Wednesday, September 30, 2020
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हलाल का चक्रव्यूह: हर प्रोडक्ट पर 2 रुपए 8 पैसे का गणित* और आतंकवाद को पालती अर्थव्यवस्था

अगर हलाल सर्टिफिकेशन के माध्यम से हलाल समितियों का काम सिर्फ उत्पादन की गुणवत्ता के स्तर को और ऊपर लेकर जाना है या ये तय करना है कि उनमें किसी विशिष्ट रसायनों का उपयोग ना हुआ हो, तो क्या इसकी याचिका Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) से नहीं की जा सकती थी?

हलाल, बायकाट हलाल, हलाल सर्टिफाइड, हलालोनॉमिक्स और हलाल सम्बंधित कई सारे शब्द और लेख आज कल आपको सोशल मीडिया पर देखने को मिल जाएँगे। आखिर ये सब है क्या? कुछ ऐसे ही सवाल मेरे मन में उठे जब 26 अप्रैल 2020 को मेरे एक मित्र ने आईटीसी कंपनी द्वारा निर्मित आशीर्वाद आटे के पैकेट का चित्र मुझे भेजा।

इस चित्र में 100% वेजिटेरियन लोगो के ठीक पास एक हरे रंग का लोगो था, जिसमें शायद उर्दू में कुछ लिखा हुआ था, और मेरे मित्र ने लिखा, “लो अब तो आटा भी हलाल सर्टिफाइड”। लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले मैंने उस चित्र को अपने एक दूसरे मित्र को फॉरवर्ड किया और जवाब में मेरे उस मित्र ने इस बात की पुष्टि की, कि वह चित्र हलाल सर्टिफिकेशन का लोगो है। ज्यादा जानकारी के लिए उसने मुझे संगम टॉक्स के यूट्यूब चैनल पर सरदार रवि रंजन सिंह की हलालोनॉमिक्स पर वीडियो देखने के लिए कहा।

तकरीबन एक घंटे की वीडियो देखने के बाद मेरे मन में कुछ सवाल उठे जिनको रवि रंजन सिंह ने पहले से ही एक दूसरी वीडियो में संबोधित कर दिया था। फिर क्या था आने वाले कुछ दिनों में मुझे जब भी हलाल या हलाल सर्टिफिकेशन सम्बन्धी कोई भी वीडियो देखने को मिलती या कोई लेख पढ़ने को मिलता, मैं पढ़ते चला गया और उन्हीं वीडियोज, लेखों द्वारा प्राप्त हुई जानकारी और मेरे द्वारा की गई रिसर्च को मैं यहाँ सरल भाषा में कुछ खंडों में लिखने जा रहा हूँ।

हलाल मांस पे चर्चा

प्रश्न: हलाल मांस क्या है?

उत्तर: सरल भाषा में कहें तो हलाल मांस एक निश्चित नियमों के द्वारा जानवरों को मारने का एक तरीका है। जिस जानवर को मारा जाना है, उसका सिर मक्का/काबा की तरफ होना चाहिए और इस्लामिक प्रार्थना बिस्मिल्लाह का उच्चारण मारने के समय अनिवार्य है। यहाँ जानवर को एक ही झटके में नहीं मारा जाता, बल्कि यह एक धीमी प्रक्रिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वध केवल मुस्लिम कसाई द्वारा ही किया जा सकता है।

प्रश्न: झटका मांस क्या है?

उत्तर: झटका का अर्थ है कि जानवर को एक ही वार द्वारा तुरंत मार दिया जाता है, जैसा कि नाम से पता चलता है “एक ही झटके में”। इस मामले में जानवर के सिर को किसी विशेष दिशा में करने या किसी भी तरह की प्रार्थना का उच्चारण करने का कोई विशिष्ट नियम नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी वध कर सकता है।

प्रश्न: इससे क्या फर्क पड़ता है? बहुत से लोग हलाल खाते हैं और मैंने तो किसी को मांस के स्वाद या गुणवत्ता के बारे में शिकायत करते हुए नहीं देखा।

उत्तर: वैसे मैं मांसाहारी नहीं हूँ इसलिए मैंने ऊपर बताई गई किसी भी श्रेणी के मांस को कभी नहीं चखा। अगर मैं मांसाहारी होता भी तब भी यह आवश्यक नहीं होता कि जो आपको स्वादिष्ट लगे वो मुझे भी लगे, क्यूंकि स्वाद सबका अपना-अपना होता है।

