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जिस जगह श्रीकृष्ण ने पढ़ाया सद्भाव का पाठ, उस मथुरा में क्यों फैलाया जा रहा जातीय भेदभाव: कौन हैं नरहौली में समाज को बाँटने वाले ‘कंस’, फैला रहे प्रोपेगेंडा

मथुरा में भी हाल की घटनाओं में भीम आर्मी नेता पहुँचे, मुआवजे की माँग की, लेकिन स्थानीय संवाद की बजाय उग्रता फैलाई गई। नरहौली जैसी घटना में अगर वे तुरंत हस्तक्षेप करते हैं तो स्थिति और बिगड़ जाएगी।

मथुरा जिले के नरहौली गाँव में 21 मई 2026 की रात एक शादी होनी थी। लेकिन शादी के बजाय माहौल को इस कदर अराजक बना दिया गया कि समाज दो फाड़ हो गया। ये घटना गुस्से में नहीं बल्कि जानबूझकर और सुनियोजित तरीके से अंजाम दी गई। उद्देश्य था- क्षेत्र के दो समुदायों को आपस में भिड़ाकर हिंदुओं में मनमुटाव पैदा करना।

बरसाना के भरना कलां गाँव के रहने वाले नेमचंद के दो बेटे अशोक और कुलदीप अपनी बारात लेकर नरहौली पहुँचे थे। यहाँ भगवान दास उर्फ बुल्ला की दो बेटियाँ लक्ष्मी और पूनम उनसे विवाह करने वाली थीं। दोनों दलित (जाटव) परिवार थे। लेकिन जैसे ही बारात ठाकुर बाहुल्य इलाके से गुजरी, कुछ अराजक तत्वों ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

मामला यहाँ रुका नहीं बल्कि पत्थरबाजी शुरू हो गई, मारपीट हुई, महिलाओं और बच्चों पर हमला हुआ। आरोप है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर तक तोड़ दी गई। 70 वर्षीय एक महिला घायल हुई।

पुलिस पहुँची तो दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। एसडीएम, इंस्पेक्टर और चौकी इंचार्ज तक चोटिल हुए। महिलाओं ने लाठियाँ लेकर पुलिस पर धावा बोल दिया। शादी की जगह पूरा गाँव रणभूमि में बदल गया।

19 घंटे तक शादी रुकी रही। भारी पुलिस बल, सीआरपीएफ और पीएसी की तैनाती के बाद 22 मई शाम को सात फेरे पूरे कराए गए। बाराती भूखे-प्यासे लौटे, खाना बर्बाद हो गया। पूरा गाँव दहशत और तनाव में डूबा रहा।

एसएसपी श्लोक कुमार ने क्राइम ब्रांच ने जाँच के आदेश दिए। दोनों पक्षों से सैकड़ों लोगों पर एफआईआर दर्ज हुईं। यह घटना मथुरा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जातीय सद्भाव को चोट पहुँचाने के लिए काफी थी।

हालाँकि इससे ज्यादा यह बताती है कि कुछ बाहरी ताकतें छोटी-छोटी घटनाओं को जातीय रंग देकर समाज को किस कदर बाँटने पर तुले हैं।

हमेशा से ही जातीय संवेदनशीलता का केंद्र रहा मथुरा

मथुरा और ब्रज क्षेत्र केवल भगवान कृष्ण की लीला भूमि नहीं है। यह लंबे समय से जातीय तनावों का गढ़ रहा है। छोटी-छोटी बातें जैसे घोड़े पर चढ़ना, डीजे बजाना, रास्ता या संगीत बड़े संघर्ष में बदल जाती हैं।

2016 में चामुहा गांव में पानी के बँटवारे को लेकर दलित और ठाकुर समुदाय में हिंसक झड़प हुई थी। दो लोग घायल हुए। 2025 में होली के मौके पर जाटव और ठाकुरों के बीच रंग फेंकने को लेकर बवाल हुआ। 74 लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ, पत्थर चले, लाठियाँ चलीं और आगजनी की घटनाएँ हुईं।

