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भारत आते ही जिस ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ में गए US के विदेश मंत्री मार्को रूबियो, वो लगातार विवादों में रहा: जानिए ‘मदर टेरेसा’ की संस्था से जुड़े विवाद

रुबियो की इस यात्रा को महज राजनयिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि भारत सरकार की सख्त कार्रवाई के कारण कमजोर पड़ चुकी ईसाई मिशनरियों को वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और नैतिक मजबूती देने के अमेरिकी प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (United States Secretary of State – Marco Rubio) की 4 दिवसीय भारत यात्रा ने देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक नया भूचाल ला दिया है। पिछले 14 वर्षों में यह पहला मौका है जब अमेरिका के किसी विदेश मंत्री ने दिल्ली से इतर सीधे कोलकाता की धरती पर लैंड किया है। इससे पहले साल 2012 में हिलेरी क्लिंटन सीधे कोलकाता पहुँची थीं। लेकिन रुबियो की इस यात्रा में सबसे ज्यादा ध्यान उनके एक बेहद विवादित और सोचे-समझे कदम ने खींचा है।

कोलकाता पहुँचते ही वे किसी आधिकारिक या रणनीतिक कार्यक्रम के बजाय सीधे मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुख्यालय (मदर हाउस) पहुँच गए।

यह वही संस्था है जो पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार की सख्त निगरानी, विदेशी फंडिंग पर रोक और गंभीर कानूनी आरोपों के केंद्र में रही है। मार्को रुबियो का भारत आते ही सबसे पहले यहाँ जाना और संस्था के पदाधिकारियों के साथ बंद कमरे में मुलाकात करना महज एक कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है। कूटनीतिक गलियारों में इसे भारत की संप्रभुता को चुनौती देने और इन विवादित ईसाई मिशनरियों को वैश्विक स्तर पर मजबूती देने के एक ठोस और रणनीतिक अमेरिकी प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के उन काले अध्यायों और विवादों का गहरा विश्लेषण जरूरी है जो इंटरनेट से लेकर अदालतों तक में गूँज रहे हैं।

फंडिंग पर सरकारी चाबुक यानी एफसीआरए से जुड़ा विवाद

मिशनरीज ऑफ चैरिटी और भारत सरकार के बीच सबसे बड़ा प्रशासनिक और वित्तीय टकराव दिसंबर 2021 में सामने आया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट (FCRA) के तहत संस्था के विदेशी फंडिंग लाइसेंस के नवीनीकरण को पूरी तरह रोक दिया था। गृह मंत्रालय के पास इस बात के पुख्ता इनपुट्स थे कि चंदे के नाम पर विदेशों से आने वाले अकूत धन का इस्तेमाल उन गतिविधियों में हो रहा था जो राष्ट्रहित के खिलाफ थीं।

इसके साथ ही संस्था ने ऑडिट के लिए जरूरी वित्तीय दस्तावेज और खातों का ब्योरा समय पर मुहैया नहीं कराया था, जिससे उनकी वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे।

इस प्रशासनिक कार्रवाई के सामने आते ही देश के भीतर एक बड़ा राजनीतिक बवंडर खड़ा हो गया था। पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कॉन्ग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का बेबुनियाद आरोप लगाया था।

सरकार ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया था कि उसने कोई खाता फ्रीज नहीं किया है, बल्कि भारतीय स्टेट बैंक को खुद संस्था ने ही अपने खातों पर रोक लगाने का अनुरोध भेजा था। बाद में जनवरी 2022 में जब संस्था ने चौतरफा घिरने के बाद आवश्यक दस्तावेज और स्पष्टीकरण सरकार के सामने जमा किए, तब जाकर उनका पंजीकरण बहाल किया गया था।

सेवा की आड़ में जबरन धर्मांतरण और हिंदू भावनाओं पर आघात

इस संस्था पर लंबे समय से ‘सेवा’ और ‘मदद’ के मुखौटे के पीछे बेहद शातिराना तरीके से गरीब हिंदुओं का धर्मांतरण कराने के आरोप लगते रहे हैं। गुजरात के वडोदरा स्थित संस्था के एक बाल गृह (शेल्टर होम) का मामला इसका सबसे जीवंत और डरावना उदाहरण बनकर सामने आया था।

दिसंबर 2021 में जिला सामाजिक सुरक्षा अधिकारी मयंक त्रिवेदी और बाल कल्याण समिति ने मकरपुरा क्षेत्र में स्थित लड़कियों के बाल गृह का औचक निरीक्षण किया था। इस जाँच में जो तथ्य सामने आए, उसने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ पूरे हिंदू समाज को झकझोर कर रख दिया था।

