Saturday, September 19, 2020
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ध्रुव त्यागी हत्याकांड: मीडिया, मज़हब और परिवार में पलती जिहादी सोच

अपराध को अंजाम देने वाले अपने धर्म के तले छिप कर बचना चाहते थे। ये सोच उनके भीतर कहाँ से आई? इस सोच के पीछे कौन सी मानसिकता थी? अगर 11 आरोपितों का कोई धर्म नहीं है, तो फिर बीच-बचाव करने वाले का धर्म हाइलाइट करना कैसी पत्रकारिता है?

दिल्ली के मोती नगर में जो हुआ, आपके साथ भी हो सकता है, किसी के साथ भी हो सकता है। अनमोल, जिसने आतताइयों को अपने पिता पर ताबड़तोड़ चाकू चलाते देखा और उनकी जान बचाने के लिए अपने पिता के ऊपर लेट गया, उसकी जगह हम या आप में से भी कोई हो सकता था। आरोपितों ने बाप के ऊपर लेटे बेटे को भी नहीं बख़्शा और चाकू चलाते रहे। परिणाम यह कि अनमोल आज आईसीयू में भर्ती है, अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है। कारोबारी ध्रुव त्यागी, जो अब इस दुनिया में नहीं रहें, जिन्हें मार दिया गया, उनकी जगह कोई भी बेटी का बाप हो सकता था, आगे भी अगर ऐसे वारदात नहीं रुके तो उनकी जगह कोई और हो सकता है। वो लड़की, जो ये सोच कर रोए जा रही होगी कि सबकुछ उसके कारण हुआ, उसकी जगह कोई भी युवती हो सकती है। लेकिन नहीं, कारण वह नहीं थी, इस घटना का कारण थी वो गन्दी सोच, जो हिन्दू-मुसलमान किसी के भीतर भी हो सकती है।

मोती नगर हत्याकांड और तीन अन्य घटनाएँ

ये ऐसी सोच है, जो धर्म नहीं देखती, जाति नहीं देखती। लेकिन, साथ ही इस ख़ास मामले में एक ऐसी जिहादी मानसिकता समाहित है, जिसका एक ख़ास समूह से लेना-देना है। ये समूह एक ख़ास मानसिकता से प्रेरित है। इसके लिए तीन घटनाओं को समझना पड़ेगा। यहाँ हम ये दावा नहीं कर रहे कि ध्रुव त्यागी की हत्या करने वाले जिहादी थे। मीडिया ज़ोर-ज़ोर से इसमें धार्मिक एंगल न ढूँढने की अपील कर रहा है। मीडिया की पोल तो नीचे खोलेंगे ही लेकिन इस घटना से मिलती-जुलती अन्य घटनाओं के पीछे भी रही कुछ इसी तरह की सोच की पड़ताल कर हम देखेंगे कि ऐसा क्या था, जो नीचे वर्णित तीन घटनाओं में समान है। मोती नगर की घटना, श्री लंका में हुए ईस्टर ब्लास्ट्स और कश्मीर में चल रहे आतंकवाद में कुछ समानता है। इसके बाद हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाते हुए एक इजराइल की एक घटना का भी जिक्र करेंगे।

ये तीनों ही अलग-अलग प्रकृति की घटनाएँ हैं। जहाँ मोती नगर में जो हुआ, वह एक निर्मम आपराधिक वारदात है, श्री लंका में हुआ हमला भीषण आतंकी नरसंहार है और कश्मीर में जो चल रहा है वह लोकतंत्र के ख़िलाफ़ आतंक को स्थापित करने की एक जिहादी प्रक्रिया है। सबसे पहले बात श्री लंका की। श्री लंका में ईस्टर पर चर्चों को निशाना बनाया गया, 250 से भी ज्यादा लोग मारे गए और द्वीपीय देश ने कड़ी कार्रवाई करते हुए इसमें सम्मिलित आतंकियों को या तो मार गिराया या उन्हें पुलिस शिकंजे में ले लिया। यहाँ कुछ गिरफ्तारियाँ ऐसी हुईं, जिससे पता चलता है कि एक समाज विशेष के भीतर यह आम है कि अगर परिवार का कोई सदस्य आतंकी बन जाए तो बाकी लोग उसे वापस मुख्यधारा में लौटाने का प्रयास नहीं करते।

