जब भी भारत के तेल आयात की बात होती है, तो सबसे पहले कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल पर चर्चा होती है। लेकिन एक और ऐसी चीज है जो हर दिन चुपचाप लगभग हर भारतीय घर तक पहुँचती है वह है खाद्य तेल यानी एडिबल ऑयल।
सड़क किनारे मिलने वाले खाने से लेकर बड़े रेस्तराँ तक, पैकेज्ड फूड से लेकर घर की रसोई तक, खाद्य तेल आज भारतीय जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन चुका है। लेकिन आज इस विषय पर चर्चा क्यों हो रही है? इसका जवाब पिछले तीन वर्षों की उन घटनाओं में छिपा है जिन्होंने भारत के खाद्य तेल क्षेत्र की असली कमजोरी को उजागर कर दिया।
फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर बड़ा हमला शुरू किया। कुछ ही हफ्तों में दोनों देशों से आने वाला सनफ्लावर ऑयल लगभग पूरी तरह रुक गया और इसकी कीमतें तेजी से बढ़ गईं। इसके ठीक दो महीने बाद अप्रैल 2022 में इंडोनेशिया, जो दुनिया के सबसे बड़े पाम ऑयल (ताड़ का तेल) निर्यातकों में से एक है, ने अपने घरेलू भंडार को सुरक्षित रखने के लिए पाम ऑयल के निर्यात पर रोक लगा दी।
भारत इंडोनेशिया से बड़ी मात्रा में पाम ऑयल आयात करता है, इसलिए इस फैसले का असर सीधे भारतीय बाजार पर पड़ा और कीमतें बढ़ गईं। अब हाल के समय में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर पैदा हुई चिंताओं ने भी नई परेशानी खड़ी कर दी है।
दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले लगभग एक-तिहाई कच्चे तेल का व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में शिपिंग और माल ढुलाई लागत बढ़ने का खतरा बना हुआ है। इन सभी घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि भारत की रसोई वैश्विक युद्धों, निर्यात प्रतिबंधों, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक तनावों के प्रति बेहद संवेदनशील हो चुकी है।
आज भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का लगभग 60% हिस्सा आयात करता है। अमेरिका, चीन और ब्राजील जैसे देशों के बाद भारत दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य तेल अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अनुमान है कि 2024-25 में खाद्य तेल आयात पर भारत को लगभग 18.3 अरब डॉलर यानी करीब 1.61 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़े।
पाम ऑयल, जिसका इस्तेमाल प्रोसेस्ड फूड, स्नैक्स और बेकरी उत्पादों में बड़े पैमाने पर होता है, मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है। सोयाबीन ऑयल अर्जेंटीना और ब्राजील से आयात होता है, जबकि सनफ्लावर ऑयल रूस और यूक्रेन से आता है। इसी दौरान भारत में खाद्य तेल की खपत पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ी है।
अब बढ़ती तेल खपत केवल आयात तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका संबंध मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग और फैटी लिवर जैसी बीमारियों से भी जुड़ चुका है। इस लेख में हम समझेंगे कि कैसे रसोई में इस्तेमाल होने वाला एक सामान्य खाद्य पदार्थ अब स्वास्थ्य, विदेशी निर्भरता और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।
भारत की कुल खपत बनाम उत्पादन
आज भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल उपभोक्ताओं और आयातकों में शामिल है। भारतीय हर साल लगभग 25-26 मिलियन टन खाद्य तेल का उपभोग करते हैं, जबकि देश में उत्पादन केवल 11-12 मिलियन टन के आसपास होता है। यानी भारत की लगभग 60% जरूरतें विदेशी देशों से पूरी होती हैं।

इसी वजह से भारत ने 2024-25 में करीब 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करने के लिए लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपए खर्च किए। यह कोई नई स्थिति नहीं है। 2023-24 में भी भारत ने लगभग 15.96 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करने पर करीब 1.32 लाख करोड़ रुपए खर्च किए थे। वैश्विक कीमतें बढ़ने के कारण आयात लागत में करीब 22% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
बढ़ती माँग बनाम धीमा घरेलू उत्पादन, आत्मनिर्भरता में सुधार
बढ़ती आबादी, तेजी से हो रहा शहरीकरण, फास्ट फूड का बढ़ता चलन और रेस्तराँ संस्कृति के विस्तार के कारण खाद्य तेल की खपत लगातार बढ़ी है। लेकिन घरेलू उत्पादन इस बढ़ती माँग के साथ कदम नहीं मिला पाया। हालाँकि पिछले एक दशक में भारत की खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भरता में कुछ सुधार जरूर हुआ है।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2015 में जहाँ आत्मनिर्भरता करीब 36.8% थी, वहीं 2024 तक यह लगभग 44% तक पहुँच गई। इसके पीछे घरेलू तिलहन उत्पादन में बढ़ोतरी और सरकारी नीतियों का योगदान रहा। फिर भी तेजी से बढ़ती माँग के मुकाबले घरेलू उत्पादन अभी भी काफी पीछे है।
भारत आयातित खाद्य तेल पर निर्भर क्यों है?