जाँच दल ने पाया कि बाल गृह में रहने वाली बेसहारा हिंदू लड़कियों को जबरन ईसाई मजहब की पुस्तकें (बाइबल) पढ़ने के लिए विवश किया जा रहा था। इन मासूम बच्चियों को ईसाई प्रार्थनाओं में भाग लेने और उनके गले में जबरन क्रॉस बाँधने के लिए मजबूर किया जाता था। इस मामले में गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2003 के तहत हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने और प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में मकरपुरा थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। सेवा के नाम पर चल रहे इस घिनौने खेल का पर्दाफाश तब हुआ जब अधिकारियों को पता चला कि संस्था इन बच्चियों के मूल धर्म को मिटाने पर तुली थी।

जाँच समिति की रिपोर्ट में यह भी चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि एक हिंदू लड़की की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ जबरन एक ईसाई परिवार में कराने का तगड़ा दबाव बनाया गया था। इसके अलावा हिंदू लड़कियों की धार्मिक आस्था को भ्रष्ट करने के उद्देश्य से उन्हें भोजन में जबरन मांसाहारी (मांस) परोसा जाता था।

हालाँकि मिशनरीज ऑफ चैरिटी के प्रवक्ताओं ने इन सभी आरोपों को हमेशा की तरह बेबुनियाद और झूठा बताते हुए खारिज कर दिया। लेकिन पुलिस और जिला कलेक्टर द्वारा गठित कई विभागों की संयुक्त जाँच टीम ने इन आरोपों को सही पाया था, जिसके बाद ही कानूनी शिकंजा कसा गया था।

नवजात बच्चों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा ह्यूमन ट्रैफिकिंग का घिनौना चेहरा

मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर केवल जबरन धर्मांतरण कराने के ही नहीं, बल्कि नवजात बच्चों को पैसों के लिए बेचने जैसे जघन्य और अमानवीय अपराध के आरोप भी लग चुके हैं। यह काला सच साल 2018 में झारखंड के रांची स्थित संस्था के एक शेल्टर होम से सामने आया था।

वहाँ पुलिस ने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की दो सिस्टर्स (नन) को नवजात बच्चों की अवैध खरीद-फरोख्त के आरोप में रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। इस घटना ने मदर टेरेसा द्वारा स्थापित इस संस्था के तथाकथित ‘पवित्र’ और ‘दयालु’ चेहरे के पीछे छिपे भयानक कुरुप सच को दुनिया के सामने ला दिया था।

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। आयोग ने देश की सर्वोच्च अदालत से गुहार लगाई थी कि इन ईसाई मिशनरी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे शेल्टर होम्स से बच्चों के रहस्यमयी तरीके से लापता होने और उन्हें बेचे जाने की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया जाए।

आयोग का आरोप था कि झारखंड के तत्कालीन सरकारी अधिकारियों ने इस संवेदनशील मामले में बेहद ढुलमुल रवैया अपनाया और इस बड़े रैकेट की जाँच को दबाने के लगातार प्रयास किए गए थे।

आयोग की गहन जाँच के दौरान जो आँकड़े सामने आए, वे बेहद डराने वाले और चौंकाने वाले थे। साल 2015 से 2018 के बीच रांची के इस शेल्टर होम में लगभग 450 असहाय और गरीब गर्भवती महिलाएँ भर्ती हुई थीं। लेकिन जब रिकॉर्ड खंगाला गया, तो वहाँ केवल 170 बच्चों का ही कानूनी ब्योरा दर्ज मिला।

बाकी बचे 280 नवजात शिशुओं के बारे में संस्था के पास कोई जानकारी नहीं थी कि वे कहाँ गए और उनका क्या हुआ। इसी तस्दीक के बाद सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और बिहार सहित देश के 9 राज्यों की सरकारों को नोटिस जारी कर इस मानव तस्करी के तारों की जाँच करने का आदेश दिया था।

मदर टेरेसा का काला सच- छलावा, पाखंड और ‘कलकत्ता की पिशाच’

भारत का संविधान देश के प्रत्येक नागरिक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किकता की भावना विकसित करने की बात करता है। लेकिन मदर टेरेसा को वेटिकन द्वारा ‘संत’ की उपाधि दिए जाने की पूरी प्रक्रिया घोर अंधविश्वास, पाखंड और चिकित्सा विज्ञान के सीधे अपमान पर टिकी थी।

टेरेसा को संत बनाने के लिए उनके नाम पर वेटिकन ने यह हास्यास्पद दावा किया कि उनके चित्र को छूने मात्र से लोगों के असाध्य कैंसर और ट्यूमर रातों-रात ठीक हो गए। भारत के डॉक्टरों और बुद्धिजीवियों ने इसे जनता को गुमराह करने वाला सरासर जादू-टोना और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला कृत्य बताया था।

