केन्या की राजधानी नैरोबी का ‘जोमो केन्याटा इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ इन दिनों एक बड़े विवाद की वजह से चर्चा में है। केन्या सरकार लंबे समय से इस एयरपोर्ट का विस्तार और आधुनिकीकरण करना चाहती थी।
शुरुआत में यह प्रोजेक्ट भारत के अडानी समूह को मिलने की चर्चा थी, लेकिन बाद में सरकार ने इसे एक चीनी सरकारी कंपनी को सौंप दिया। अब इस फैसले को लेकर आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं।
अडानी समूह ने दिया था सस्ता प्रस्ताव
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अडानी समूह इस एयरपोर्ट को विकसित करने के लिए करीब 2 अरब डॉलर (करीब 1.9 लाख करोड़ रुपए) का निवेश करने को तैयार था। यह परियोजना पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत प्रस्तावित थी।
इसका मतलब था कि परियोजना में बड़ा निवेश प्राइवेट कंपनी करती और केन्या सरकार पर अतिरिक्त कर्ज का बोझ नहीं पड़ता। इस मॉडल का फायदा यह भी था कि सरकार को टैक्सपेयर्स के पैसे से परियोजना की लागत नहीं उठानी पड़ती और देश पर नया कर्ज लेने का दबाव कम रहता।
फिर चीन को कैसे मिला प्रोजेक्ट?
बाद में केन्या सरकार ने यह परियोजना चीन की एक सरकारी कंपनी को सौंप दी। बताया जा रहा है कि चीनी कंपनी इस काम के लिए करीब 2.9 अरब डॉलर (करीब 24–25.5 हजार करोड़ रुपए) ले रही है। यह राशि अडानी समूह के प्रस्ताव से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है।
यही वजह है कि अब सवाल उठ रहे हैं कि जब कम लागत वाला विकल्प मौजूद था तो ज्यादा महंगे प्रस्ताव को क्यों चुना गया। आलोचकों का कहना है कि इस फैसले के पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक वजहें भी हो सकती हैं।
भारत की राजनीति और विवाद का असर?
इस मामले का संबंध भारत की राजनीति से भी जोड़ा जा रहा है। सितंबर 2024 में कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने केन्या में अडानी परियोजना के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए केंद्र सरकार और अडानी समूह पर सवाल उठाए थे।
The Adani Group’s proposed takeover of the airport in Nairobi, Kenya, has led to widespread protests in the country, with the Kenya Aviation Workers Union calling for a strike to demonstrate its opposition. This is a matter of grave concern for India, because the non-biological…
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) September 3, 2024
रिपोर्ट्स के अनुसार, अडानी समूह को लेकर बने विवादों और राजनीतिक माहौल ने केन्या में इस परियोजना को संवेदनशील बना दिया। उनका कहना है कि इसी वजह से चीनी कंपनी को मौका मिला और उसने यह बड़ा ठेका हासिल कर लिया।
फर्जी प्रेस रिलीज और सूचना युद्ध की भी चर्चा
इस विवाद के दौरान सितंबर 2024 में अडानी समूह के नाम से एक कथित प्रेस रिलीज सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। उसमें केन्याई अधिकारियों को धमकी देने जैसी बातें लिखी गई थीं। बाद में अडानी समूह ने इसे पूरी तरह फर्जी बताया।
इसके अलावा मई 2026 में फ्रांस की सरकारी एजेंसी विजिनम ने दावा किया कि चीन के सरकारी प्रसारक CGTN से जुड़े कुछ नेटवर्क AI की मदद से चीन सपोर्ट मटीरियल और नैरेटिव फैलाने का काम कर रहे थे। इसके बाद डिजिटल दुष्प्रचार और सूचना युद्ध को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई।
केन्या, भारत और चीन के लिए क्या मायने हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा जोखिम केन्या के सामने है। अगर परियोजना की लागत ज्यादा रहती है तो सरकार को अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ सकता है, जिसका बोझ देश के नागरिकों और टैक्स पेयर्स पर पड़ेगा।
भारत के लिए यह झटका माना जा रहा है क्योंकि अफ्रीका में बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में उसकी मौजूदगी लगातार बढ़ रही थी। वहीं चीन के लिए यह सौदा अफ्रीका में अपनी आर्थिक और रणनीतिक पकड़ मजबूत करने का एक और अवसर माना जा रहा है।


