गोधरा की सेशंस कोर्ट ने 2024 के एक गौहत्या और गौमांस हेराफेरी के केस में दो लोगों को 10 साल की जेल की सजा सुनाई है। दोषियों की पहचान महेबुब अब्दुल्ला सबुरिया और फरहान महेबुब सबुरिया के रूप में हुई है। दोनों बाप-बेटे हैं। जबकि एक अन्य आरोपित सलीम सिद्दीक को शक का फायदा देकर बरी कर दिया गया है।
मामला 9 जुलाई 2024 का है, जिसमें 2 फरवरी 2026 को फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने आरोपितों को गुजरात पशु संरक्षण सुधार अधिनियम की धारा 5(A), 6(B), 8(4) और 10 के तहत दोषी ठहराते हुए 10-10 साल की सजा और 2 लाख रुपये जुर्माना लगाया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 9 जुलाई 2024 को गोधरा बी डिविजन पुलिस स्टेशन के अधिकारी रूटीन पेट्रोलिंग पर थे, तभी गोधरा-हमीपुर रोड पर अली मस्जिद के पास एक संदिग्ध गाड़ी दिखी। उसे रोककर पूछताछ करने की कोशिश की तो कुछ लोग भाग गए। उनमें से दो लोगों को पकड़ लिया गया।
दोनों को पकड़कर कार चेक की तो उसमें से मांस मिला। साथ में कुछ हथियार भी मिले। दोनों की पूछताछ में उन्होंने अपनी पहचान महेबुब अब्दुल्ला सबुरिया और फरहान महेबुब सबुरिया बताई। पुलिस को उन्होंने कहा कि सलीम सिद्दीक और फैसल मकसूद नाम के लोगों ने उन्हें हमीरपुर बुलाया था और वहाँ से यह मांस का जथ्था भरकर दिया था और उसे घर पर बेचने के लिए ले जा रहे थे।
फिर पुलिस ने वेटरनरी डॉक्टर को मौके पर बुलाकर चेक करवाया तो मांस का वजन 53 किलो निकला। फिर सैंपल सूरत FSL में जाँच के लिए भेजे गए, रिपोर्ट आने पर मांस गौमांस निकला। इसके बाद आरोपितोंके खिलाफ गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम के तहत केस दर्ज करके गिरफ्तार कर लिया गया।
पुलिस ने कुल तीन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। जिसमें महेबुब और फरहान गौमांस के साथ मौके से पकड़े गए थे, जबकि तीसरे सलीम पर इन दोनों को गौमांस सप्लाई करने का आरोप था। फिर केस सेशंस कोर्ट में चला गया, जहाँ 19 नवंबर 2024 को चार्जशीट दाखिल की गई। कोर्ट ने 20 फरवरी 2025 को चार्ज फ्रेम किए और आगे ट्रायल चलाया। एक साल बाद 2 फरवरी को फैसला सुनाया गया।
ट्रायल के दौरान कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों, पंच गवाहों, वेटरनरी डॉक्टर, अधिकारियों सहित कई गवाहों की गवाही नोट की। इसके अलावा प्रोसिक्यूशन की तरफ से पंचनामा, वेटरनरी डॉक्टर की रिपोर्ट, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट वगैरह भी सबूत के तौर पर पेश किए गए।
कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
कोर्ट ने फैसले में नोट किया कि वेटरनरी और FSL दोनों रिपोर्ट साफ-साफ साबित करती हैं कि जब्त किया गया मांस गाय का मांस था। गुजरात में गौहत्या, गाय के मांस का संग्रह, हेराफेरी और बिक्री पर पूरी तरह बैन है।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों आरोपित गौमांस के साथ मौके से ही पकड़े गए थे। दूसरी तरफ ट्रायल के दौरान वे यह साबित करने में नाकाम रहे कि उनके पास कत्ल या मांस ट्रांसफर की कोई आधिकारिक परमिशन थी या नहीं। इसके अलावा आरोपियों ने ट्रायल में दलील दी कि पुलिस ने उन्हें गलत तरीके से फंसाया है, लेकिन कोर्ट ने जब्ती, सैंपल की जाँच वगैरह की प्रक्रिया सही तरीके से हुई होने का उल्लेख करके इन दलीलों को खारिज कर दिया और दोनों को दोषी ठहराया।
हालाँकि कोर्ट ने तीसरे आरोपित को यह कहकर छोड़ दिया कि उसके पास से गौमांस नहीं पकड़ा गया और प्रोसिक्यूशन का केस सिर्फ सह-आरोपियों के बयानों पर आधारित है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे बयान, बिना स्वतंत्र पुष्टि के, ठोस नहीं माने जा सकते और उनके आधार पर किसी व्यक्ति को क्रिमिनल ट्रायल में दोषी नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए तीसरे आरोपित को शक का फायदा देकर कोर्ट ने बरी कर दिया।
सजा सुनाते समय कोर्ट ने कहा कि गुजरात में गौहत्या पर बैन वाला कानून होने के बावजूद दोषी बाप-बेटे ने इतने बड़े जथ्थे में घर पर छुट्टा बिक्री के इरादे से गौमांस खरीदकर हेराफेरी की थी। साल 2017 में सरकार ने कानून में किए संशोधन को ध्यान में रखकर सजा सुनाई जाए तो कानून का मूल उद्देश्य भी कायम रहेगा और समाज में ऐसे अपराधों पर काबू भी आएगा और इस तरह के अपराध करने वालों पर कानूनी लगाम भी लगेगी।
आखिर में कोर्ट ने दोनों दोषियों को गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम की धारा 5(A), 6(B), 8(4) और 10 के तहत दस साल की जेल की सजा और दो लाख का जुर्माना ठोका। अगर जुर्माना नहीं भरा तो दोनों की सजा 2 साल और बढ़ाने का आदेश दिया गया है।
मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।


