Wednesday, April 1, 2020
होम देश-समाज सोनभद्र: हत्याकांड की बुनियाद आजादी से भी पुरानी, भ्रष्ट अधिकारियों ने रखी नींव

सोनभद्र: हत्याकांड की बुनियाद आजादी से भी पुरानी, भ्रष्ट अधिकारियों ने रखी नींव

माहेश्वरी नारायण द्वारा ली गई यह जमीन 1955 में भी कानूनी रूप से किसी के नाम पर नहीं की जा सकती थी, तो वर्ष 2019 में इस जमीन पर किसी व्यक्ति द्वारा मालिकाना हक़ बताना ही गलत है।

ये भी पढ़ें

आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में आदिवासियों की 150 बीघा जमीन पर कब्जे को लेकर हुई हत्याओं पर पूरे देश में नाराजगी दिख रही है। घोरावल के मूर्तिया गाँव में बीते बुधवार की दोपहर जमीनी विवाद में दो पक्षों के बीच जमकर खूनी संघर्ष हुआ। यह भी सच है कि कुछ लोग इस घटना के बहाने अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आदिवासियों की मौत पर राजनीति कर रहे लोगों की पार्टी के सरकार के जमाने में ही इस नरसंहार की पटकथा तैयार की जा चुकी थी!

आदिवासियों की जमीन पर नौकरशाहों और पूँजीपतियों का कब्ज़ा कोई नई बात नहीं है। हाल ही में हरियाणा में एक प्रकरण सामने आया था जिसमें आदिवासियों के नाम पर कई एकड़ जमीन निकल आई थी। दरअसल, अन्य राज्यों के पूंजीपतियों द्वारा यहाँ पर अवैध रूप से जमीन आदिवासियों के नाम पर खरीदी गई थी। भू-माफिया अक्सर टैक्स और अन्य कानूनों से बचने के लिए राज्य सरकार की मदद से इस तरह के कारनामों को अंजाम देते आए हैं।

आदिवासियों की जमीन की गैर-आदिवासियों के बीच खरीद-बिक्री की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो जमींदारी प्रथा के उन्मूलन से पूर्व आदिवासी भूमि का हस्तानांतरण जमींदारों की आपसी साँठ-गाँठ से होता था। जमींदारी जाने के बाद यह कार्य द्विसंधि से प्राप्त डिक्री के आधार पर होने लगा।

- विज्ञापन - - लेख आगे पढ़ें -

यह भी पढ़िए: सोनभद्र नरसंहार में SDM समेत 5 निलंबित, पूर्व अधिकारी भी जाँच के दायरे में

वर्ष 1954 में जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोनभद्र गए थे तो वहाँ की जमीन और प्रकृति से प्रभावित होकर इसे भारत का स्विट्ज़रलैंड बताया था। लेकिन नेहरू शायद तब यह नहीं जानते थे कि उनके इस स्विट्ज़रलैंड में उन्हीं की नाक के नीचे किस प्रकार का काला धंधा पनप रहा है।

सोनभद्र: टाइमलाइन, एक नजर

ओबरा-आदिवासी बाहुल्य जनपद में सदियों से आदिवासियों की जोत भूमि को तमाम नियमों के आधार पर नजरअंदाज किया जाता रहा है। तमाम सर्वे के बावजूद अधिकारियों की संवेदनहीनता उन्हें भूमिहीन बनाती रही है। घोरावल के मूर्तिया उम्भा गाँव में हुए खूनी संघर्ष के पीछे प्रशासनिक लापरवाही भी बड़ी दोषी रही है। इस गाँव में पिछले 70 वर्ष से ज्यादा समय से खेत जोत रहे गोड़ जनजाति के लोग प्रशासन से गुहार लगाते रहे, लेकिन उन्हें उनकी जमीन पर अधिकार नहीं दिया गया। जबकि तत्कालीन जिलाधिकारी अमित कुमार सिंह ने सहायक अभिलेख अधिकारी को मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन कर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। 2 फरवरी 2019 को उनके तबादले के चार दिन बाद 6 फरवरी 2019 को सहायक अभिलेख अधिकारी ने आदिवासियों की माँग को अनसुना कर दाखिला ख़ारिज जारी करते हुए बेदखली का आदेश दे दिया। यही निर्णय बुधवार की घटना की नींव बना।

1955 से लगातार चर्चा में रहा मामला

यह मामला वर्ष 1955 से चला आ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बिहार के आईएएस प्रभात कुमार मिश्रा और तत्कालीन ग्राम प्रधान ने उम्भा की लगभग 600 बीघा जमीन को अपने नाम कराने का प्रयास किया था। जबकि गाँव वालों का कहना है कि वहाँ के आदिवासी 1940 से पूर्व से ही इन जमीनों पर काबिज रहे हैं और वहाँ खेती करते आए हैं।