श्री लंका में इल्हाम और इंसाथ ने आतंकी ब्लास्ट्स को अंजाम दिया। ये दोनों ही भाई हैं। इस सम्बन्ध में दोनों ही आतंकियों के पिता को गिरफ़्तार किया गया। ये लोग श्री लंका के एक धनाढ्य परिवार से आते हैं। जब पुलिस इनके घरों पर पहुँची तो एक भाई की पत्नी ने ख़ुद को बच्चों सहित मार डाला और तीन सुरक्षाकर्मियों की भी जान ले ली। दोनों भाइयों के पिता को इस सम्बन्ध में गिरफ़्तार कर लिया गया है। अगर आपको लगता है कि आतंकियों द्वारा की गई घटनाओं के लिए उनके पिता को सज़ा दी जा रही है तो आप ग़लत हैं। असल में उन दोनों के पिता ने ही अपने बेटों को आतंकी घटना अंजाम देने के लिए उकसाया था और उनके कुकृत्यों को बढ़ावा दिया था। अर्थात, पूरा परिवार जिहादियों के संरक्षण और मदद देने में लगा हुआ था।

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अब आते हैं कश्मीर पर। जम्मू कश्मीर में पुलवामा हमले के बाद सेना ने एक सलाह जारी की। यह सलाह आतंकियों के लिए नहीं थी, उनके परिवारों के लिए थी, ख़ासकर उनकी माँओं के लिए। लेफ्टिनेंट जनरल कँवलजीत सिंह ढिल्लों ने आतंकियों की माँओं से निवेदन किया कि या तो वे अपने बेटों को मुख्यधारा की तरफ़ लाने में भूमिका निभाएँ, प्रयास करें, या फिर बाद में सेना ऐसे आतंकी तत्वों को साफ़ करेगी। सेना ने साफ़-साफ़ कहा कि माँएँ अपने बेटों को सरेंडर कराए नहीं तो सेना अब उन्हें बख़्शने नहीं जा रही है। आख़िर सेना को ऐसी सलाह देने की नौबत क्यों आन पड़ी? कहीं न कहीं कश्मीर में आतंकी बने युवकों के परिवारों के मन में उनके प्रति सहानुभूति रहती है और वे कहीं न कहीं ऐसे ‘भटके हुए नौजवानों (जैसा कि कई मेन स्ट्रीम मीडिया वाले कहते हैं)’ का समर्थन करते हैं, उन्हें बचाते हैं।

एक बाप का फ़र्ज़ निभाया, मिली मौत

अब आते हैं इजराइल की एक ख़बर पर। बरकन इंडस्ट्रियल जोन आतंकी हमले में नामजद 2 आतंकियों की माँ को अपने बेटों की योजनाओं और इरादों की भनक थी, उन्हें सबकुछ पता था। अदालत में आतंकी बेटों की इस हरकत के लिए उसकी माँ को भी जिम्मेदार ठहराने के लिए याचिका दाख़िल की गई। अब वापस लौटते हैं, मोती नगर की घटना पर। आलम शमशेर नशे में था। जब इस तरह का कोई “भटका हुआ मनचला” नशे में हो तो उसके परिवार की ज़िम्मेदारी बनती है कि समाज को विषाक्त करने वाले ऐसे कोढ़ को घर में रखें, उन पर नियंत्रण रखें। उसने जहाँगीर व अन्य मनचलों के साथ मिल कर ध्रुव त्यागी की 26 वर्षीय बेटी के साथ छेड़खानी की। नाराज़ त्यागी ने उससे झगड़ा नहीं किया बल्कि उसे समझाया।

त्यागी ने उससे बस इतना पूछा कि क्या इस तरह से लड़कियों को छेड़ने में उसे शर्म नहीं आती? इतना सुनते ही शमशेर और जहाँगीर ख़ान सहित सभी मनचले भड़क गए और उन्होंने अपने परिवार वालों को बुलाकर उनसे मारपीट शुरू कर दी। क्या आपको पता है कि आलम ने घर में से चाकू लाने के लिए किसे भेजा? अपनी माँ को। उसकी माँ ने घर से चाकू लेकर अपने बेटे को दिया, बाद में उस चाकू से त्यागी की हत्या की गई। उन्हें पत्थरों से मारा गया, उनका मुँह कुचल दिया गया, उनके नाखून उखड़ गए और तड़पते हुए त्यागी की बाद में मौत हो गई। अगर आलम की माँ चाहती तो इस घटना को रोक सकती थी। अगर वह चाहती तो अपने बेटे को किसी युवती को छेड़ने के लिए फटकार लगा सकती थी। अगर इतना न सही तो कम से कम चाकू अपने बेटे तक पहुँचाने से ख़ुद को रोक सकती थी।

लेकिन, उसने अपने बेटे को न सिर्फ़ हत्या करने के लिए बढ़ावा दिया बल्कि उसकी मदद भी की। हम में से अधिकतर लोग अगर अपना बचपन याद करें तो पता चलता है कि जब किसी बाहरी लड़के या दोस्त से हमारा झगड़ा हुआ करता था तो पेरेंट्स पहले यह नहीं पूछते थे कि ग़लती किसकी है, पहले हमें ही डाँट पड़ती थी। अगर माँ-बाप चाहें तो अपने बेटे-बेटियों को ऐसे अपराध करने से रोक नहीं सकते तो रोकने का प्रयास तो कर ही सकते हैं, जिनमें उन्हें कुछ न कुछ सफलता तो मिलेगी ही, क्योंकि उन्हें अपने बच्चों की भावनाओं व इरादों की सबसे ज्यादा भनक होती है। कश्मीर, श्री लंका, इजराइल और मोती नगर में यही समान है कि इन चारों वारदातों में आतंकियों, आरोपितों या अपराधियों को अपने परिवारों से अपने कुकृत्यों में सहयोग, संरक्षण और बढ़ावा मिला। अब मीडिया पर आते हैं।