भारत कृषि प्रधान देश होने के बावजूद खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। इसकी सबसे बड़ी वजह पारंपरिक फसलों पर ज्यादा निर्भरता है। भारत में किसान गेहूँ और धान जैसी फसलें उगाना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं क्योंकि उन्हें MSP, सरकारी खरीद, सिंचाई और सब्सिडी जैसी सुविधाएँ मिलती हैं।
इसके विपरीत, तिलहन फसलें जैसे सोयाबीन, सूरजमुखी, सरसों और मूंगफली अधिक जोखिम भरी मानी जाती हैं। इनकी कीमतें अस्थिर रहती हैं, कीटों का खतरा ज्यादा होता है और बारिश पर निर्भरता भी अधिक रहती है। तिलहन किसानों को गेहूँ और धान किसानों जैसी मजबूत सरकारी सुरक्षा नहीं मिलती।

एक और बड़ी समस्या कम उत्पादकता है। भारत में कई जगहों पर तिलहन फसलें कमजोर मिट्टी और सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में उगाई जाती हैं, जिससे उत्पादन कम रहता है। दूसरी तरफ इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों ने समय के साथ बेहद प्रभावी पाम ऑयल उद्योग विकसित कर लिया।
बढ़ती खपत और बदलती जीवनशैली
भारत में तली हुई चीजों, पैकेज्ड स्नैक्स, बेकरी उत्पादों, रेस्तराँ और फास्ट फूड की खपत तेजी से बढ़ी है। जैसे-जैसे शहर बढ़े और फूड डिलीवरी ऐप्स आम हुए, वैसे-वैसे खाद्य तेल की खपत भी बढ़ती गई। अगर आँकड़ों की बात करें, तो 2001 में एक भारतीय औसतन सालभर में 8.2 किलो खाद्य तेल का सेवन करता था।
2023-24 तक यह बढ़कर 23.5 किलो प्रति व्यक्ति हो गया। यानी कुछ ही वर्षों में प्रति व्यक्ति खपत लगभग 15 किलो बढ़ गई। भारत की खाद्य तेल खपत और घरेलू उत्पादन के बीच बढ़ता अंतर अब इसे केवल रसोई का सामान नहीं बल्कि एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक मुद्दा बना चुका है।
कौन-कौन से तेल आयात करता है भारत?
