Thursday, May 6, 2021
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स्टेशन पर ट्रेन जैसे ही रुकी, जुमे की नमाज़ के बाद 700 लोगों की भीड़ एक मस्जिद से निकली और…

वकील साहब सुबह में कुणाल कमरा के सस्ते चुटकुले शेयर कर रहे थे, जिसमें कहा गया था कि मोदी ने देश में आग लगा दी। शाम होते-होते असली आग लगाने वालों से उनका पाला पड़ा और वे जिंदा लाश बन गए। बाद में फिर उनका सेकुलरिज्म जाग उठा और वो लिबर्टी की बातें करने लगे।

नागरिकता संशोधन कानून (CAB) के विरोध के नाम पर देश के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए हैं। ज्यादातर हिंसा में समुदाय विशेष के लोगों की संलिप्तता देखी जा रही है। हालाँकि, मीडिया का एक बड़ा वर्ग इस हिंसा पर परदा डालने के लिए इसकी भयावहता की चर्चा न कर इसे CAB का विरोध भर बता प्रचारित कर रहा है है। इनमें कुणाल कमरा जैसे कथित हास्य कलाकार भी शामिल हैं। ख़ुद को स्टैंड-अप कॉमेडियन बताने वाले कमरा अक़्सर हिन्दू देवी-देवताओं का मज़ाक बनाने और पीएम मोदी का अपमान करने के लिए चर्चा में रहते हैं।

पश्चिम बंगाल के एक वकील ने कैब के ख़िलाफ़ विरो- प्रदर्शन के नाम पर हो रही हिंसक वारदातों पर कुणाल कमरा का एक फेसबुक पोस्ट शेयर किया। इसमें दिखाया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद माचिस और तेल से देश में आग लगाने के बाद चिंता व्यक्त कर रहे होते हैं कि मेरा देश जल रहा है। कुणाल कमरा के इस पोस्ट को पश्चिम बंगाल के वकील शंखदीप सोम ने शेयर किया। शंखदीप को शायद पता नहीं था कि जिस आगजनी के लिए वो पीएम मोदी को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं, जल्द ही उसके असली गुनहगारों से उनका पाला पड़ने वाला है।

शुक्रवार (दिसंबर 13, 2019) को सुबह 10 बजे कुणाल कमरा के पोस्ट को शेयर करने के 24 घंटे के भीतर शंखदीप ने अपने-आप को कैब के नाम पर प्रदर्शन लोगों से घिरा पाया। रात साढ़े 9 बजे के क़रीब उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपनी आपबीती शेयर की। उन्होंने लिखा कि ये पहली बार है जब वो किसी बड़े दंगे की चपेट में आ गए हैं और उन्हें बहुत डर लग रहा है। हावड़ा-चेन्नई एक्सप्रेस जब उलूबेरिया स्टेशन पर पहुँची, तब उन्होने मजहबी भीड़ को दंगा जैसे हालात पैदा करते हुए देखा। उस ट्रेन में वो भी सवार थे। उन्हीं की शब्दों में पढ़ें कि कैसे क्या हुआ:

“स्टेशन पर ट्रेन जैसे ही रुकी, जुमे की नमाज़ के बाद 700 लोगों की भीड़ बगल की एक मस्जिद से निकली और उस असामाजिक तत्वों ने रेलवे लाइन को ही पूरी तरह ब्लॉक कर दिया। उनके हाथों में कैब और एनआरसी विरोधी पोस्टर्स थे। उन दंगाइयों में अधिकतर युवा थे, कई तो 7-8 साल के बच्चे भी थे। उन्होंने कुरता-पायजामा और इस्लामी टोपी पहन रखी थी। उनके हाथों में डंडे, पत्थर और रॉड थे। सबसे पहले तो उन्होंने ‘हमसफ़र एक्सप्रेस’ की खिड़कियों को तोड़ डाला। इसके बाद उन्होंने हमारे ट्रेन पर पत्थरबाजी शुरू की। बुजुर्ग यात्री सहमे हुए थे और बच्चे रो रहे थे। ये दृश्य देख कर मेरा दिल दहल उठा। दंगाई भीड़ रॉड से खिड़कियों को तोड़ते हुए यात्रियों को डरा-सहमा देख कर ठहाके लगा रही थी।”