मैं उत्पाद की गुणवत्ता पर टिप्पणी करने के लिए एक पोषण विशेषज्ञ या किसी भी प्रकार का वैज्ञानिक विशेषज्ञ भी नहीं हूँ, हालाँकि यह झटका कसाई समुदाय पर एक बड़ा प्रभाव डालता है।

जैसा कि पहले प्रश्न के उत्तर में उल्लेख किया गया है, केवल एक मुस्लिम ही हलाल वध सकता है, अगर सभी हलाल खाने लगे तो सभी गैर-मुस्लिम कसाई व्यवसाय से बाहर हो जाएँगे और उनमें से अधिकांश पहले से ही हो चुके हैं।

प्रश्न: यदि हर कोई झटका खाना शुरू कर दे तो क्या यह मुस्लिम कसाई को व्यवसाय से बाहर नहीं करेगा?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। वे अभी भी अपने विशेष ग्राहक समूह के लिए हलाल मांस का उत्पादन कर सकते हैं, झटका मांस की माँग गैर-मुस्लिम कसाई को व्यवसाय में रखेगी।

प्रश्न: एक शाकाहारी होने के नाते आपको इसमें इतनी दिलचस्पी क्यों है? अब ये मत कहिएगा कि आप ने अचानक से एक कर्मठ कार्यकर्ता बनने और उन कसाईयों के अधिकारों के लिए लड़ने का फैसला किया है।

उत्तर: बहुत अच्छा सवाल है। इस विषय में मेरी रूचि इसलिए बढ़ी है क्योंकि “हलाल” शब्द का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है।

हलाल सर्टिफिकेशन समितियाँ

हलाल सिर्फ और सिर्फ मांस तक सीमित नहीं है। जैसा कि मैंने पहले बताया आटा भी हलाल सर्टिफाइड होता है। अब आप पूछेंगे वह कैसे? बड़ा ही सरल उत्तर है, इसमें भी वही धारणा है।

जब खेती के उपयोग में आने वाली भूमि, गेहूँ उगाने वाला किसान, गेहूँ की कटाई करने वाले मजदूर से लेकर मण्डियों तक पहुँचाना, फिर उसकी बस्तों में पैकिंग, बाद में उसे पीस कर आटे में परिवर्तित करना, वापस पैक कर के बाजार में ग्राहकों तक पहुँचाने का हर काम जब एक समुदाय विशेष के लोग ही करें, तब वह हलाल है, ऐसा मेरा मानना है।

यह पढ़ने और सुनने में बहुत ही हास्यास्पद लग रहा होगा क्यूँकि यह भारत में संभव नहीं है, वर्तमान समय में। इसीलिए यहाँ एंट्री होती है भारत में मौजूद हलाल सर्टिफिकेशन समितियों की। इनमें से कुछ के नाम मैंने नीचे दिए हैं।

  1. Jamiat Ulama-E-Hind – http://halalhind.com/
  2. Jamiat Ulama-i-Hind Halal Trust – https://www.jamiathalaltrust.org/
  3. Halal India – https://halalindia.co.in/
  4. Global Islamic Shariah Services  – https://www.halalcertificationindia.com/
  5. Halal Certification Services India Private Limited (HCS) – https://halalcertificate.in/
  6. Halal Council of India – https://halalcouncilofindia.com/
Halal Board Logos

हलाल इंडिया के कार्यकारी निदेशक मोहम्मद जिन्ना हलाल सर्टिफिकेशन के बारे में कहते हैं कि यह एक स्वच्छ आपूर्ति श्रृंखला और अनुपालन को दर्शाता है जो सोर्सिंग से लेकर निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं तक सब कुछ कवर करता है। उत्पाद किसी भी रसायन और अल्कोहल से मुक्त होना चाहिए, पशु व्युत्पन्न (जानवरों की चर्बी या कीड़ों से रंगा हुआ), हलाल सौंदर्य प्रसाधन भी दूध डेरिवेटिव और मोम से मुक्त होने चाहिए और उनका परीक्षण पशुओं पर नहीं होने चाहिए”।

मैं उनके इस कथन के बारे में भी इस लेख के अंत में चर्चा करूँगा।

हलाल का गणित

यह हलाल सर्टिफिकेशन समितियाँ भारत में मौजूद सभी छोटी-बड़ी कंपनियों के उत्पादों को हलाल सर्टिफिकेशन दे रही हैं, एक शुल्क के बदले। उदाहरण के रूप में कॉरनिटोज कंपनी ही ले लीजिए।

