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द टिमोथी इनिशिएटिव: ‘बुरी आत्माओं और हिंदू देवी-देवताओं से सुरक्षा की प्रार्थना’, जानें- हिंदू गाँवों में प्रवेश और विरोध से बचने की TTI की रणनीति

TTI ने बाकायदा एक ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार किया है जिसमें हिंदू समुदायों को धर्मांतरण के 'मैदान' की तरह देखा जाता है। वे हिंदुओं के पवित्र स्थानों और आस्थाओं को आध्यात्मिक रूप से 'अशुद्ध' बताते हैं।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 18 और 19 अप्रैल को ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (TTI) नाम के एक संगठन से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। जाँच एजेंसी के अनुसार, सिर्फ 6 महीनों में TTI ने विदेशी बैंक डेबिट कार्ड के जरिए अलग-अलग राज्यों से करीब 95 करोड़ रुपए निकाले। इसमें से 6.5 करोड़ रुपए नक्सल प्रभावित रहे झारखंड से निकाले गए। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान TTI ने FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के नियमों को दरकिनार किया। खास बात यह है कि यह संगठन FCRA के तहत रजिस्टर्ड भी नहीं है।

ऑपइंडिया खबरों की एक सीरीज कर रहा है कि TTI कैसे काम करता है। अपनी रिसर्च के दौरान ऑपइंडिया को पता चला कि TTI ने 10 किताबें प्रकाशित की हैं जिन्हें उसके सदस्य हिंदुओं और अन्य समुदायों के लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इनमें से 9 किताबों में किसी धर्म का सीधा जिक्र नहीं है लेकिन 10वीं किताब में ‘चर्च प्लांटिंग लीडर्स’ (यानी नए चर्च स्थापित करने वाले नेताओं) के लिए एक ट्रेनिंग गाइड दी गई है। इसमें बताया गया है कि हिंदुओं के पास कैसे पहुँचना है, हिंदू बहुल गाँवों में कैसे प्रवेश करना है और लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए कैसे तैयार करना है।

इस किताब के तीसरे अध्याय का शीर्षक ‘वर्ल्ड रिलिजन्स एंड कल्ट्स’ है। इसमें चर्च से जुड़े लोगों को कहा गया है कि वे अलग-अलग धर्मों को ‘स्क्रिप्चर्स’ (धार्मिक ग्रंथों) के आधार पर परखें। किताब में ऐसे सुझाव भी दिए गए हैं कि कैसे बातचीत के जरिए हिंदुओं को ईसाई धर्म की ओर लाया जाए। यह समझना जरूरी है कि इस किताब में हिंदू धर्म को खास तौर पर मुख्य लक्ष्य के रूप में पेश किया गया है। इसमें हिंदू धर्म के बारे में जानकारी किसी अकादमिक या निष्पक्ष तुलना के रूप में नहीं दी गई है बल्कि इसे एक व्यावहारिक गाइड की तरह लिखा गया है। इसका मकसद हिंदुओं के बीच जाकर मिशनरी काम को आगे बढ़ाना है।

हिंदू गाँवों को धर्मांतरण के लिए कैसे टारगेट करता है TTI

यह किताब हिंदुओं की मूल आस्थाओं को निशाना बनाने की योजना बताती है जिसमें अनेक देवी-देवताओं के अस्तित्व पर भी निशाना साधा गया है। यह किताब यह विचार फैलाती है कि हिंदुओं के सामने ईसा मसीह को एक अवतार के रूप में पेश किया जाए क्योंकि इससे हिंदुओं को धर्म परिवर्तन के लिए राजी करना आसान हो जाता है। इसके अलावा, किताब में यह भी कहा गया है कि पाप को नैतिक विद्रोह नहीं बल्कि अज्ञान बताया जाए और कर्म व पुनर्जन्म के सिद्धांतों को इस तरह से समझाया जाए कि हिंदू धीरे-धीरे अपनी खुद की मान्यताओं से दूर होने लगें।

