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अब महिला आरक्षण, परिसीमन और मुस्लिम कोटा पर दूर होंगे सारे कन्फ्यूजन: सरकार ने जारी किए FAQ

अगर ये बिल पास होकर लागू हो जाते तो महिलाओं को 33% आरक्षण का फायदा 2029 के लोकसभा चुनाव से ही मिल सकता था। जिसका वो दशकों से इंतजार कर रही हैं।

लोकसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला बिल पास नहीं हो सका जिसके बाद राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। एक तरफ इसे महिलाओं के अधिकारों के लिए बड़ा कदम माना जा रहा था तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह इसके जरिए परिसीमन और सीटों के बँटवारे को अपने तरीके से आगे बढ़ाना चाहती है।

इन सवालों और आरोपों के बीच केंद्र सरकार ने 14 सवालों का एक FAQ जारी कर अपनी स्थिति साफ की है। इसमें सरकार ने आसान भाषा में बताया है कि महिला आरक्षण, परिसीमन और लोकसभा सीटों को लेकर उसकी क्या योजना है और कदम उठाए जाएँगे।

सवाल: 16 अप्रैल, 2026 को केंद्र सरकार ने लोकसभा में कौन से बिल पेश किए?

जवाब: 16 अप्रैल को केंद्र सरकार ने लोकसभा में तीन खास बिल पेश किए। इनमें संविधान (131वां संशोधन) बिल, 2026, डिलिमिटेशन बिल, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल, 2026 शामिल हैं।

सवाल: केंद्र सरकार की ओर से ये तीनों विधेयक सदन ने अभी क्यों लाए गए?

जवाब: ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण कानून) में यह कहा गया है कि महिलाओं के लिए आरक्षण जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया के आधार पर लागू किया जाएगा, जो 2026 के बाद होगी। अगर सरकार जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन का इंतजार करती तो महिलाओं को 33% आरक्षण का फायदा 2029 के लोकसभा चुनाव में भी नहीं मिल पाता क्योंकि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने में काफी समय लगता है। इसी वजह से महिलाओं को समय पर इसका फायदा मिल सके इसके लिए यह जरूरी समझा गया कि इस कानून को लागू करने को इस शर्त से अलग कर दिया जाए।

सवाल: अगर ये बिल पास हो जाते तो देश की महिलाओं को क्या फायदा होता?

जवाब: अगर ये बिल पास होकर लागू हो जाते तो महिलाओं को 33% आरक्षण का फायदा 2029 के लोकसभा चुनाव से ही मिल सकता था। जिसका वो दशकों से इंतजार कर रही हैं।

सवाल: नारी शक्ति वंदन अधिनियम के साथ परिसीमन (delimitation) को क्यों जोड़ा गया और सीटें बढ़ाने की बात क्यों हुई?

जवाब: परिसीमन का मतलब होता है किसी चुनाव क्षेत्र (constituency) की सीमाएँ तय करना। महिलाओं के आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए यह जरूरी होता। लोकसभा में सीटों की अधिकतम संख्या 1976 में 550 तय की गई थी। उस समय (1971 में) भारत की आबादी करीब 54 करोड़ थी जबकि आज यह लगभग 140 करोड़ हो चुकी है। इसलिए यह जरूरी माना गया कि लोकसभा की सीटें बढ़ाकर करीब 850 की जाएँ ताकि संसद में लोगों का सही और बराबर प्रतिनिधित्व हो सके।

सवाल: क्या परिसीमन आयोग के कानून में राजनीतिक फायदे के लिए कोई बदलाव करने की कोशिश हुई? क्या चल रहे चुनावों पर इसका असर पड़ेगा?

जवाब: नहीं, परिसीमन आयोग के कानून में कोई बदलाव करने का प्रस्ताव नहीं था। अभी जो कानूनी व्यवस्था है, वही लागू रहेगी। आयोग की कोई भी सिफारिश संसद की मंजूरी और राष्ट्रपति की सहमति के बाद ही लागू होगी। और जो चुनाव अभी चल रहे हैं, जैसे तमिलनाडु या पश्चिम बंगाल में तो उन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। 2029 तक के सभी चुनाव मौजूदा व्यवस्था के अनुसार ही होंगे।

सवाल: लोकसभा की सीटें 850 तक बढ़ाने के पीछे क्या सोच थी?