भारत अलग-अलग प्रकार के खाद्य तेल अलग-अलग देशों से आयात करता है। पाम ऑयल भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला खाद्य तेल है, जो मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है। इसकी कम कीमत और लंबी शेल्फ लाइफ के कारण इसका इस्तेमाल प्रोसेस्ड फूड, चिप्स, बिस्किट और बेकरी उत्पादों में बड़े पैमाने पर होता है।

भारत बड़ी मात्रा में सोयाबीन ऑयल अर्जेंटीना और ब्राजील से आयात करता है, जबकि सनफ्लावर ऑयल रूस और यूक्रेन से आता है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि वैश्विक संकट भारत की खाद्य तेल सप्लाई को कितना प्रभावित कर सकते हैं। हालाँकि भारत सरसों और मूंगफली जैसे तेलों का उत्पादन खुद करता है, लेकिन घरेलू उत्पादन तेजी से बढ़ती माँग को पूरा नहीं कर पा रहा। परिणामस्वरूप, भारत आयातित खाद्य तेलों पर अत्यधिक निर्भर है।
1998 का सरसों तेल कांड
भारत के खाद्य तेल इतिहास में 1998 का सरसों तेल कांड एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। उस समय उत्तर भारत में सरसों का तेल व्यापक रूप से इस्तेमाल होता था। बाद में पता चला कि इसमें जहरीला आर्गेमोन ऑयल मिलाया जा रहा था, जिससे ‘एपिडेमिक ड्रॉप्सी’ नाम की गंभीर बीमारी फैल गई।
इस बीमारी से लोगों के शरीर में सूजन, साँस लेने में दिक्कत और दिल संबंधी समस्याएँ होने लगीं। इस घटना में 60 से अधिक लोगों की मौत हो गई और करीब 3000 लोग बीमार पड़े।
इस घटना के बाद लोगों का खुला सरसों तेल पर भरोसा टूट गया। सरकार ने सख्त खाद्य सुरक्षा नियम लागू किए और धीरे-धीरे ब्रांडेड रिफाइंड ऑयल और सस्ते आयातित पाम ऑयल का इस्तेमाल बढ़ने लगा। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस घटना ने भारत में आयातित और रिफाइंड तेलों की ओर झुकाव को तेज कर दिया।
वनस्पति की कहानी
रिफाइंड ऑयल के आम होने से पहले वनस्पति भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली कुकिंग फैट्स में से एक था। इसे देसी घी के सस्ते विकल्प के रूप में लाया गया था। मिठाइयों, बेकरी, रेस्तराँ और स्ट्रीट फूड में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता था। ‘डालडा’ इसका सबसे प्रसिद्ध ब्रांड बन गया था।
लेकिन बाद में पता चला कि वनस्पति में ट्रांस फैट की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जो हृदय रोग और मोटापे से जुड़ी है। समय के साथ सस्ता आयातित पाम ऑयल वनस्पति की जगह लेने लगा क्योंकि यह बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए ज्यादा सस्ता और सुविधाजनक था। इससे भारत की आयातित तेलों पर निर्भरता और बढ़ गई।
सस्ते पाम ऑयल की अर्थव्यवस्था
आज भारत के खाद्य तेल बाजार में पाम ऑयल का सबसे बड़ा हिस्सा है और यह कुल खाद्य तेल खपत का 37% से ज्यादा हिस्सा बनाता है। कई दशकों तक पाम ऑयल दुनिया के सबसे सस्ते खाद्य तेलों में शामिल रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह ऑयल पाम पेड़ों की बहुत ज्यादा उत्पादन क्षमता है।
एक हेक्टेयर जमीन से करीब 3.3 टन पाम ऑयल निकलता है, जबकि सोयाबीन से केवल 0.4 टन और सूरजमुखी से लगभग 0.7 टन तेल मिलता है। हालाँकि 2024 तक स्थिति कुछ बदली और पाम ऑयल की कीमतें लगभग 10% बढ़ गईं, जबकि सोयाबीन ऑयल की कीमतों में करीब 9% की गिरावट आई।
इसके बावजूद पाम ऑयल आज भी कम लागत, लंबी शेल्फ लाइफ और ज्यादा तापमान सहने की क्षमता के कारण खाद्य उद्योग की पहली पसंद बना हुआ है। बिस्किट, चिप्स, इंस्टेंट फूड, फ्रोजन फूड और बेकरी उत्पादों में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है क्योंकि इससे उत्पादन लागत कम रहती है।
यही वजह है कि सस्ता होने के कारण पाम ऑयल धीरे-धीरे भारत के प्रोसेस्ड फूड और कमर्शियल कुकिंग सेक्टर का अहम हिस्सा बन गया।
पाम ऑयल से जुड़ी स्वास्थ्य चिंताएँ
भारत अपना ज्यादातर पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात करता है। दुनिया की लगभग 85% पाम ऑयल सप्लाई इन्हीं दो देशों से आती है, इसलिए पाम ऑयल भारत के सबसे बड़े आयातित खाद्य उत्पादों में शामिल हो गया है।
समय के साथ सस्ता आयातित पाम ऑयल बड़े पैमाने पर पारंपरिक तेलों की जगह लेने लगा क्योंकि इसे खरीदना आसान था और यह खाद्य उद्योग के लिए ज्यादा सस्ता पड़ता था। भारत में बिकने वाले कई रिफाइंड और ब्लेंडेड ऑयल में भी पाम ऑयल मिला होता है, लेकिन अक्सर लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती।