कॉरनिटोज के भारत में कुल 59 उत्पाद हैं, जो आप उनकी वेबसाइट पर देख सकते हैं। यह सभी उत्पाद जमीअत उलमा-इ-हिन्द हलाल ट्रस्ट द्वारा सर्टिफाइड हैं और प्रमाण स्वरुप आपको जमीअत उलमा-इ-हिन्द हलाल ट्रस्ट का लोगो सारे उत्पादों के पैकेट्स पर दिख जाएगा। अब कॉरनिटोज कंपनी को प्राप्त हुए इस सर्टिफिकेशन के पीछे छुपे गणित पर एक नज़र डालते हैं।

जमीअत उलमा-इ-हिन्द हलाल ट्रस्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध फीस चार्ट के मुताबिक कॉरनिटोज को रजिस्ट्रेशन के लिए 20000.00 रुपए का भुगतान करना पड़ता है। उसके पश्चात प्रत्येक उत्पाद को सर्टिफाई करने के लिए 500.00 रुपए अलग से।

कुल 59 उत्पादों के पैकेट पर हलाल लोगो छापने के लिए 20000.00 रुपए और कन्साइनमेंट सर्टिफिकेशन के लिए 29500.00 रुपए, ऑडिट करने वालों के लिए 5000.00 रुपए (5 ऑडिटर्स के लिए) और इस सब के ऊपर 18% GST, यानी 18720.00 रुपए और जोड़ दें। तो कुल मिलकर हो गए 122720.00 रुपए। इसके बाद वार्षिक रिन्यूअल के समय 52510.00 रुपए और कोई भी नया उत्पाद सर्टिफाई करवाने के लिए 500.00 + 18% GST

अब दिखने में यह राशि कुछ ज्यादा बड़ी नहीं लगती, बड़ी लगे भी तो क्या, इस राशि का भुगतान तो कॉरनिटोज कर रही है, तो इसमें मुझे या आपको क्या फर्क पड़ता है?

यहाँ ये ध्यान में रखना बहुत आवश्यक है कि ऐसे सभी शुल्कों को MRP में जोड़ कर गाहकों से ही वसूला जाता है। तो चलिए उसका भी गणित देख लेते हैं।

अगर कॉरनिटोज ने हर उत्पाद के पूरे वर्ष में 1000 यूनिट बनाए तो कुल मिला कर हो गए 59000 यूनिट और कॉरनिटोज द्वारा दी गई 122720.00 रुपए की राशि को 59000 में बाँट दें तो किसी भी एक उत्पाद को खरीदने वाले ग्राहक के हिस्से में आए 2 रुपए 8 पैसे।

यहाँ काफ़ी रीडर्स मुझे जमकर गालियाँ देंगे और बाकी का लेख बिना पढ़े चले जाएँगे क्यूँकि मैंने सिर्फ 2 रुपए 8 पैसे के लिए उनका समय नष्ट किया। लेकिन पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त…

हलाल का जाल

अगर बात सिर्फ कॉरनिटोज तक ही सीमित रहती तो शायद किसी को फर्क नहीं पड़ता, परन्तु ऐसा नहीं है। भारत में मौजूद हर दूसरी छोटी-बड़ी कंपनी हलाल सर्टिफाइड हो चुकी है और बाकि भी होने के कगार पर हैं।

इसका अर्थ ये हुआ कि ऐसी हर एक कंपनी प्रत्येक वर्ष इन हलाल बोर्ड्स को एक बड़ी राशि का भुगतान कर रही है। इनमें से कुछ कम्पनियाँ जिनके बारे में मुझे पता चला उनके नाम और उनके द्वारा दी जाने वाली राशि का एक अनुमानित आँकड़ा मैं नीचे लिख रहा हूँ। यह आँकड़ा ऊपर प्रयोग किए गए गणित और फीस चार्ट के आधार पर है।

RegistrationRenewal
Patanjali794140.00388220.00
ITC613600.00297950.00
Haldiram’s879100.00430700.00
Bhikharam Chandmal643100.00312700.00

इनके इलावा भी और बहुत सारी कंपनियाँ हैं, उदाहरण के लिए:

Britannia, Parle, Hamdard, Hindustan Unilever Limited, Tata Chemicals Limited, India Gelatine and Chemicals Limited, Glaxo Smith Kline Consumer Healthcare, Iba, Banjara’s, Emami, Cavin-Kare, Morgain Group, Tejas Naturopathy, Indus Cosmeceuticals, Maja Healthcare, VCare Pharcos etc.