दिसम्बर 17, 1955 :

उक्त आईएएस अधिकारी ने तहसीलदार के माध्यम से 17 दिसम्बर 1955 में जमीन को आदर्श कॉपरेटिव सोसायटी के नाम करा ली। यह सोसायटी बिहार के मुजफ्फरपुर निवासी माहेश्वरी प्रसाद नारायण सिन्हा द्वारा बनाई गई थी। जबकि उस समय तहसीलदार को नामान्तरण का अधिकार नहीं था। नारायण सिन्हा ने तहसीलदार से साँठ-गाँठ कर के 639 बीघा जमीन को सोसायटी के नाम कर लिया। ध्यान रखिए कि यह सब नियमों के विरुद्ध किया गया था।

इसके बाद माहेश्वरी नारायण (आदर्श कॉपरेटिव सोसायटी के मालिक) ने इस जमीन में से 148 बीघा अपने IAS दामाद (प्रभात कुमार मिश्र, निवासी- पटना) की सहायता से तहसीलदार द्वारा अपनी बेटी आशा मिश्र के नाम करवा दी गई थी।

सितम्बर 06, 1989

इसके बाद यही जमीन आशा मिश्र (पत्नी- प्रभात कुमार, आईएएस अधिकारी) ने अपनी बेटी किरण कुमार के नाम कर दी, उनके पति, भानु प्रसाद (निवासी, भागलपुर) भी IAS हैं। इस सबके बीच गाँव के लोग जमीन पर कृषि कार्य करते रहे और उपज का हिस्सा IAS परिवार को पहुँचा देते थे।

अक्टूबर 17, 2017

यही वो समय था, जब किरण कुमार ने यह जमीन गाँव के प्रधान यज्ञवत सिंह को बेच दी। ग्रामीणों द्वारा बताया जा रहा है कि यह सौदा 2 करोड़ रुपए में हुआ था। ग्रामीणों द्वारा इस सौदे का विरोध भी किया गया था।

ध्यान देने की बात यह है कि माहेश्वरी नारायण द्वारा ली गई यह जमीन 1955 में भी कानूनी रूप से किसी के नाम पर नहीं की जा सकती थी, तो वर्ष 2019 में इस जमीन पर किसी व्यक्ति द्वारा मालिकाना हक़ बताना ही गलत है।

फरवरी 06, 2019

प्रधान यज्ञदत्त द्वारा इस जमीन का दाखिला ख़ारिज करवाया गया। कानून के अनुसार सोसायटी की जमीन किसी व्यक्ति के नाम नही हो सकती। नामान्तरण के खिलाफ ग्रामीणों ने एआरओ (सहायक समीक्षा अधिकारी) के यहाँ शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन 6 फरवरी 2019 को एआरओ ने ग्रामीणों के खिलाफ आदेश दिया। ग्रामीणों ने उसके बाद जिला प्रशासन को भी इस बारे में अवगत कराया, लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई।

पाँच महीने बाद प्रधान पूरी तैयारी के साथ आया था। लेकिन ग्रामीणों ने उसके विरोध किया। प्रधान यज्ञदत्त ने इस मामले में न्यायालय का सहारा लेने किस कोशिश की पर कोई फायदा नहीं हुआ। इन सब बातों से बौखलाया प्रधान यज्ञदत्त किसी भी प्रकार से 100 बीघा से ज्यादा जमीन हथियाने के प्रयास करने लगा और बुधवार को हुआ नरसंहार इस बात का प्रमाण है।

राजस्व विभाग के भ्रष्ट अफसर हैं गुनहगार

उत्तर प्रदेश के इस आदिवासी इलाके में राजस्व अधिकारियों द्वारा की गई धोखाधड़ी की पड़ताल करने पर पता चला कि हाल के दिनों में सोनभद्र भ्रष्ट नौकरशाहों, राजनेताओं और माफिया डॉन का अड्डा बन गया है जो औने-पौने दाम में जमीन खरीदते हैं। तहसील के उम्भा गाँव में जहाँ बुधवार को नरसंहार की वारदात हुई, वहाँ से महज कुछ सौ गज की दूरी पर स्थित विशंब्री गाँव में 600 बीघे का बड़ा भूखंड उत्तर प्रदेश सरकार के चकबंदी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने हड़प रखा है।