हालाँकि ज्यादा मात्रा में पाम ऑयल का सेवन स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बन गया है। इसमें लगभग 50% सैचुरेटेड फैट होता है। WHO और कई शोधों के अनुसार, इससे खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) बढ़ सकता है और हृदय रोग का खतरा भी बढ़ता है।
इसके बावजूद बिस्किट बनाने वाली कंपनियाँ, रेस्तराँ, होटल और फूड इंडस्ट्री आज भी बड़े पैमाने पर पाम ऑयल का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध और अपेाकृत सस्ता होता है। इससे भारत की आयातित खाद्य तेलों पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है।
बढ़ती तेल खपत के पीछे का स्वास्थ्य संकट
बढ़ती खाद्य तेल खपत अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे यह एक बड़ा स्वास्थ्य संकट भी बनती जा रही है। पिछले दो दशकों में भारत में खाद्य तेल का सेवन तेजी से बढ़ा है। बदलती खानपान की आदतों और आधुनिक जीवनशैली ने लोगों के भोजन में तेल की मात्रा काफी बढ़ा दी है।
आज तली हुई स्ट्रीट फूड, फास्ट फूड, प्रोसेस्ड स्नैक्स और बेकरी उत्पादों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जिनमें बड़ी मात्रा में तेल का उपयोग होता है। हाल के वर्षों में फूड डिलीवरी ऐप्स और रेस्तरां संस्कृति ने भी ज्यादा तेल वाले खाने की खपत को और बढ़ा दिया है। हमने तेल की भारी खपत के आर्थिक प्रभावों पर चर्चा की है, लेकिन भारतीयों के स्वास्थ्य का क्या?

ज्यादा मात्रा में तेल का सेवन कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। अगर प्रति व्यक्ति खाद्य तेल खपत की बात करें, तो 1960 के दशक में भारत में एक व्यक्ति सालभर में केवल 3-4 किलो खाद्य तेल का सेवन करता था।
लेकिन 2024-25 तक यह बढ़कर लगभग 25.3 किलो हो गया है और अनुमान है कि 2030-31 तक यह 40 किलो तक पहुँच सकता है। यानी करीब 60 सालों में भारत में तेल की खपत लगभग 7 गुना बढ़ गई है। अगर हाल के आँकड़ों को देखें, तो 2001 में एक व्यक्ति औसतन सालभर में लगभग 8.2 किलो खाद्य तेल इस्तेमाल करता था।
यानी पिछले दो दशकों में यह खपत लगभग तीन गुना हो चुकी है। यह स्थिति इसलिए और चिंता बढ़ाती है क्योंकि ICMR यानी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार, एक व्यक्ति को प्रतिदिन केवल 20-30 ग्राम तेल का सेवन करना चाहिए, जो सालभर में लगभग 12 किलो के बराबर होता है।
लेकिन आज भारतीय लोग इससे लगभग दोगुना तेल खा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जरूरत से ज्यादा तेल खाने से मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता है।
दोबारा इस्तेमाल होने वाला तेल और छिपे खतरे
NFHS-5 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 24% महिलाएँ और 23% पुरुष मोटापे या अधिक वजन की समस्या से जूझ रहे हैं। भारत उन देशों में शामिल हो चुका है जहाँ मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस के अनुसार, दुनिया में मोटापे से ग्रस्त बच्चों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी भारत में है।
अनुमान है कि 2040 तक भारत में लगभग 5.6 करोड़ बच्चे मोटापे का शिकार हो सकते हैं। यह समस्या केवल मोटापे तक सीमित नहीं है, बल्कि डायबिटीज जैसी बीमारियाँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज से पीड़ित हैं और अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या बढ़कर 15.67 करोड़ तक पहुँच सकती है।
अगर आँकड़ों को देखें, तो पिछले तीन दशकों में भारत में डायबिटीज के मामलों में भारी बढ़ोतरी हुई है। 1990 में जहाँ लगभग 3% आबादी डायबिटीज से प्रभावित थी, वहीं 2021 तक यह बढ़कर करीब 6% हो गई। डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, खराब खानपान, ज्यादा तेल वाला भोजन, प्रोसेस्ड फूड और बढ़ता मोटापा इसके मुख्य कारण हैं।
भारत में हृदय रोग और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियाँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। ये बीमारियाँ दिल और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करती हैं और इनका सीधा संबंध अस्वस्थ खानपान और अत्यधिक तेल सेवन से माना जाता है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के अनुसार, 2016 तक भारत में होने वाली कुल मौतों में लगभग 28% मौतें हृदय रोगों की वजह से हो रही थीं।