ये सभी कंपनियाँ हलाल सर्टिफाइड तो हैं परन्तु अपने उत्पादों पर अभी तक हलाल का लोगो नहीं छाप रहीं। यहाँ आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि एक आम व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन में प्रयोग में आने वाली हर एक वस्तु हलाल सर्टिफाइड है और अब ये राशि 2 रुपए 8 पैसे से बढ़ कर कहीं ज़्यादा हो चुकी है, जो आप दे रहे हैं वो भी बिना जाने।

इस प्रकार भारत में मौजूद ये चुनिन्दा हलाल सर्टिफिकेशन समितियाँ प्रत्येक वर्ष बड़ी ही आसानी से करोड़ों या शायद अरबों रुपए की आय का लाभ उठा रही हैं।


हलाल की माँग

एक सवाल ये भी उठता है कि आखिर इन सारी कंपनियों को ज़रूरत क्या थी हलाल सर्टिफिकेशन लेने की? ज़्यादातर भारतीय कंपनियाँ अपने उत्पादों को विदेशों में निर्यात करती हैं। जब इन कंपनियों को किसी इस्लामिक देश में निर्यात करना होता है तब हलाल सर्टिफिकेशन लेना अनिवार्य है और यहीं से शुरुआत हुई उनके हलाल सर्टिफिकेशन की।

इस बात को ये कंपनियाँ बड़े गर्व से बतातीं हैं जब उसी समुदाय विशेष के लोग उनसे पूछते हैं। इसके चलते इन्हें थोड़ी-बहुत आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा, शायद इसीलिए हर एक हलाल सर्टिफाइड कंपनी ने अपने उत्पादों पर अभी तक हलाल का लोगो छापना चालू नहीं किया या जिन्होंने छापना चालू किया था, उन्होंने बंद कर दिया जैसे कि अशीर्वाद आटा।

अगर मैं भारत में मौजूद फ़ास्ट फ़ूड सेंटर्स , रेस्टोरेंट्स या होटल्स की बात करूँ जो हलाल परोसते हैं तो उनके मुताबिक केवल 5-7% ग्राहक ही आकर पूछते हैं कि उनके यहाँ हलाल परोसा जाता है कि नहीं, बाकि 93-95% ग्राहकों को ना तो कोई फर्क पड़ता है और ना ही उन्होंने कभी ये पूछा।

सिर्फ इसी 5-7% ग्राहकों को बनाए रखने के लिए उन्होंने हलाल परोसना शुरू किया। लेकिन अगर इस देश के प्रधानमंत्री ताली या थाली बजाने को कहें, या दीप प्रज्वलित करने का निवेदन करें तो लोगों को लगता है कि उन्हें हिन्दू धर्म या मान्यताओं से जुड़े कार्य करने पर मजबूर किया जा रहा है।

यहाँ मैं ये भी बता दूँ कि एक होटल या रेस्टोरेंट को भी अलग से हलाल सर्टिफिकेशन लेना पड़ता है, सिर्फ हलाल सर्टिफाइड विक्रेताओं से खाद्य सामग्री लेना पर्याप्त नहीं है।


हलाल का पैसा

अब सवाल ये उठता है कि ये हलाल का पैसा जाता कहाँ है?

यहाँ रवि रंजन सिंह अपने सम्बोधन में कहते हैं कि इसका एक हिस्सा जिहाद में जाता है। यहाँ आपको जिहाद की बहुत सारी परिभाषाएँ मिल जाएँगी और ज्यादातर अच्छी ही मिलेंगी, तो जरा एक नज़र उस पर भी डाल लेते हैं।

जिन कंपनियों के मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स इस्लामिक कन्ट्रीज में मौजूद हैं, उन्हें हलाल सर्टफिकेशन लेने के लिए एक निश्चित राशि दान करनी पड़ती है किसी चैरिटेबल संगठन को, लेकिन अपनी पसंद की नहीं। यहाँ भी हलाल समितियों द्वारा दी गई चैरिटेबल संगठनों की सूची को ही इस्तेमाल में लाया जाता है। मज़े की बात ये है कि संयुक्त राष्ट्र ने इनमें से कुछ चैरिटेबल संगठनों को आतंकवादी समूह घोषित किया हुआ है।