फरवरी 2025 में मथुरा के भुरेका गाँव में एक दलित दूल्हे को बग्गी पर चढ़ने पर हमला किया गया। 25-30 ठाकुर/जाट युवकों ने बारात रोकी, दूल्हे को घसीटा, जातिसूचक गालियाँ दीं और डीजे तोड़ दिया।

इसी साल करनावल गाँव में दो दलित बहनों की शादी ट्रैफिक विवाद में फँस गई। यदव समुदाय के लोगों ने बारातियों पर हमला किया, दुल्हनों को घसीटा और शादी रद्द कर दी गई। भीम आर्मी पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद ने इसे ‘दलितों पर योजनाबद्ध आतंक’ बताया।

2017 का सहारनपुर कांड तो पूरे देश में चर्चित रहा। महाराणा प्रताप शोभा यात्रा के दौरान ठाकुरों और दलितों में टकराव हुआ। 25 दलितों के घर जलाए गए। ऐसी घटनाएँ मथुरा, सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़ में बार-बार दोहराई जाती हैं।

2025 में आगरा में एक दलित दूल्हे को घोड़े से उतारकर पीटा गया। अलवर और दमोह में भी इसी तरह की घटनाएं हुईं जहां दूल्हे को घोड़े पर चढ़ने का अधिकार छीना गया।

ये उदाहरण साफ दिखाते हैं कि मथुरा में जातीय संवेदनशीलता नई नहीं। लेकिन हर बार छोटी घटना को बड़ा चेहरा देकर कुछ तत्व राजनीतिक फायदा उठाते हैं।

इतिहास सिखाता है कि ऐसे संघर्ष किसी की जीत नहीं लाते। वे पूरे गांव को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से कमजोर करते हैं। पर्यटन, कृषि और रोजगार पर असर पड़ता है।

नरहौली घटना में साजिश की परतें

नरहौली गाँव की इस घटना में विदाई में दुल्हनें रो पड़ीं। उनका ये कहते हुए वीडियो वायरल हुआ कि ‘किसी की शादी में ऐसा न हो।’ दलित पक्ष ने आरोप लगाया कि ठाकुरों ने पहले पत्थर मारे, महिलाओं पर हमला किया, घरों में घुसकर सामान तोड़ा और बाबा साहेब की तस्वीर ईंटों से कुचल दी।

सोशल मीडिया पर दोनों पक्षों के एक-दूसरे पर आरोप लगाने के वीडियो सामने आए। कुछ संगठनों ने इसे ‘ठाकुर आतंक’ बताया। लेकिन सच्चाई यह है कि यह छोटा विवाद था, जिसे जातीय रंग देकर बड़ा बनाया गया।

पुलिस ने दोनों पक्षों पर सैकड़ों एफआईआर दर्ज कीं। सीसीटीवी फुटेज से दोषी पहचाने जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है-कौन सी ताकतें इस छोटी घटना को पूरे समाज में अविश्वास फैलाने का हथियार बना रही हैं?

समाज में अविश्वास के बीज और विभाजन की साजिश

नरहौली की घटना बताती है कि कुछ अराजक तत्व जानबूझकर छोटी बात को जातीय युद्ध में बदलना चाहते हैं। वीडियो वायरल करना, आरोप-प्रत्यारोप, बाहरी संगठनों का हस्तक्षेप-ये सद्भाव तोड़ते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ लोग रोज खेती-मजदूरी में साथ काम करते हैं, वहाँ ऐसे बवाल से पूरा गाँव प्रभावित होता है। पानी का बँटवारा, रास्ते, स्कूल, अस्पताल-सब साझे मुद्दे हैं। लेकिन अविश्वास बढ़ने से विकास रुक जाता है। इसके अलावा युवा पीढ़ी नफरत सीखती है। मथुरा जैसे पर्यटन और कृषि वाले क्षेत्र में यह घातक है।

गाँव की जिंदगी में दलित, क्षत्रिय, पिछड़े सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। किसान मजदूरों की मदद लेते हैं। मजदूर किसानों के खेतों पर काम करते हैं। शादी-ब्याह में एक-दूसरे की मदद चाहिए। फसल कटाई, त्योहार, आपदा समेत हर सुख-दुःख में सहयोग जरूरी है।

