे मजबूर होकर यह कदम उठा रहे हैं। नोट में संजय सिंह, दिलीप त्रिवेदी (पप्पू), शुभम साहू, राहुल श्रीवास्तव और सोनू जैसे नामों का जिक्र है, जिन्होंने कथित तौर पर उन्हें धमकाया और वसूली की।

अमर का सुसाइड नोट (फोटो साभार: Amar Ujala)

प्रयागराज जोन के एडीजी ज्योति नारायण ने पुष्टि की कि सुसाइड नोट प्रथम दृष्टया अमर के हाथ का लिखा प्रतीत होता है, जिसमें आर्थिक दबाव के साथ एससी/एसटी एक्ट की धमकी का जिक्र है। पुलिस ने नोट में उल्लिखित व्यक्तियों से पूछताछ शुरू की है, हैंडराइटिंग जाँच, पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार है।

यूँ तो एससी/एसटी (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एक महत्वपूर्ण कानून है जो कमजोर वर्गों को जातिगत अत्याचारों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकना और उन्हें न्याय दिलाना है।

हालाँकि हाल के वर्षों में इस एक्ट के दुरुपयोग की कई घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ व्यक्तिगत रंजिश, आर्थिक वसूली या बदले की भावना से झूठे मामले दर्ज कराए जाते हैं। इससे निर्दोष लोगों की जिंदगियाँ तबाह हो जाती हैं, व्यापार बर्बाद होते हैं, सामाजिक प्रतिष्ठा खराब होती है, लंबी कानूनी लड़ाई में आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाते हैं और कुछ मामलों में तो परिवार स्तर पर त्रासदी घटित हो जाती है।

फतेहपुर का मामला पहला नहीं, अलीगढ़ में तो बाकायदा परिवार चला रहा था गिरोह

यह पहला मामला नहीं है। कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं जहाँ एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग गिरोहबंद तरीके से किया गया। अलीगढ़ के हस्तपुर गाँव में चंद्रावती देवी और उनके परिवार ने पिछले 10 वर्षों में 15 फर्जी केस दर्ज कराकर लगभग 46 लाख रुपए की सरकारी सहायता और मुआवजा हड़प लिया। वे एससी/एसटी एक्ट के तहत झूठे मामले बनाकर वित्तीय लाभ लेते रहे।

राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने इसे गंभीर मानते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) को जाँच सौंपी और सख्त कार्रवाई की माँग की।

लखनऊ में वकील ने SC-ST एक्ट का बुना जाल, दर्ज कराए 20 मामले-HC ने भेजा जेल

लखनऊ में अधिवक्ता लाखन सिंह का मामला न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रहार है। उन्होंने एससी/एसटी एक्ट के तहत लगभग 20 झूठे मुकदमे दर्ज कराए, मुख्य रूप से भूमि विवाद में बदला लेने के लिए। एक मामले में उन्होंने सुनील दुबे और रामचंद्र जैसे लोगों पर फर्जी हत्या के प्रयास का आरोप लगाया।

जाँच में साबित हुआ कि आरोप पूरी तरह झूठे थे और कई केस फाइनल रिपोर्ट के साथ बंद हो गए। एससी/एसटी विशेष कोर्ट के विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने लाखन सिंह को 10 वर्ष 6 महीने की कठोर कारावास और 2.51 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने अधिवक्ता पेशे को कलंकित किया और झूठे मुकदमों की फैक्ट्री चला रखी है। फैसला बार काउंसिल और जिला प्रशासन को भेजा गया ताकि आगे कार्रवाई हो।

लखनऊ के एक अन्य मामले में HC ने वकील को दी उम्रकैद की सजा

एक और गंभीर मामला लखनऊ के ही अधिवक्ता परमानंद गुप्ता का है। उन्होंने पड़ोसी अरविंद यादव और परिवार के खिलाफ भूमि विवाद में एससी/एसटी एक्ट के तहत फर्जी बलात्कार और उत्पीड़न का केस दर्ज कराया। उन्होंने अपनी पत्नी के ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली दलित महिला पूजा रावत को मजबूर कर झूठे बयान दिलवाए।

सीबीआई जाँच में साबित हुआ कि महिला घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थी। गुप्ता ने कुल 11 और उनकी पत्नी ने 18 फर्जी केस दर्ज कराए। लखनऊ की विशेष एससी/एसटी कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद और 5.10 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई।

लाल सिंह को 32 साल बाद मिला न्याय, झगड़ा था मामूली

राजस्थान में लाल सिंह का मामला 32 साल पुराना है, जो SC/ST एक्ट के दुरुपयोग की लंबी मार झेलने का उदाहरण है। 1993 में जोधपुर जिले के सोवणिया गाँव में आटा चक्की संचालक से पिसाई के पैसे को लेकर विवाद हुआ। चक्की संचालक ने लाल सिंह पर जातिसूचक शब्दों से अपमान, रास्ता रोकने और मारपीट का आरोप लगाकर एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया। निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और 6 महीने की सजा दी, जो उन्होंने पूरी की।

हालाँकि राजस्थान हाई कोर्ट ने 32 साल बाद उन्हें निर्दोष घोषित कर बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एक्ट का अपराध साबित करने के लिए अपमान जानबूझकर, केवल जाति आधार पर और सार्वजनिक रूप से होना चाहिए। विवाद आर्थिक था, गवाहों के बयान विरोधाभासी थे और FIR देरी से दर्ज हुई। कोर्ट ने दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी की, जो संतुलित प्रयोग की जरूरत बताती है।

एससी/एसटी एक्ट में झूठी शिकायत पर हो सकती है जेल

एससी/एसटी एक्ट में झूठी शिकायत पर शिकायतकर्ता को भी सजा मिल सकती है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 217 (पुरानी आईपीसी 182) और 248 (पुरानी 211) के तहत जानबूझकर गलत जानकारी देने पर 6 महीने से 3 साल या अधिक की जेल हो सकती है। लखनऊ में एक महिला को फर्जी शिकायत पर साढ़े तीन साल की सजा मिली भी।

सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि महज जाति का नाम लेने से एक्ट लागू नहीं होता, इरादा सार्वजनिक अपमान का होना चाहिए। झूठे मामलों में मुआवजा केवल चार्जशीट और प्रथम दृष्टया सही पाए जाने पर मिलता है। हाई कोर्ट में CrPC धारा 482 के तहत FIR रद्द कराई जा सकती है।

कुल मिलाकर एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या बन चुका है। फतेहपुर जैसी त्रासदी से लेकर वकीलों द्वारा गिरोहबंद वसूली और लंबे समय तक निर्दोषों की जिंदगी तबाह होने तक ये मामले दिखाते हैं कि कानून की सुरक्षा कमजोर वर्गों के लिए है, लेकिन दुरुपयोग से न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है।

फतेहपुर का यह मामला भी दर्शाता है कि कैसे एक्ट की धमकी से परिवार स्तर पर निराशा और आत्महत्या जैसी चरम स्थिति पैदा हो सकती है। पुलिस का वर्जन अभी प्रारंभिक है, लेकिन सुसाइड नोट ने स्पष्ट रूप से वसूली और ब्लैकमेल को वजह बताया है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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