Wednesday, January 27, 2021
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दलित और सिख उनके लिए हथियार भी, शिकार भी

यह वक़्त है इतिहास से सबक लेते हुए इन मजहबी आदमखोरों के छिपे एजेंडे को बेनकाब करने का। वरना आज लंगर में भाईचारा दिखा रही यही कट्टरपंथी ताकतें कल फिर अपना एजेंडा पूरा होते ही मारने-काटने से भी गुरेज नहीं करेंगे।

एक नारा है- जय भीम-जय मीम। इस नारे का अब तक का सफर विश्वासघातों से ही भरा है। ऐसे मौकों की फेहरिस्त काफी लंबी है, जब फायदे के लिए दलितों का पहले इस्तेमाल करने वालों ने ही बाद में मजहब के नाम पर उनका नरसंहार किया। ऐसा ही कुछ सिखों के साथ भी हर दौर में होता आया है।

इतिहास उन असंख्य अत्याचार, अनगिनत यातनाओं और बर्बरतापूर्ण तरीकों से भरा पड़ा है जिनका इस्तेमाल कर इस्लामी शासकों ने सिखों का खून बहाया। मसलन;

  • ​30 मई 1606 को सिखों के पाँचवे गुरु अर्जन देव जी को गर्म तवे पर बैठाकर ऊपर से खौलता तेल और गरम रेत डाली गई। फफोले पड़ने के बाद उनके शरीर को रावी नदी में बहा दिया गया।
  • केश कटवाने से इनकार करने पर 01 जुलाई 1745 को भाई तारू सिंह के सिर से खोपड़ी को ही अलग कर दिया गया।
  • इस्लाम कबूल नहीं करने पर 09 नवम्बर 1675 को गुरु तेग बहादुर के शिष्य भाई मतिदास के हाथों को दो खंभों से बाँधकर चीर दिया गया।
  • 09 नवम्बर 1675 को ही एक बड़ी देग में पानी डालकर उसमें भाई दयालदास को बिठाया गया और फिर देग का मुँह बंद कर नीचे से आग लगा दी गई। पानी को तब तक उबाला गया, जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो गई।
  • 10 नवम्बर 1675 को भाई मतिदास के बड़े भाई सतीदास को रूई में लपेटकर जलाया गया।
  • गुरु गोविन्द सिंह के शिष्य भाई मोतीराम मेहरा को परिवार सहित, जिसमें छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल थे, गन्ने पेरनेवाले कोल्हू में निचोड़कर मारा गया।
  • 12 दिसम्बर 1705 को गुरु गोविन्द सिंह के दो साहिबजादों, फतेह सिंह एवं जोरावर सिंह को दीवार में जीवित ही चुनवा दिया गया।
  • 09 जून 1716 को गुरु गोविन्द सिंह के सेनापति बाबा बन्दा सिंह बहादुर के पूरे शरीर की खाल गरम लोहे के चिमटों से उतार दी गई। खाल उतारते समय उनके सामने ही उनके मासूम बच्चे को काटकर उसका कलेजा बन्दा सिंह बहादुर के मुंह में ठूॅंसा गया। आखिर में उन्हें हाथी के पाँव तले कुचलवा दिया गया।
  • भाई सुबेग सिंह को लौहचक्रों में बाँधकर कील से पूरे शरीर को छेद दिया गया।

यहाँ तक कि सिखों के हौसलों को तोड़ने के लिए छोटे-छोटे बच्चों के टुकड़े किए गए और आसमान में उछालकर भालों से उन्हें गोद दिया गया। आप कह सकते हैं कि ये बीते कल की बातें है। फिर मेरी नजरों के सामने विभाजन के समय की वे कहानियाँ तैरने लगती हैं जिनमें सिख और हिंदू औरतों के स्तन तक काट दिए गए। गुजराँवाला के वे बाप बलवंत याद आ जाते हैं जिन्होंने अपनी सात बेटियों को ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का शोर करती उस भीड़ से बचाने के लिए एक-एक कर काटकर कुएँ में फेक दिया था। यह सब उस दौर में गुजराँवाला में हुआ जब जाट, गुज्जरों और राजपूत मुसलमानों का यह शहर सब ‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया’ गाता था। हर कोई बाबा बुल्ले शाह और बाबा फरीद की कविताएँ पढ़ता था। सूफी मजारों पर जाते थे।

यह किसी एक गुजराँवाला, किसी एक बलवंत या फिर किसी एक प्रभावती की कहानी नहीं है। उस समय नए बने पाकिस्तान के हर शहर की मस्जिद से एक भीड़ निकलती और उनके जुबान पर यही नारे होते;

  • पाकिस्तान का मतलब क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह
  • हंस के लित्ता पाकिस्तान, खून नाल लेवेंगे हिंदुस्तान
  • कारों, काटना असी दिखावेंगे
  • किसी मंदिर विच घंटी नहीं बजेगी हून
  • हिंदू दी जनानी बिस्तर विच, ते आदमी श्मशान विच