किताब यह भी स्पष्ट रूप से बताती है कि ‘एक हिंदू का अंतिम लक्ष्य’ कर्म और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति पाना है। साथ ही यह हिंदू धर्मग्रंथों को एक लंबी परंपरा के रूप में प्रस्तुत करती है जिसका केंद्र वेद, उपनिषद और भगवद्गीता हैं। लेकिन यह विवरण केवल शुरुआती हिस्सा है। इसके तुरंत बाद किताब में एक अलग भाग शुरू होता है जिसका शीर्षक है- ‘माफी संबंधी जवाब और धर्म प्रचार के सुझाव’ (Apologetic Responses and Witnessing Suggestions)। इससे यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि किताब का मकसद केवल हिंदू धर्म को समझाना नहीं बल्कि उसमें दखल देना है।

फोटो साभार: TTI

इस किताब की बनावट भी बहुत अहम है यह सिर्फ यह नहीं बताती कि हिंदू क्या मानते हैं, बल्कि यह भी बताती है कि मिशनरियों को उनके विश्वासों का जवाब कैसे देना चाहिए। सीधे शब्दों में कहें तो हिंदू समुदायों को मिशन की जमीन माना गया है और हिंदू आस्था को एक ऐसा क्षेत्र, जिस पर तर्क, समझाने-बुझाने और सोची-समझी रणनीति से काम किया जाए। यह केवल धर्मशास्त्र नहीं बल्कि धर्म परिवर्तन कराने की एक रणनीतिक गाइड है।

‘प्रवेश से पहले प्रार्थना करो’- हिंदू देवी-देवताओं और स्थानीय मान्यताओं को राक्षसी रूप देना

इस किताब का सबसे आपत्तिजनक हिस्सा वह है जहाँ यह हिंदू आस्थाओं और देवी-देवताओं को दानवी या शैतानी बताती है। किताब में लिखा है, “यह समझो कि अधिकतर हिंदू गाँव बुरी आत्माओं के कब्जे में हैं या किसी हिंदू भगवान की निगरानी में हैं।” इसके बाद किताब यह भी जोड़ती है, “मिशन से जुड़े लोग इसे ‘टेरिटोरियल स्पिरिट’ यानी क्षेत्रीय आत्मा कहते हैं, एक ऐसी शक्ति जिसका असर केवल उसी खास गाँव तक सीमित होता है।” इसके बाद किताब में सीधा निर्देश दिया गया है, “जब भी गाँव में जाओ तो प्रार्थना करो कि पवित्र आत्मा (Holy Spirit) तुम्हें सुरक्षा और शक्ति दे ताकि बुरी आत्माएँ जो भी बाधा डालने की कोशिश करें, उन्हें दूर किया जा सके।”

यह सिर्फ शब्दों का सामान्य इस्तेमाल नहीं है। इस तरह की भाषा से हिंदू गांवों को सिर्फ अलग सोच वाले लोगों की जगह नहीं बल्कि एक ऐसे स्थान के रूप में दिखाया गया है, जहाँ नकारात्मक या अँधेरी शक्तियों का प्रभाव है। खास बात यह है कि ‘बुरी आत्माओं’ और ‘हिंदू भगवानओं’ को एक ही तरह से दिखाया गया है जिसका साफ मतलब है कि उनके लिए हिंदू देवी-देवता ‘राक्षसी शक्तियाँ’ हैं। गाँव को ऐसे स्थान के रूप में दिखाया गया है, जहाँ किसी अलौकिक ताकत का नियंत्रण है और मिशनरी को वहाँ काम शुरू करने से पहले उससे निपटना होगा।