वहीं WHO इंडिया के आँकड़ों के अनुसार, 40 से 69 साल की उम्र के लोगों में होने वाली लगभग 45% मौतों के पीछे कार्डियोवैस्कुलर बीमारियाँ जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ दशकों में भारत में हृदय रोगों से होने वाली मौतों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है। 1990 में हर साल करीब 22.6 लाख लोगों की मौत हृदय रोगों से होती थी, जो 2020 तक बढ़कर लगभग 47.7 लाख हो गई।
इसके साथ ही हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। आज भारत में हर चार में से एक व्यक्ति हाई ब्लड प्रेशर से प्रभावित है। लेकिन बड़ी संख्या में लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं होती या उनका इलाज सही तरीके से नहीं हो पाता।
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के लगभग 80% घरों में तलने वाला तेल कई बार दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। बार-बार गर्म किया गया तेल ट्रांस फैट, फ्री रेडिकल्स और जहरीले तत्व पैदा करता है, जो शरीर में सूजन बढ़ाने के साथ-साथ हृदय रोग, फैटी लिवर और कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा भी बढ़ा सकता है।
कैसे भारतीय रसोई को प्रभावित करती हैं वैश्विक घटनाएँ?
भारत की बड़ी आबादी और भारी आयात निर्भरता के कारण देश वैश्विक घटनाओं से आसानी से प्रभावित हो जाता है। भारत खाद्य तेल के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर है, इसलिए दुनिया में होने वाले युद्ध, निर्यात प्रतिबंध और सप्लाई चेन संकट का सीधा असर भारतीय रसोई तक पहुँचता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। भारत रूस और यूक्रेन से बड़ी मात्रा में सनफ्लावर ऑयल आयात करता है। युद्ध शुरू होने के बाद सप्लाई चेन प्रभावित हुई और भारत में खाद्य तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं। इसी तरह भारत पाम ऑयल के लिए इंडोनेशिया और मलेशिया पर काफी निर्भर है।
जब इन देशों ने निर्यात पर प्रतिबंध लगाए, तो भारत में पाम ऑयल की कीमतें तुरंत बढ़ गईं। पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में होने वाले बदलाव का असर सीधे पैकेज्ड फूड, रेस्तराँ और घरों में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल की कीमतों पर पड़ता है।

मुद्रा विनिमय दर यानी रुपए की कमजोरी भी इस समस्या को और बढ़ाती है। क्योंकि भारत खाद्य तेल डॉलर में खरीदता है, इसलिए जब रुपया कमजोर होता है तो आयात लागत बढ़ जाती है, भले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर क्यों न हों। यानी भारत की बढ़ती आयात निर्भरता ने भारतीय रसोई को वैश्विक युद्धों, शिपिंग संकटों और निर्यात प्रतिबंधों से जोड़ दिया है।
अब दुनिया में हजारों किलोमीटर दूर होने वाले संघर्ष भी भारत में कुकिंग ऑयल की कीमतें बढ़ा सकते हैं। इसी वजह से खाद्य तेल अब केवल रसोई का सामान्य सामान नहीं रह गया, बल्कि यह भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक मुद्दा बन चुका है।
सरकार की प्रतिक्रिया और पीएम मोदी की अपील
आयातित खाद्य तेल पर बढ़ती निर्भरता और लाइफस्टाइल बीमारियों के तेजी से बढ़ने के कारण सरकार ने भी इस मुद्दे पर ध्यान देना शुरू किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार लोगों से तेल की खपत कम करने की अपील कर चुके हैं। उन्होंने लोगों से 10% तेल कम इस्तेमाल करने की अपील करते हुए कहा, “इससे देश सेवा भी होगी और देह सेवा भी होगी।”
स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करते हुए उन्होंने चेतावनी दी थी कि आने वाले वर्षों में मोटापा और लाइफस्टाइल बीमारियाँ भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
बाद में विश्व स्वास्थ्य दिवस पर भी उन्होंने कहा कि जरूरत से ज्यादा तेल का सेवन कम करना केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का मामला नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक खाद्य तेल सेवन का सीधा संबंध मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और हृदय रोग जैसी बीमारियों से है।