मीडिया का मज़हब को लेकर दोहरा रवैया

‘आज तक’ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इस रिपोर्ट का टाइटल है- “मोतीनगर हत्याकांडः मुस्लिमों ने हमलावरों से लड़कर बचाया था पिता-पुत्र को।” जब हमने ‘आज तक’ द्वारा मोती नगर हत्याकांड की कवरेज को खंगाला तो पता चला कि आज तक ने ऐसा कहीं नहीं लिखा था कि “मुस्लिमों ने मिल कर ध्रुव त्यागी की हत्या की।” असल में, मारने वाले न हिन्दू थे और न मुस्लिम बल्कि सोच में कहीं न कहीं महिला विरोधी और जिहादी सोच का मिश्रण था। अगर ऐसा नहीं होता तो आरोपित आलम शमशेर शायद अपराध को अंजाम देकर मस्जिद में नहीं भागता। अपराधी जानबूझ कर मस्जिद में भागा क्योंकि उसे पता था कि यह एक ऐसी जगह है, जहाँ पर बैठ कर किसी भी अपराध को सांप्रदायिक रंग देकर बचने की कोशिश की जा सकती है।

दिवंगत त्यागी की बेटी के बयान मीडिया में चलाए जा रहे हैं। अपने बयान में उन्होंने कहा है कि इस घटना को सांप्रदायिक रंग न दिया जाए और इसे सांप्रदायिक कोण से न देखा जाए। पीड़िता का बयान बिलकुल सही है लेकिन यहाँ सवाल तो उठता है कि इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश किसने की? जब आरोपित इतना बड़ा अपराध कर के मस्जिद भागता है, इसका अर्थ है कि अपराध को अंजाम देने वाले अपने मजहब के तले छिप कर बचना चाहते थे। ये सोच उनके भीतर कहाँ से आई? इस सोच के पीछे कौन सी मानसिकता थी? अगर 11 आरोपितों का कोई धर्म नहीं है, तो फिर बीच-बचाव करने वाले का धर्म हाइलाइट करना कैसी पत्रकारिता है? मारने वाले जहाँगीर और आलम का कोई मज़हब नहीं है, बचाने वाले रियाज अहमद मुर्तजा मुसलमान हैं। यह दोहरा रवैया क्यों?

पहले वाले पैराग्राफ में हमने इसीलिए कहा कि मृत ध्रुव त्यागी, उनकी पीड़िता बेटी और घायल अनमोल, इन सबकी जगह हम-आप में से कोई भी हो सकता है क्योंकि हमें समाज में ऐसे कृमियों को बढ़ावा देने से रोकना होगा जो लड़कियों को बुरी नज़र से देखते हैं और साथ ही, ऐसे आत्मविश्वास से लड़ना होगा जिसमें अपराधी समझता है कि अगर भाग कर वह मस्जिद चला गया तो उसे सजा नहीं मिलेगी। अगली बात, हमें दोहरे रवैये वाले मीडिया रिपोर्ट्स का विरोध करना पड़ेगा, जहाँ मारने वालों का मजहब नहीं होता और बचाने वालों का रिलिजन हाइलाइट करना ज़रूरी होता है। ये वही ट्रेंड है, जिसमें आतंकवादी कश्मीर की मस्जिदों में छिपते रहे हैं और मज़हब की आड़ में बचते रहे हैं।

इस घटना के बाद गाँव में पंचायत बैठी। ऐसी चर्चाएँ चली कि मुस्लिमों को गाँव में कोई किराए पर घर नहीं देगा। इस चर्चा के जन्म लेने के पीछे का कारण क्या है? आम जनता उसी पर विश्वास करती है, जो वह देखती और सुनती है। उन्हें कहीं न कहीं से कुछ ऐसी गड़बड़ी की बू तो आई होगी, जिस कारण ऐसी चर्चा चली। सचमुच में डर का माहौल इसे कहते हैं। ये डर आम जनता के बीच पैदा हुआ, इसके लिए न मोदी ज़िम्मेदार है और न केजरीवाल। जनता के सामने एक ऐसी घटना हुई। बाद में अगर उस क्षेत्र में कोई व्यक्ति किसी मुसलमान को घर किराए पर देने से मना करता है तो उसे घृणा का पात्र बना देने और वायरल कर देने से पहले इन सभी कोणों पर भी विचार होना चाहिए।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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