अब बात आती है कि नरहौली जैसे गाँव में अगर बदला बढ़ा तो खेती कैसे चलेगी? मजदूरी कौन करेगा? बच्चे स्कूल कैसे जाएँगे? जिम्मेदार लोग-पंच, सरपंच, बुजुर्ग, दोनों समुदायों के प्रतिनिधि-बैठकर बात करें। प्रशासन से पहले खुद समाधान निकालें। बाहरी हस्तक्षेप समस्या बढ़ाता है, हल नहीं।

भीम आर्मी जैसे संगठनों के उकसावे और बाँटने का खेल

भीम आर्मी जैसी संस्थाएँ दलित अधिकारों की बात तो करती हैं, लेकिन उनके तरीके अक्सर समाज को बाँटने वाले साबित होते हैं। 2017 के सहारनपुर कांड में भीम आर्मी ने महाराणा प्रताप यात्रा के विवाद को बड़ा बनाया। दलित-ठाकुर टकराव हुआ, 25 घर जलाए गए।

भीम आर्मी ने महापंचायत बुलाई, प्रदर्शन किए जो पुलिस-दलित झड़प में बदल गए। आरोप लगा कि वे उकसावा फैलाते हैं, छोटी- छोटी घटनाओं को जातीय युद्ध बना देते हैं। चंद्रशेखर आजाद ने कई बार दलितों को ‘ठाकुरों के खिलाफ एकजुट’ होने का आह्वान किया, जिसकी वजह से नफरत बढ़ी।

मथुरा में भी हाल की घटनाओं (भुरेका, करनावल) में भीम आर्मी नेता पहुँचे, मुआवजे की माँग की, लेकिन स्थानीय संवाद की बजाय उग्रता फैलाई गई। नरहौली जैसी घटना में अगर वे तुरंत हस्तक्षेप करते हैं तो स्थिति और बिगड़ती है।

मथुरा में भी बवाल होते ही भीम आर्मी के नेता घटनास्थल पर पहुँच गए। (साभार- अमर उजाला)

वे दलित युवाओं को बताते हैं कि ऊपरी जातियाँ दुश्मन हैं। लेकिन हकीकत यह है कि वे राजनीतिक फायदा उठाते हैं। वोट बैंक बनाते हैं। छोटे विवाद को ‘दलित उत्पीड़न’ का चेहरा देकर सोशल मीडिया पर वायरल करते हैं।

इसका नतीजा ये निकलता है कि गाँव में स्थायी दुश्मनी पैदा होती है और क्षेत्र के पुलिस-प्रशासन पर दबाव बढ़ता है। इससे कहीं न कहीं विकास भी प्रभावित होता है।

भीम आर्मी जैसे संगठन दलितों की आवाज बनने का दावा करते हैं, लेकिन असल में वे उन्हें ऊपरी जातियों के खिलाफ खड़ा करके अपना राजनीतिक साम्राज्य बनाते हैं। यह समाज को बांटने का खेल है।

एकता ही प्रगति, बँटवारा नहीं

नरहौली की घटना ने दिखाया कि कुछ तत्व समाज को बाँटने के लिए बीज बो रहे हैं। लेकिन मथुरा का इतिहास सिखाता है कि सद्भाव से ही प्रगति होती है। दलित और क्षत्रिय-दोनों भाई हैं। ग्रामीण जीवन में उनका सहयोग अनिवार्य है।

भीम आर्मी जैसे संगठनों से सतर्क रहें, न कि उनके उकसावे में आएँ। जिम्मेदार लोग आगे आएँ, संवाद करें, समझें और सख्ती बरतें। समाज को बांटने वाले बीजों को उखाड़ फेंकें। नरहौली की दुल्हनों के आंसू हमें याद दिलाते हैं-शांति ही सबसे बड़ी शादी है। एकता से ही मथुरा, उत्तर प्रदेश और पूरा देश आगे बढ़ेगा।

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