लद्दाख के कामकाज के तरीके में एक बहुत बड़ा और अच्छा बदलाव हुआ है। यहाँ के उपराज्यपाल (LG) वीके सक्सेना ने 5 नए जिले बनाने का फैसला किया है। पहले लद्दाख में सिर्फ दो ही जिले थे ‘लेह और कारगिल’, लेकिन अब कुल 7 जिले हो जाएँगे। नए बनने वाले जिलों के नाम नुब्रा, शाम, चांगथांग, जांस्कर और द्रास हैं। ऊँचे पहाड़ों और मुश्किल रास्तों के बीच रहने वाले लोगों के लिए यह खबर किसी बड़े तोहफे से कम नहीं है।
कामकाज में आसानी और तरक्की की रफ्तार
लद्दाख जमीन के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा इलाका है। यह करीब 87 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इतने बड़े और पहाड़ों वाले कठिन क्षेत्र को सिर्फ दो जिलों (लेह और कारगिल) के भरोसे चलाना बहुत मुश्किल काम था। अब नए जिले बनने से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सरकार की पहुँच सीधे गाँवों तक हो जाएगी। सरकारी सुविधाएँ अब दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों तक आसानी से पहुँच सकेंगी।
अब लोगों को अपने छोटे-मोटे सरकारी कामों के लिए 300 किलोमीटर दूर लेह या कारगिल के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। सरकारी दफ्तर अब उनके घर के पास होंगे, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बचेगा। साथ ही, जब नए जिलों के हेड ऑफिस बनेंगे, तो वहाँ सड़कें, स्कूल और अस्पताल भी जल्दी-जल्दी बनेंगे। यही नहीं, नए दफ्तर खुलने से स्थानीय युवाओं को सरकारी और प्राइवेट नौकरी मिलने के नए मौके भी मिलेंगे।
पहाड़ी इलाकों और बॉर्डर के लिए क्यों है जरूरी?
लद्दाख की सीमाएँ चीन और पाकिस्तान से लगी हुई हैं, इसलिए यहाँ की सुरक्षा और मजबूती बहुत जरूरी है। नुब्रा और द्रास जैसे इलाके सेना के लिए बहुत खास हैं। द्रास के नया जिला बनने से वहाँ सेना की मदद करना आसान होगा और बिजली-पानी जैसी सुविधाएँ तेजी से बनेंगी। वहीं, चांगथांग जैसे बॉर्डर वाले इलाकों में पुरानी जनजातियों को बचाने और विकास के काम को प्राथमिकता मिलेगी।
पहाड़ों में रहना आसान नहीं होता। जब भारी बर्फबारी होती है, तो कई गाँवों का संपर्क लेह या कारगिल से टूट जाता है। ऐसे में अगर जिले का दफ्तर पास होगा, तो मुसीबत के समय मदद और बचाव का काम जल्दी हो पाएगा। जांस्कर और शाम जैसे नए जिले बनने से वहाँ की देखरेख बेहतर होगी। इससे पर्यटन (टूरिज्म) को बढ़ावा मिलेगा, नए होटल और घूमने की जगहें बनेंगी, जिससे स्थानीय लोगों की कमाई बढ़ेगी।
ओवैसी का ‘रोना’ और डर फैलाने की कोशिश
इस विकासकारी कदम पर एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी पुरानी राजनीति शुरू कर दी है। ओवैसी इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर डर फैला रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार बौद्धों और मुसलमानों की एकता को तोड़ना चाहती है। उन्होंने इसे पुराने जम्मू-कश्मीर राज्य में ‘गेरीमंदारिंग’ (चुनावी लाभ के लिए सीमा बदलना) करार दिया है।
The govt has created 5 new districts in Ladakh. There are now 7 instead of 2 districts. The govt wants to divide the unified statehood movement of Buddhists and Muslims.
— Asaduddin Owaisi (@asadowaisi) April 28, 2026
This is another gerrymandering in the erstwhile state of Jammu and Kashmir
As per the 2011 Census, Ladakh…
ओवैसी 2011 की जनगणना के आँकड़ों का रोना रो रहे हैं। उनके अनुसार लद्दाख में 46.40% मुस्लिम और 39.65% बौद्ध आबादी है। उनका तर्क है कि 7 में से 5 जिले बौद्ध बहुल हैं और सिर्फ 2 मुस्लिम बहुल। ओवैसी का कहना है कि 46% आबादी के लिए सिर्फ 2 जिले रखना भेदभाव है। हालाँकि, सरकार का कहना है कि यह फैसला आबादी के आधार पर नहीं, बल्कि कठिन भूगोल और विकास को ध्यान में रखकर लिया गया है।
सोनम वांगचुक का डर और लोगों की माँग
सोनम वांगचुक ने भी इस पर अपनी बात रखी है। वैसे तो यहाँ के लोग काफी समय से नए जिले चाह रहे थे, लेकिन वांगचुक को एक डर सता रहा है। उन्हें लगता है कि सरकार ने नए जिले शायद इसलिए बनाए हैं ताकि लोग ‘छठी अनुसूची’ (विशेष सुरक्षा वाली माँग) की बात भूल जाएँ। उन्हें चिंता है कि अगर लद्दाख को खास सुरक्षा नहीं मिली, तो बाहर के लोग यहाँ आकर बस सकते हैं, जिससे स्थानीय लोगों की जमीन और उनकी नौकरियाँ छिन सकती हैं।
अभी लद्दाख की दो बड़ी संस्थाएँ (LAB और KDA) पिछले कई सालों से राज्य का दर्जा और नौकरियों में सुरक्षा की माँग कर रही हैं। दूसरी तरफ, केंद्र सरकार का कहना है कि यह फैसला लद्दाख को मजबूत बनाने के लिए लिया गया है ताकि हर इलाके का विकास हो सके। 4 मई को आने वाले चुनावी नतीजों से ठीक पहले सरकार के इस कदम को बहुत बड़ा माना जा रहा है।