आदिवासियों की जमीन और उनसे जुड़े कानून आज भी पेचीदा हैं

आँकड़ों की यदि बात करें तो भारत में आज भी करीब 30 करोड़ से ज्यादा लोग जंगलों में जीवन-यापन करने वाले हैं। इनमें से मात्र साढ़े चार करोड़ लोगों द्वारा ही जमीन और संपत्ति अपने नाम पर की गई है। प्राकृतिक सम्पदा और अपने आर्थिक हितों के कारण ये लोग आधे से ज्यादा जनजातीय हिस्सों में बसते हैं या फिर आदिवासी तरीकों से अपना जीवनयापन करते आए हैं। इनमे से अधिकतर जमीन या तो भर्ती वन अधिनियम (Indian Forest Act, 1927) के तहत संरक्षित हैं या फिर अभी भी अवर्गीकृत हैं।

मुख्यधारा से ये लोग आज भी इतने कटे हुए हैं कि इन्हें सरकारी उपक्रमों, नियम कानून और किसी संवैधानिक संरचना के बारे में शायद ही कोई विशेष जानकारी हो। इसी बात का फायदा बाहर से आने वाले पूँजीपति और नौकरशाह आसानी से उठा लेते हैं। ये जमीनें या तो प्राकृतिक सम्पदा से संपन्न होती हैं या फिर इन पर भविष्य में उद्योग लगाने के नजरिए से इन पर अधिकार जमा लिया जाता है।

यह भी पढ़िए: सोनभद्र नरसंहार में रासुका के तहत कार्रवाई, फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलेगा मुकदमा

सोनभद्र प्रकरण ने हर उस अफसर के कान जरूर खड़े कर दिए होंगे जो इस प्रकार के किसी भी धंधे में संलिप्त रहा है और इस सरकारी तंत्र और उसकी नीतियों में मौजूद कमियों का फायदा उठाते आ रहे हैं। देखा जाए तो सोनभद्र प्रकरण से उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरा देश एक सबक ले सकता है और तुरंत इस मामले में उचित कार्रवाई करते हुए कमजोर कड़ियों, चाहे वो नियम-कानून हों या फिर सरकारी तंत्र हों, पर संज्ञान लेते हुए कुछ ऐतिहासिक कदम उठाएँ।

भूदान आंदोलन का गवाह हमारा यह देश आज भू-माफियाओं के चंगुल में है और शायद ही कोई सरकार इस बात से अनजान हो। यही समय है कि देश का शासन-प्रशासन इस मामले पर अपनी नींद तोड़कर आवश्यक कार्रवाई करे ताकि भविष्य में इस प्रकार की किसी दुर्घटना से बचा जा सके।

- ऑपइंडिया की मदद करें -
Support OpIndia by making a monetary contribution

ख़ास ख़बरें

आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

ताज़ा ख़बरें

Covid-19: दुनिया भर में संक्रमितों की कुल संख्या 853981, भारत में अब तक संक्रमितों की संख्या 1397, 35 मौतें

दुनिया भर में अब तक 853,981 लोग इस वायरस की चपेट में आ चुके हैं। इनमें 42,006 की मौत हो हुई है। 176,906 को सफलतापूर्वक रिकवर भी कर लिया गया है। भारत में 35 लोग अब तक इस संक्रमण से जान गॅंवा चुके हैं।

सिसली में शवों से भरे 12 जहाजों से लेकर वुहान के कोरोना तक: हमेशा गतिशील धनाढ्य वर्ग के कारण फैले ऐसे विषाणु

पैनडेमिक के पीछे कभी भी गरीब, पिछड़े और आम जीवन व्यतीत करने वालों का हाथ नहीं रहा। इसके पीछे प्राय: धनी, सुदृढ़, प्रवासी, धनाकांक्षी, गतिशील लोग होते थे और आज भी स्थिति वही है। फिर चाहे देश में पहला कोरोना केस बना वुहान से लौटा केरल का छात्र हो या लंदन से लौटी कनिका कपूर। सब एक समृद्ध समाज का हिस्सा हैं। जिनके लिए आज यहाँ कल वहाँ एक आम बात है।

तमिलनाडु में सामने आए कोरोना के 50 नए मामले, प्रदेश से निजामुद्दीन मरकज में शामिल हुए 1500, 501 की हुई पहचान

तमिलनाडु से 50 कोरोना के नए मरीज सामने आए हैं। आश्चर्य की बात यह कि इन 50 नए मरीजों में से 45 मरीज वह हैं, जिन्होंने दिल्ली के निजामुद्दीन में हुए मजहबी सम्मेलन में हिस्सा लिया था। सम्मेलन में तमिलनाडु से शामिल होने वाले 501 जमातियों की पहचान हो गई है।

45 किचेन, रोज बाँटे जा रहे 75000 पैकेट: लगे हैं ‘सेवा भारती’ के 5000 कार्यकर्ता, गोमाता का भी रखा जा रहा ध्यान