रवि रंजन सिंह
https://www.youtube.com/watch?v=uFW-X_VYvZU

लेकिन ये तो हुई विदेशों की बात। भारत में ऐसा होता है कि नहीं, इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है। अगर आपको है तो नीचे दिए कमेंट्स सेक्शन में ज़रूर बताएँ।

भारत में हलाल सर्टिफिकेशन के नाम पर ली गई राशि को जमीअत उलेमा-इ-हिन्द कहाँ खर्च करती है, इसके बारे में बताते हैं स्वराज्य के वरिष्ठ संपादक अरिहंत पवरिया जी। 19 दिसम्बर 2019 को प्रकाशित हुए अपने लेख में वो बताते हैं कि किस प्रकार जमीअत उलेमा-इ-हिन्द आतंकवाद के मामलों में आरोपी एक समुदाय विशेष के लोगों को लगातार कानूनी समर्थन प्रदान करता है और इस बात की पुष्टि वह स्वयं अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित की गई सूची से करते हैं। यह सूची उर्दू में है, इसलिए इसके अनुवाद के लिए आप अरिहंत पवरिया जी का पूरा लेख पढ़ें।

ये तो हुई एक हलाल समिति की बात, लेकिन भारत में मौजूद बाकी सारी हलाल समितियाँ अपनी आय का क्या करती हैं, क्या उसके बारे में किसी को कुछ पता है?

PM CARES Fund में कितना पैसा जमा हुआ और उसे कहाँ खर्च किया गया, ये सबको जानना है, लेकिन ये हलाल समितियाँ सर्टिफिकेशन के नाम पर जो पैसा लेती हैं, वो कहाँ जाता ये कोई पूछेगा?

और अगर पूछ भी लिया तो क्या वो कुछ बताएँगे?

या जैसे एंटोनिया माइनो ने पालघर में हुई साधुओं की निर्मम हत्या पर चुप्पी साधी हुई है, वैसे ही वो भी चुप्पी साध लेंगे।


हलाल पर प्रश्न

अंत में हलाल क बारे में मेरे मन में कुछ प्रश्न हैं, जो मैं आपके सामने रख रहा हूँ। अगर किसी के पास उत्तर हो तो जरूर बताएँ:

  1. अगर हलाल सर्टिफिकेशन के माध्यम से हलाल समितियों का काम सिर्फ उत्पादन की गुणवत्ता के स्तर को और ऊपर लेकर जाना है या ये तय करना है कि उनमें किसी विशिष्ट रसायनों का उपयोग ना हुआ हो, तो क्या इसकी याचिका Food Safety and Standards Authority of India aka FSSAI से नहीं की जा सकती थी?
  2. जिस देश ने अल्पसंख्यकों के विकास, रोजगार, उनकी धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए न जाने कितनी लाभकारी योजनाएँ चलाईं, देश के संविधान में ना जाने कितने प्रावधान जोड़े, क्या वहाँ उनके खान-पान से सम्बंधित FSSAI थोड़ी सी अतिरिक्त जाँच नहीं करती?
  3. जिस प्रकार हर साल FSSAI अपनी वेबसाइट पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करती है, जिसमें उनकी आय से लेकर उनके खर्च किए गए एक-एक रुपए का पूरा हिसाब होता, क्या ये हलाल समितियाँ भी अपनी वार्षिक आय का हिसाब इस देश के नागरिकों को देंगी?
  4. UK में सैकड़ों शरिया अदालतें हैं और उसी को कुछ दिन पहले AIMIM पार्टी ने भारत में भी प्रचलित करने की कोशिश की, ठीक उसी तरह क्या ये हलाल समितियाँ भी FSSAI के लिए एक चुनौती है?

हलाल के बारे लिखने और बताने के लिए और भी काफी कुछ रह गया है, जो मैं इस लेख के अगले भाग में बताऊँगा। अंत में जिन्होंने अपना मूल्यवान समय निकालकर मेरे इस लंबे लेख को पढ़ा उनका बहुत-बहुत आभार। कृपया थोड़ा कष्ट और करें और इस लेख को दूसरों के साथ शेयर करें।

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Chamkaur Singh
Not a professional writer or blogger.

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