मशहूर ब्रिटिश लेखक क्रिस्टोफर हित्चेंस ने अपनी चर्चित किताब ‘द मिशनरी पोजीशन’ में मदर टेरेसा की इस पाखंडी छवि की धज्जियाँ उड़ाई थीं। उन्होंने अपनी किताब में टेरेसा को सीधे ‘घोउल ऑफ कोलकाता’ यानी ‘कलकत्ता की पिशाच‘ के नाम से संबोधित किया था। हित्चेंस का अकाट्य तर्क था कि टेरेसा का संस्थान पीड़ितों का आधुनिक इलाज करने के लिए नहीं था, बल्कि वह बीमार और मरते हुए लोगों को आधुनिक दवाओं से महरूम रखकर तड़पने के लिए छोड़ देता था। बीमारों से कहा जाता था कि यह दर्द उनके पापों के लिए ईश्वरीय दंड है, जिसे उन्हें बिना किसी शिकायत के चुपचाप झेलना चाहिए।

इस संस्था के घिनौने सच को उजागर करने में अनिवासी भारतीय डॉक्टर अरूप चटर्जी का शोध सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक इस संस्था के कामकाज पर जमीनी शोध किया और अपनी प्रामाणिक किताब ‘Mother Teresa: The Untold Story’ में इसके सारे काले कारनामे उजागर किए।

उन्होंने प्रामाणिक रूप से बताया कि दुनिया भर से इस संस्था को चंदे के रूप में करोड़ों-अरबों रुपए मिलते थे, लेकिन कोलकाता के उनके केंद्रों में मरीजों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएँ, साफ-सुथरी सुइयाँ और दर्द निवारक दवाएँ तक नसीब नहीं होती थीं। चंदे का यह भारी-भरकम पैसा आखिर कहाँ गायब हो जाता था, इसका कोई हिसाब भारत सरकार को नहीं दिया जाता था।

वैश्विक ताकतों का समर्थन और विवादास्पद राजनीतिक सांठगांठ

मदर टेरेसा की पूरी जिंदगी विवादों, कट्टरपंथी बयानों और दुनिया के बड़े-बड़े अपराधियों व भ्रष्टाचारियों से चंदा लेने की कहानियों से भरी पड़ी है। साल 1979 में जब उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था, तब उन्होंने अपने भाषण में दुनिया को चौंकाते हुए कहा था कि वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा परमाणु हथियार या युद्ध नहीं, बल्कि ‘गर्भपात’ है। उनके इस घोर रूढ़िवादी और महिला विरोधी बयान की आधुनिक समाज और दुनिया भर के महिला अधिकार संगठनों ने तीखी भर्चना की थी, जिससे उनका संकीर्ण धार्मिक एजेंडा साफ दिखाई देता था।

साल 1984 में जब भारत के भोपाल में भीषण गैस त्रासदी हुई और हजारों बेगुनाह लोग मारे गए, तब मदर टेरेसा वहाँ सांत्वना देने पहुँची थीं। लेकिन वहाँ पहुँचकर उन्होंने पीड़ितों को न्याय की लड़ाई लड़ने के बजाय कॉरपोरेट अपराधी कंपनी ‘यूनियन कार्बाइड’ को चुपचाप माफ कर देने की आत्मघाती सलाह दी थी।

आलोचकों का साफ मानना है कि वे हमेशा पश्चिमी देशों की कॉरपोरेट ताकतों और रोनाल्ड रीगन व मार्गरेट थेचर जैसी सरकारों की एजेंट के रूप में काम कर रही थीं। इसके अलावा उन्होंने अमेरिका के कुख्यात वित्तीय घोटालेबाज चार्ल्स कीटिंग से 1.25 मिलियन डॉलर का चंदा लिया और बाद में अदालत में उस अपराधी को बचाने के लिए पैरवी तक की थी।

ईसाई मिशनरियों को ऑक्सीजन देने का अमेरिकी प्रयास

इन तमाम घिनौने विवादों, मुकदमों और मानव तस्करी जैसे गंभीर आरोपों के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत आते ही सबसे पहले मिशनरीज ऑफ चैरिटी जाना एक सोची-समझी राजनीतिक पटकथा का हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अमेरिका हमेशा से ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ और ‘मानवाधिकार’ के झूठे मुखौटे का इस्तेमाल करके विकासशील देशों पर अपना रणनीतिक दबाव बनाने की कुटिल नीति अपनाता रहा है।

रुबियो की यह यात्रा असल में भारत सरकार के कड़े रुख के कारण वित्तीय और सामाजिक रूप से कमजोर पड़ चुकी इन मिशनरियों को वैश्विक स्तर पर नैतिक और राजनीतिक ऑक्सीजन देने का एक खुला प्रयास है।

जिस संस्था पर भारत की अदालतों में जबरन धर्मांतरण, बच्चों की खरीद-फरोख्त और वित्तीय हेराफेरी के संगीन कानूनी मुकदमे चल रहे हों, वहाँ अमेरिकी विदेश मंत्री का खुद चलकर जाना भारत की न्याय प्रणाली और आंतरिक सुरक्षा को ठेंगा दिखाने जैसा है। वाशिंगटन इस यात्रा के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि वह भारत में काम कर रहे इन ईसाई नेटवर्क की ढाल बनकर खड़ा है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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