यह सिर्फ इस किताब या TTI तक सीमित नहीं है। कई कट्टर ईसाई और धर्म प्रचारक भी हिंदू देवी-देवताओं को ‘दानव’ बताते हैं। खासकर माँ काली और भगवान शिव के मामले में। यही रवैया कुछ तथाकथित नास्तिकों, पूर्व मुसलमानों और इस्लामवादियों में भी देखने को मिलता है। सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्टें आम हैं जिनमें ईसाई माँ काली को ‘डेमन’ बताते हैं। ये पोस्ट अक्सर प्लेटफॉर्म से हटाए भी नहीं जाते जबकि इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं।

माँ काली को निशाना बनाने वाली अक्टूबर 2025 की एक सोशल मीडिया पोस्ट (साभार: X)

गाँवों में बिना शक पैदा किए घुसने की स्टेप-बाय-स्टेप रणनीति

किताब में साफ लिखा है कि हिंदू बहुल गाँवों में मिशनरियों को अक्सर विरोध का सामना करना पड़ता है और उन पर जबरन धर्मांतरण के आरोप लगते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि ‘कई बार जिन लोगों तक आप पहुँचते हैं, वे पढ़-लिख नहीं पाते’। इसके बाद किताब चेतावनी देती है, “कई जगहों पर बाइबिल साथ रखना या ‘जीसस फिल्म’ दिखाना शक पैदा कर सकता है या परेशानी खड़ी कर सकता है’।”

इससे साफ होता है कि TTI से जुड़े लोग यह समझते हैं कि खुले तौर पर ईसाई प्रचार (proselytisation) हर जगह स्वीकार नहीं किया जाता और अगर वे अपने मिशन से जुड़े साधनों को खुले में इस्तेमाल करेंगे तो लोगों में शक या विरोध पैदा हो सकता है।

इस शक को देखते हुए अपने तरीके पर पुनर्विचार करने के बजाय किताब एक दूसरी रणनीति बताती है। इसमें मिशनरियों से कहा गया है कि वे ‘धार्मिक शास्त्रों को याद करें ताकि वे ईश्वर के वचन में मजबूत हो सकें’ और सीधे किताब या फिल्म दिखाने के बजाय बातों के जरिए आगे बढ़ें। सीधे शब्दों में कहें तो, यहाँ सवाल यह नहीं है कि विरोध वाले माहौल में जाना सही है या नहीं बल्कि यह है कि वहाँ कैसे इस तरह काम किया जाए कि कम से कम शक पैदा हो और कम सवाल उठें।

सीधे प्रचार की बजाय सुविधाजनक तरीके: गीत, संबंध बनाना और धीरे-धीरे संदेश देना

किताब में मिशनरियों को यह सलाह दी गई है कि वे ‘अपने दिल और दिमाग में ईश्वर के वचन के साथ प्रचार करें, बाइबल की कहानियाँ सुनाएँ, धर्मग्रंथ के वाक्य बोलें, गाने गाएँ और उनके साथ प्रार्थना करें’। यह साफ तौर पर एक ऐसे तरीके की ओर इशारा करता है जिसमें धार्मिक संदेश को सीधे और खुलकर न रखकर नरम और अप्रत्यक्ष तरीकों से पहुँचाया जाता है। यानी बाइबिल हाथ में लेकर प्रचार करने या फिल्म दिखाने के बजाय कहानियों, गीतों, प्रार्थना और याद किए गए धार्मिक अंशों के जरिए लोगों से जुड़ने की बात कही गई है।

किताब में दिए गए निर्देश दिखाते हैं कि यह रणनीति बहुत सोच-समझकर बनाई गई है। गीत और कहानियाँ सिर्फ इसलिए नहीं सुझाई गई हैं कि वे सांस्कृतिक रूप से सहज या भावनात्मक रूप से जुड़ाव बनाने वाली होती हैं बल्कि इसलिए भी कि सीधे ईसाई सामग्री ले जाना शक पैदा कर सकता है। इस वजह से यह तरीका एक रणनीतिक बदलाव बन जाता है। असल में यह किताब मिशनरियों को यह सिखा रही है कि जब सीधा प्रचार विरोध का सामना करे, तो धीरे-धीरे संदेश देने और लोगों के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाने का रास्ता अपनाओ।

