Wednesday, April 1, 2020
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‘विदेशी चंदा, सांसदों और मीडिया की लॉबिंग’: SC ने माँगा सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह से जवाब

याचिका में दावा किया गया कि जयसिंह और ग्रोवर ने कुछ क़ानूनों को पारित कराने और नीतिगत फैसलों को प्रभावित करने के लिए संसद सदस्यों के साथ अनधिकृत तरीके से और मीडिया के ज़रिए देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए विदेशी धन प्राप्त किया है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के एक स्वैच्छिक संगठन ‘लॉयर्स वॉइस’ द्वारा दायर जनहित याचिका के आधार पर सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह, आनंद ग्रोवर और उनके एनजीओ ‘लॉयर्स कलेक्टिव’ को एक नोटिस जारी किया है। यह नोटिस प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने जारी किया। इस याचिका में संबंधित संस्थाओं द्वारा विदेशी चंदा (नियमन) अधिनियम (FCRA) क़ानून के उल्लंघन पर केंद्र सरकार की निष्क्रियता के लिए SIT (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) जाँच की माँग की गई है।

FCRA उल्लंघन की ख़बर सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने ग़ैर सरकारी संगठन के FCRA लाइसेंस को रद कर दिया था, लेकिन दोषियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि इनके द्वारा जुटाए गए धन का राष्ट्र के ख़िलाफ़ गतिविधियों में उपयोग किया गया।

लॉयर्स वॉइस नामक संगठन की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट पुरुषेंद्र कौरव ने गृह मंत्रालय के 31 मई, 2016 और 27 नवंबर, 2016 के आदेश का हवाला देते हुए कोर्ट को बताया, “जयसिंह और आनंद ग्रोवर ने विदेशी चंदा अधिनियम का उल्लंघन कर धन हासिल किया। इसके अलावा दोनों ने देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते हुए सांसदों और मीडिया के साथ लॉबिंग कर कई महत्वपूर्ण निर्णयों और नीति निर्धारण को प्रभावित करने की कोशिश की।”

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इसके अलावा याचिका में यह भी दावा किया गया कि जयसिंह और ग्रोवर ने कुछ क़ानूनों को पारित कराने और नीतिगत फैसलों को प्रभावित करने के लिए संसद सदस्यों के साथ अनधिकृत तरीके से और मीडिया के ज़रिए देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए विदेशी धन प्राप्त किया है। याचिका में केंद्र के आदेशों का ज़िक्र किया गया है, जिसके ज़रिए लॉयर्स कलेक्टिव का लाइसेंस 2016 में रद कर दिया गया था और FCRA के कथित उल्लंघन को लेकर बाद में स्थायी रूप से रद कर दिया गया था। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जयसिंह, ग्रोवर और लॉयर्स कलेक्विटव ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) तथा भ्रष्टाचार रोकथाम क़ानून का उल्लंघन किया।

याचिका में कहा गया है कि यह सब कुछ तब किया गया, जब इंदिरा जयसिंह अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के पद पर थीं। इस पद पर तैनात व्यक्ति अपनी क़ानूनी राय के माध्यम से सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सकता है। याचिकाकर्ता ने कहा कि केंद्र सरकार इस मामले में जाँच कराने में असफल रही है।

पिछले दो दशकों में कई स्वैच्छिक संगठनों की बढ़त देखी गई है, जो विदेशी स्रोतों द्वारा वित्त पोषित हैं। इनके ज़रिए देश के विकास को विफल करने की कोशिश की जाती रही है। इस तरह के स्वैच्छिक संगठन विदेशी फंडिंग पर पोषित होते हैं और विभिन्न गतिविधियों को अंजाम देते हैं जो राष्ट्र के हित में नहीं हैं।

ख़बर के अनुसार, ठेठ अंदाज़ में इंदिरा जयसिंह ने CJI गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों को सही ठहराया था। लॉयर्स कलेक्टिव द्वारा जारी एक बयान में, यह दावा किया गया था कि याचिका 10 मई को ली जानी चाहिए थी, लेकिन इसकी जगह 8 मई को सूचीबद्ध किया गया।

इस बयान में आगे दावा किया गया कि CJI गोगोई को इस मामले से ख़ुद को अलग कर लेना चाहिए था। इसमें लिखा गया है, “यह देखते हुए कि सुश्री जयसिंह सार्वजनिक रूप से इन-हाउस पूछताछ के संचालन के संबंध में क़ानून की उचित प्रक्रिया के मुद्दे पर मुखर रही हैं, मुख्य न्यायाधीश को इस मामले की सुनवाई से ख़ुद को दूर रखना चाहिए।”

इस बीच, याचिकाकर्ता (लॉयर्स वॉइस) ने अनुरोध किया कि आईपीसी, पीएमएलए और पीसी अधिनियम के तहत अपराधों के लिए जयसिंह, ग्रोवर और लॉयर्स कलेक्टिव के ख़िलाफ़ एक FIR दर्ज की जाए। आयकर अधिनियम के उल्लंघन के लिए भी कार्रवाई की माँग की गई है।

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