आप इसे भी विभाजन का उन्माद बताकर खारिज कर दीजिए। पर 1990 के कश्मीर में क्या हुआ था? शुरुआत में सिख-मुस्लिम भाईचारे की आड़ में इस्लामी कट्टरपंथियों ने पहले कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया। नारा बुलंद किया- हमें पाकिस्तान चाहिए। पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ। फिर उन्हीं आतंकियों ने छत्तीसिंहपुरा जैसे नरसंहार को अंजाम दिया। अनंतनाग जिले का छत्तीसिंहपुरा सिखों का गाँव था। 200 सिख परिवारों के इस गाँव में 20 मार्च 2000 की रात सिख लोगों को घरों से बाहर निकाला गया। फिर उन्हें भून दिया गया। पलक झपकते ही 35 लाशों का ढेर लग गया। गोली चलाने वालों में एक मोहम्मद याकूब भी था। बगल के ही गाँव का। जिसे मरने वाले सिख ‘चट्टिया’ नाम से जानते भी थे और अपना मानते भी थे।

लेकिन, आप भी लिबरल बड़े वाले हैं। सो कहेंगे कि अब तो 2020 है। वक्त बदल गया है। फिर मुझे याद आने लगता है 2020 में ही सीएए विरोध के नाम पर शाहीनबाग में हुआ एक जमावड़ा जिसकी परिणति उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के तौर पर हुई। तब भी भाईचारे के नाम पर लंगर लगे थे।

इसलिए आज जब कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर दिल्ली की सीमाओं पर जमावड़ा लगा है। आपके पास ऐसी खबरें आ रही हैं: मुस्लिमों ने अदा की नमाज, प्रोटेक्शन में खड़े दिखे सिख या फिर ये स्वर सुनाई पड़ते हैं आज सिख किसान सड़क पर हैं, आधा पंजाब सड़क पर है, तो लंगर की जिम्मेदारी मुसलमानों की है… तो इस भाईचारे पर लहोलोहाट मत होइए।

असल में यह सावधान होने का वक्त है। क्योंकि इतिहास के पाठ हमारे सामने हैं। उनके आज के कारनामे भी। याद करिए कैसे मजहब के नाम पर अफगानिस्तान से सिखों का सफाया किया गया। कैसे पाकिस्तान में हिन्दू और सिख गिनती के बचे हैं। कैसे किसान आंदोलन के बीच ही लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा क्षतिग्रस्त कर दी गई। कैसे सीएए विरोध के नाम पर आपके देश के कई शहरों को हिंसा में झोंक दिया गया। सीरिया से लेकर फ्रांस तक वे कैसे मजहब के नाम पर आज भी गला रेत रहे हैं।

यह खतरा तब और बड़ा हो जाता है जब कथित किसान आंदोलन में खालिस्तानियों, इस्लामी कट्टरपंथियों और अतिवादी वामपंथियों की घुसपैठ को लेकर लगातार खबरें भी आ रही हैं। आपकी जिंदगी केवल इन्हीं ताकतों के लिए ही सस्ती नहीं है, बल्कि इनके सियासी सरपरस्तों को भी आपकी फिक्र नहीं है। यही कारण है कि जब नामशूद्रों का वामपंथी संहार कर रहे थे तो कॉन्ग्रेस भी चुप बैठी थी।

1979 के इस नरसंहार को लेकर पत्रकार दीप हालदार ने अपनी किताब ‘द ब्लड आइलैंड’ में एक प्रत्यक्षदर्शी के हवाले से कहा है, “14-16 मई के बीच आजाद भारत में मानवाधिकारों का का सबसे खौफनाक उल्लंघन किया गया। पश्चिम बंगाल की सरकार ने जबरन 10 हजार से ज्यादा लोगों को द्वीप से खदेड़ दिया। बलात्कार, हत्याएँ और यहॉं तक की जहर देकर लोगों को मारा गया। समंदर में लाशें दफन कर दी गईं। कम से कम 7000 हजार मर्द, महिलाएँ और बच्चे मारे गए।” इसी नरसंहार को लेकर दलित लेखक मनोरंजन व्यापारी ने कहा था कि यह एक ऐसा नरसंहार है, जिसने सुंदरबन के बाघों को आदमखोर बना दिया।

इसलिए, यह वक़्त है इतिहास से सबक लेते हुए इन मजहबी आदमखोरों के छिपे एजेंडे को बेनकाब करने का। वरना आज लंगर में भाईचारा दिखा रही यही कट्टरपंथी ताकतें कल फिर अपना एजेंडा पूरा होते ही मारने-काटने से भी गुरेज नहीं करेंगे।

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

 

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