जवाब: इस प्रस्ताव के पीछे यह विचार था कि सीटों को एक समान तरीके से बढ़ाया जाए। यानी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के लिए 50% सीटें बढ़ाई जाएँ ताकि सबका अनुपात बना रहे। अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं। अगर इसमें 50% बढ़ोतरी की जाए तो यह करीब 815 सीटें हो जाती हैं। इसी आधार पर अधिकतम सीमा (cap) को 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा गया।

सवाल: क्या नए परिसीमन से दक्षिण भारत या छोटे राज्यों को नुकसान होता?

जवाब: नहीं, ऐसा नहीं होता। सभी राज्यों में एक समान 50% सीटें बढ़ाई जातीं इसलिए किसी का हिस्सा कम नहीं होता। दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घटने के बजाय लगभग वही बना रहता। उदाहरण के तौर पर:

  • तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 हो जातीं
  • कर्नाटक की 28 से बढ़कर 42
  • आंध्र प्रदेश की 25 से बढ़कर 38
  • तेलंगाना की 17 से बढ़कर 26
  • केरल की 20 से बढ़कर 30

इन पाँचों दक्षिणी राज्यों की कुल सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जातीं। अभी लोकसभा में दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी 23.76% है जो बढ़कर करीब 23.87% हो जाती यानी लगभग बराबर ही रहती।

सवाल: जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण किया है, क्या उन्हें नुकसान होता?

जवाब: नहीं, उन्हें कोई नुकसान नहीं होता। क्योंकि सीटें सभी राज्यों में एक समान अनुपात में बढ़ाई जा रही थीं और इसलिए उनका प्रतिनिधित्व या तो वैसा ही रहता या थोड़ा बेहतर हो जाता।

सवाल: क्या अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ता?

जवाब: नहीं, परिसीमन की प्रक्रिया में SC और ST के लिए आरक्षित सीटें भी उनके अनुपात के हिसाब से तय होती हैं। जब कुल सीटें बढ़तीं तो उनके लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ती जिससे उनका प्रतिनिधित्व और मजबूत होता।

सवाल: क्या यह संवैधानिक संशोधन बिल जाति जनगणना को टालने के लिए लाया गया था?

जवाब: नहीं, ऐसा नहीं है। सरकार पहले ही जाति जनगणना के लिए तय समय के अंदर पूरा होने वाला कार्यक्रम शुरू कर चुकी है। इसमें लोगों की गिनती के दौरान उनकी जाति से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी।

सवाल: आरक्षण में मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा क्यों नहीं रखा गया?

जवाब: भारत का संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण देने की अनुमति नहीं देता। यहाँ आरक्षण सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है जैसा कि संविधान में तय किया गया है।

सवाल: महिलाओं का आरक्षण 2024 के लोकसभा चुनाव में ही क्यों लागू नहीं किया गया?

जवाब: आरक्षण लागू करने के लिए पहले परिसीमन जरूरी होता है। परिसीमन एक लंबी और विस्तार से चलने वाली प्रक्रिया है, जिसे पूरा होने में लगभग 2 साल लगते हैं। इसी वजह से महिलाओं के आरक्षण को लागू करने के लिए ये बिल (जिसमें परिसीमन से जुड़ा बिल भी शामिल है) संसद में लाए गए।

सवाल: जब तुरंत लागू नहीं करना था, तो 2023 में महिला आरक्षण बिल क्यों लाया गया?

जवाब: यह बिल 2023 में इसलिए लाया और पास किया गया, ताकि महिलाओं के आरक्षण के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा तैयार किया जा सके। इसे सभी दलों का समर्थन मिला जिससे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लागू करने का रास्ता साफ हुआ।

सवाल: केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories) के लिए अलग बिल की जरूरत क्यों पड़ी?

जवाब: जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाएँ अलग-अलग कानूनों के तहत चलती हैं। इसलिए वहाँ महिलाओं के आरक्षण को लागू करने के लिए अलग से संशोधन करने पड़े जिसके लिए एक अलग बिल लाना जरूरी था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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