पूरी दिल्ली में क्राउड मैनेजमेंट के लिए भी काम किया जा रहा है। जैसे, आनंद विहार में जब केजरीवाल सरकार ने हजारों-लाखों मजदूरों को यूपी सीमा पर ढाह दिया, तब वहाँ अफरातफरी मचने पर 250 संघ कार्यकर्ताओं ने जाकर लोगों को सँभालने में पुलिस की मदद की।

मक्का से लौटे, क्वारंटाइन का नियम तोड़ा, मुहर मिटाई: माँ-बेटे पॉजिटिव, पीलीभीत के 35 लोगों पर मुकदमा

अमरिया क्षेत्र के रहने वाले 35 लोग 25 फरवरी को उमरा करने के लिए सऊदी अरब गए थे, जो कि 20 मार्च को सऊदी अरब से मुंबई के एयरपोर्ट पहुँचे थे, जहाँ सभी की स्क्रीनिंग की गई। जाँच में संदिग्ध पाए जाने पर सभी लोगों को कोरोना वायरस संदिग्ध की मुहर लगाई गई थी।

जम्मू कश्मीर पर भारत को बदनाम करने में लगा है ध्रुव राठी, बलूचिस्तान पर साध लेता है चुप्पी

इसी बीच उसका एक और प्रोपेगंडा सामने आया है। वो कई देशों के स्वतंत्रता संग्राम पर भी वीडियो बनाता रहा है। इस दौरान वो जम्मू कश्मीर का नाम तो लेता है लेकिन कभी भी बलूचिस्तान के बारे में कुछ नहीं कहता।

प्रचलित ख़बरें

रवीश है खोदी पत्रकार, BHU प्रोफेसर ने भोजपुरी में विडियो बनाके रगड़ दी मिर्ची (लाल वाली)

प्रोफेसर कौशल किशोर ने रवीश कुमार को सलाह देते हुए कहा कि वो थोड़ी सकारात्मक बातें भी करें। जब प्रधानमंत्री देश की जनता की परेशानी के लिए क्षमा माँग रहे हैं, ऐसे में रवीश क्या कहते हैं कि देश की सारी जनता मर जाए?

केजरीवाल की खुली पोल: बिजली-पानी काट बॉर्डर पर छोड़ा, UP सरकार की बसें बनी सहारा

लॉकडाउन के बाद दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर गॉंव लौटने के लिए लोगों की भारी भीड़ दिख रही है। अब पता चला है कि इन्हें किस तरह गुमराह किया गया। दिल्ली सरकार के अधिकारी बक़ायदा एनाउंसममेंट कर अफ़वाह फैलाते रहे कि यूपी बॉर्डर पर बसें खड़ी हैं, जो उन्हें घर ले जाएँगी।

800 विदेशी इस्लामिक प्रचारक होंगे ब्लैकलिस्ट: गृह मंत्रालय का फैसला, नियम के खिलाफ घूम-घूम कर रहे थे प्रचार

“वे पर्यटक वीजा पर यहाँ आए थे लेकिन मजहबी सम्मेलनों में भाग ले रहे थे, यह वीजा नियमों के शर्तों का उल्लंघन है। हम लगभग 800 इंडोनेशियाई प्रचारकों को ब्लैकलिस्ट करने जा रहे हैं ताकि भविष्य में वे देश में प्रवेश न कर सकें।”

मेरठ लॉकडाउन: मवाना और सरधना के मस्जिदों में छिपे थे 19 विदेशी मौलवी, प्रशासन को धोखा देने के लिए बाहर से बंद था ताला

मवाना में दारोगा नरेंद्र सिंह ने शहर काजी मौलाना नफीस, एडवोकेट असलम, नईम सौफी समेत अन्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है। पुलिस ने आईपीसी की धारा 188, 269, 270 व 14 विदेशी अधिनियम, महामारी एक्ट के तहत केस दर्ज किया है।

लाल सलाम की फट गई डफली, जिस अंबानी-अडानी को देते थे गाली… वही उद्योगपति आज कर रहे देश की मदद

डफली बजाने से अगर कोरोना से लड़ाई लड़ ली जाती तो शायद आज JNU के वामपंथी ब्रिगेड से ही सबसे ज्यादा डॉक्टर और वैज्ञानिक निकलते। अगर प्रोपेगेंडा पोर्टलों में लेख लिखने से कोरोना भाग जाता तो राणा अयूब, सदानंद धुमे और बरखा दत्त जैसे लोगों ने अब तक वैक्सीन का अविष्कार कर लिया होता।

ऑपइंडिया के सारे लेख, आपके ई-मेल पे पाएं

दिन भर के सारे आर्टिकल्स की लिस्ट अब ई-मेल पे! सब्सक्राइब करने के बाद रोज़ सुबह आपको एक ई-मेल भेजा जाएगा

हमसे जुड़ें

169,325FansLike
52,714FollowersFollow
209,000SubscribersSubscribe
Advertisements