हिंदू मान्यताओं का खंडन: कर्म, पुनर्जन्म और मूल दर्शन पर निशाना

यह मैनुअल इस मामले में भी बिल्कुल स्पष्ट है कि मिशनरियों को हिंदुओं की आस्था को किस तरह चुनौती देनी है। इसमें कर्म (karma) को एक ऐसे सिस्टम के रूप में समझाया गया है जिसमें कर्म का फल कई जन्मों तक मिलता हैं। इसके बाद इसमें यह तीखी टिप्पणी जोड़ी गई है कि ‘कर्म में माफी की कोई गुंजाइश नहीं है’। कर्म की यही व्याख्या मिशनरियों के लिए संदेश बन जाती है। पुस्तक में कहा गया है कि ईसाई धर्म के अनुसार ईसा मसीह लोगों को ‘शर्म, अपराधबोध और कर्म के कर्ज’ से मुक्त करते हैं।

साभार: TTI

इसके बाद मिशनरियों को निर्देश दिया गया है कि वे इसके विपरीत तर्क दें यानी यह समझाएँ कि पाप ‘निजी’ होता है और यह सिर्फ अज्ञानता नहीं बल्कि ‘आज्ञा का उल्लंघन’ है। इंसान की असली समस्या ‘ईश्वर के साथ टूटा हुआ रिश्ता’ है। इसके बाद अगला कदम बताया गया है कि ईसा मसीह के माध्यम से स्वीकारोक्ति और क्षमा को ही एकमात्र समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाए। यह केवल धर्मों की सामान्य तुलना नहीं है। बल्कि इसमें साफ तौर पर यह दिखता है कि उद्देश्य हिंदू दर्शन की मूल अवधारणाओं को चुनौती देकर उन्हें बदलना है और उनकी जगह ईसाई विचारधारा को स्थापित करना है।

धार्मिक शिक्षा से लेकर धर्मांतरण के संगठित खेल तक

सीधे शब्दों में कहें तो यह किताब और इसमें भी खास तौर पर हिंदू धर्म से जुड़े इसके हिस्से एक ऐसी सोची-समझी योजना की ओर इशारा करते हैं जिसे केवल ईसाई धर्म का प्रचार भर नहीं कहा जा सकता। जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया को तैयार किया गया है, उससे साफ पता चलता है कि ‘TTI’ का मकसद अपना काम इस तरह करना है कि वे कानून की नजर में न आएँ और न ही पुलिस के हत्थे चढ़ें।

इन बातों के नतीजे काफी गंभीर हो सकते हैं। यह सिर्फ निजी आस्था का मामला नहीं है बल्कि TTI ने बाकायदा एक ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार किया है जिसमें हिंदू समुदायों को धर्मांतरण के ‘मैदान’ की तरह देखा जाता है। वे हिंदुओं के पवित्र स्थानों और आस्थाओं को आध्यात्मिक रूप से ‘अशुद्ध’ बताते हैं। यह किताब मिशनरियों को सिखाती है कि कैसे लोगों के बीच घुलना-मिलना है, उन्हें अपनी बातों में फँसाना है और किसी को शक न होने पाए, इसका ध्यान कैसे रखना है।

TTI की शुरुआत साल 2007 में हुई थी। इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स पहली बार 1992 के आसपास भारत आए थे और तब से वे कई बार यहाँ आ चुके हैं। अब उनका बेटा जैरेड नेल्म्स इस संस्था का अध्यक्ष है और अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए भारत में चर्च बनाने और ज्यादा से ज्यादा हिंदुओं का ईसाई धर्म में धर्मांतरण कराने के मिशन में जुटा है।

इस सीरीज के आने वाले हिस्सों में हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि यह संस्था कैसे काम करती है और हिंदुओं का धर्मांतरण कराने के लिए यह अलग-अलग राज्यों में दूसरे मिशनरी कार्यक्रमों के साथ कैसे जुड़ती है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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