इसलिए तेल की खपत कम करने से एक तरफ लोगों का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है और दूसरी तरफ देश का आयात बिल भी घट सकता है। सरकार ने जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स–ऑयलसीड्स (NMEO-OS) और नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स–ऑयल पाम (NMEO-OP) जैसी योजनाएँ भी शुरू की हैं।
इन योजनाओं का उद्देश्य देश में तिलहन उत्पादन बढ़ाना, किसानों को बेहतर प्रोत्साहन देना, खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता मजबूत करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। अब सरकार खाद्य तेल को केवल खाने-पीने की चीज नहीं मान रही, बल्कि इसे आर्थिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता से जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा मानकर काम कर रही है।
आप क्या कर सकते हैं: तेल की खपत कम करने के आसान उपाय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की खपत कम करने के लिए लोगों को अपनी आदतों और जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत है। सबसे आसान तरीका यह है कि खाना बनाते समय तेल को बिना नापे इस्तेमाल करने के बजाय उसकी मात्रा तय करके इस्तेमाल किया जाए।
डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा गर्म या बार-बार इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। बार-बार गर्म करने से तेल में ट्रांस फैट, फ्री रेडिकल्स और जहरीले तत्व बनने लगते हैं, जो हार्ट अटैक, डायबिटीज, फैटी लिवर और कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं।
विशेषज्ञ कम प्रोसेस्ड और कोल्ड-प्रेस्ड तेलों का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। साथ ही एक ही प्रकार के तेल पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग तेलों का संतुलित इस्तेमाल बेहतर माना जाता है। पैकेज्ड फूड खरीदते समय उसके लेबल पढ़ना भी जरूरी है, क्योंकि कई प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में छिपे हुए फैट और रिफाइंड ऑयल मौजूद होते हैं।
डीप फ्राइड स्नैक्स, फास्ट फूड, बेकरी उत्पाद और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करने से लंबे समय में स्वास्थ्य जोखिम काफी घट सकते हैं। इसके साथ ही भाप में पकाना, ग्रिल करना, रोस्टिंग और एयर फ्राइंग जैसी हेल्दी कुकिंग तकनीकें तेल की जरूरत कम कर सकती हैं।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बच्चों को छोटी उम्र से ही हेल्दी खानपान की आदतें सिखाना बहुत जरूरी है, क्योंकि कम उम्र में ही मोटापा और लाइफस्टाइल बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं।
डॉक्टरों के अनुसार, संतुलित भोजन, सीमित मात्रा में तेल का सेवन और घर का बना खाना लंबे समय तक स्वस्थ रहने के सबसे प्रभावी तरीकों में शामिल हैं।
निष्कर्ष
कुकिंग ऑयल भले ही रसोई में इस्तेमाल होने वाली एक सामान्य चीज लगे, लेकिन इसके पीछे विदेशी निर्भरता, बदलती खानपान की आदतें, बढ़ते स्वास्थ्य खतरे और आर्थिक असुरक्षा की बड़ी कहानी छिपी हुई है। आज भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है।
कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भारत खाद्य तेल के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। इसकी वजह से भारतीय घर वैश्विक युद्धों, निर्यात प्रतिबंधों, सप्लाई चेन संकट और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं।
दूसरी तरफ जरूरत से ज्यादा खाद्य तेल का सेवन देश में मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियों को तेजी से बढ़ा रहा है। इसलिए खाद्य तेल का मुद्दा अब केवल खेती या खाने तक सीमित नहीं रहा। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा, खाद्य महँगाई और आत्मनिर्भरता से जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है।
सरकार घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात निर्भरता कम करने के लिए कई योजनाएँ और सुधार लागू कर रही है। लेकिन लंबे समय में असली बदलाव तभी संभव होगा जब लोग स्वस्थ खानपान अपनाएँ, संतुलित मात्रा में तेल का सेवन करें, किसानों को बेहतर समर्थन मिले और लोगों में जागरूकता बढ़े। भारत के खाद्य तेल संकट का समाधान केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं बल्कि खाने की आदतें बदलने से भी जुड़ा हुआ है।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