मुस्लिम भीड़ का उपद्रव: शंखदीप की आपबीती

सहमे शंखदीप ने बताया कि यह सब देख उनकी हालत जिन्दा लाश जैसी हो गई। उन्हें डर था कि एक पत्थर या फिर रॉड के एक प्रहार भी उनकी तरफ आया तो उससे कुछ भी हो सकता है। स्थानीय पुलिस कहीं भी नहीं दिख रही थी और न ही उसने दंगाइयों को रोकने की कोशिश की। शंखदीप ने लिखा कि काफ़ी देर के बाद आरपीएफ की एक बटालियन आई, जिसने दंगाइयों पर लाठीचार्ज किया और उन्हें खदेड़ा। भीड़ को खदेड़ने के लिए आँसू गैस के गोले भी छोड़ने पड़े।

लेकिन, तब तक ट्रेन के इंजन को ख़ासा नुकसान पहुँचाया जा चुका था। ड्राइवर घायल हो चुका था। दंगाइयों ने क़रीब 4 घंटे तक सभी यात्रियों को बंधक बना कर रखा। शंखदीप की इस आपबीती को सोशल मीडिया पर ख़ूब शेयर किया गया। ये भी ध्यान देने वाली बात है कि सुबह में यही वकील मीम शेयर कर रहा था कि पीएम मोदी चारों तरफ़ आग लगा रहे हैं, लेकिन शाम तक जब उसे ख़ुद अनुभव हुआ और वो डर के उस माहौल से गुजरा, तब उसे समझ आया कि कुर्ता-पायजामा और इस्लामी स्कल-कैप पहनी भीड़ जुमे के नमाज के बाद मस्जिद से निकल कर आतंक मचा रही है।

ख़ुद से सहानुभूति जताने वाली की तुलना दंगाई भीड़ से!

शंखदीप को लोगों की सहानुभूति भी रास नहीं आई। उसने बाद में लिखा कि भाजपा आईटी सेल उसकी बातों का ग़लत इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने लिखा कि कैब और एनआरसी के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध-प्रदर्शन को बदनाम करने के लिए उनके फेसबुक पोस्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं और प्रवक्ताओं पर आक्रमण करते हुए कहा कि उनलोगों ने अपने फ़ायदे के लिए उन्हें ट्विटर पर ट्रेंड कराया। उन्होंने लिखा कि उनके साथ हुई घटनाओं को एक ‘सिकुलर व्यक्ति की घर-वापसी’ के तर्ज पर पेश किया गया। इसके बाद उन्होंने भाजपा को भी मजहबी दंगाइयों की तरह ही विभाजनकारी और दुष्ट ताक़त करार दिया।

कुणाल कमरा के फैन शंखदीप ने अजीबोगरीब तर्क देते हुए 4 घंटे तक रेलवे स्टेशन को बंधक बना कर रखने वाली दंगाई भीड़ की तुलना ट्वीट करने वाले लोगों से कर दी। उन्होंने लिखा कि फेक न्यूज़ फैलाने वाली उन्हीं दंगाइयों की तरह हैं। जहाँ एक तरफ़ उलूबेरिया स्टेशन पर पत्थर और रॉड के डर से उन्हें अपनी जान की चिंता सता रही थी, वहाँ से निकलते ही उन्होंने सोशल मीडिया पर उनसे सहानुभूति जताने वाले लोगों से उसी भीड़ की तुलना करनी शुरू कर दी, जिसने रेलवे स्टेशन पर डर का माहौल बनाया और सार्वजनिक संपत्ति को जम कर नुक़सान पहुँचाया।

शंखदीप ने फिर बराबरी और सेकुलरिज्म की बातें शुरू कर दी। हो सकता है कि तब तक उनके मन से वो डर निकल गया हो, जो उन्हें तब लग रहा था जब वो उलूबेरिया स्टेशन पर खड़ी ट्रेन के किसी कोने में जान बचाने के लिए दुबके हुए थे। सोशल मीडिया पर चंद पोस्ट शेयर करने वाले की तुलना महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को नुकसान पहुँचाने वाले दंगाइयों से करने वाले वकील शंखदीप शायद भूल गए कि जुमे की नमाज़ के बाद हिंसा होना और उस हिंसा का शिकार बने व्यक्ति से सहानुभति जताना, दोनों एक नहीं है। सेकुलरिज्म का नंगा नाच देखने के बाद फिर से सेकुलरिज्म का राग अलापने वाले वकील साहब फिर से कुणाल कमरा मोड में लौट आए ऑपइंडिया तक पर भी निशाना साधा।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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