मनमोहन सिंह की नीति से बढ़ी बीमारी: हर साल मरती हैं 1000 गायें, आज भी सॅंभले तो 1000 साल में खत्म होगा मर्ज

प्लास्टिक की उपयोगिता को किन्हीं भी हालातों में जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। वास्तविकता में अब भारत या दुनिया का कोई भी देश इस स्थिति में है ही नहीं। इसके विकल्प ढूँढना अब हमारे लिए चुनाव की बात नहीं है।

कहते हैं अति सर्वत्र वर्जयेत। यानी कोई भी चीज अत्यधिक हो तो उसके नतीजे बेहद भयंकर होते हैं। अब प्लास्टिक कचरे का ही मसला ले लीजिए। इसका इस्तेमाल बढ़ते-बढ़ते उस स्तर पर पहुॅंच गया है जिससे हमारी पारिस्थितिकी का संतुलन ही चरमरा गया है।

भारत में वैसे प्लास्टिक की आमद 60 के दशक में हुई। पर इसके चलन ने जोर पकड़ा खुली अर्थव्यवस्था के आगमन से। भारत के बाजार को खोलने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जाता है। उनके वित्त मंत्री रहते ही 1990 के दशक में देश में खुली अर्थव्यवस्था का दौर आया। इसके साथ ही प्लास्टिक कचरा पैदा करने की बीमारी भी बढ़ती गई। नतीजतन, खुली अर्थव्यवस्था से पहले देश में जहॉं सालाना 9 लाख टन प्लास्टिक का उत्पादन हो रहा था, वह आज करीब 94.6 लाख टन तक पहुँच चुका है।

एक शोध के मुताबिक भारत में सालाना 94.6 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। इसका 40 प्रतिशत प्लास्टिक इकट्ठा ही नहीं होता, जबकि 43 प्रतिशत प्लास्टिक का उपयोग पैकेजिंग के लिए होता है।

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इसी साल 19 जुलाई को लोकसभा में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री बाबुल सुप्रियो ने सवालों का जवाब देते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्ययन का जिक्र किया था। इसके हवाले से उन्होंने बताया कि इस देश के मुख्य शहरों में रोजाना करीब 4059 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। इस कचरे का भंडार लगाने वाले प्रमुख शहरों में दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और बेंगलुरु शुमार हैं। राज्यमंत्री ने बताया कि देश में हर रोज 25,940 टन प्लास्टिक कूड़ा पैदा करता है। यह अनुमान देश के केवल 60 प्रमुख शहरों से जुटाए गए आँकड़ों पर ही आधारित है।

प्लास्टिक के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात जो जानने वाली है वो ये कि इससे बना एक बैग पूर्ण रूप से नष्ट होने में 1000 वर्षों का समय लेता है। अपने इस लंबे जीवन में न तो वह सड़ता है और न गलता है। अमूमन इसके अधिकतर अंश का इस्तेमाल रिसाइकलिंग के लिए भी नहीं हो पाता है। नतीजा ये होता है कि हानिकारक पदार्थों से निर्मित प्लास्टिक पर्यावरण में मौजूद जीव-जंतुओं के लिए अभिशाप बन जाता है और काल बनकर उनकी जान लेने लगता है।

आँकड़ो की मानें तो भारत में हर साल 1000 गायें प्लास्टिक के सेवन के कारण मरती हैं। समंदर में प्लास्टिक के कचड़े से सालाना 1 मिलियन समुद्री जीव-जंतु मर जाते हैं। 1 मिलियन यानी 10 लाख। ये वैश्विक आँकडा है। जिसकी पुष्टि यूनेस्को ने की है।

प्लास्टिक, बैनिंग
प्लास्टिक से होने वाला नुकसान तस्वीरों में साफ़ है

अब भी भ्रम का चादर न हटा हो तो इस घटना पर गौर करिए। कुछ महीने पहले फिलीपींस में एक शार्क खून की उल्टियाँ करते करते मर गई। जाँच हुई तो पता चला वो भूख से तड़प कर मरी है। अब सवाल उठेगा भूख से तड़पकर? तो हाँ, भूख से तड़पकर उस शार्क की मौत हुई।  जाँच में उसके पेट से लगभग 88 पाउंड यानी 40 किलो प्लास्टिक मिला। इसी प्लास्टिक ने उसकी जान ली।

प्लास्टिक फँसने के कारण ही समुद्र की सबसे विशालकाय जीव के पेट में सूजन आई और वो चाहकर भी कुछ खा पी नहीं पाई। नतीजा सिर्फ़ मौत। उस शार्क जैसे अनेकों समुद्री जीव इससे भी भयानक परिस्थिति में मरते हैं। लेकिन फिर भी मनुष्य अपनी आदतों से बाज नहीं आता। जानकारी के मुताबिक दुनिया भर के समुद्र में इस समय 100 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक मौजूद है। जो न केवल जीव-जंतुओं के लिए घातक साबित हो रहा है, बल्कि बड़े स्तर पर जल, थल और वायु को भी दूषित कर रहा है। लेकिन इसे वहाँ तक पहुँचाने वाले लोग कौन हैं? हम और सिर्फ़ हम।

हम चाहते न चाहते हुए भी प्लास्टिक का इस्तेमाल अपने जीवन में धड़ल्ले से करते हैं, अगर हम अपनी ओर से ऐसा करने से बचते हैं तो बाजार हमसे ऐसा करवाता है। कपड़े के थैले को प्लास्टिक बैग से रिप्लेस कर दिया जाता है, दूध की डोलची प्लास्टिक थैली में तब्दील हो जाती है। हर चीज को मिनिमाइज करके छोटे-छोटे प्लास्टिक रैपर्स में बदल दिया जाता है और दिन पर दिन इसे रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली महत्तवपूर्ण वस्तु बना दिया जाता है। 

हालाँकि, प्लास्टिक का निर्माण सेल्लूलोज, कोल, प्राकृतिक गैस, नमक और कच्चे तेल जैसे  प्राकृतिक उत्पादों से ही होता है, लेकिन भी फिर भी इसकी गैर-जैविक (non biodegradable) प्रकृति के कारण ये किन्ही भी मायनों में पर्यावरण के लिए सुरक्षित नहीं माना जा सकता। एक बार के लिए संभव है इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर या तोड़कर छिन्न-भिन्न कर दिया जाए लेकिन पर्यावरण को नुकसान किए बिना इसको नष्ट करना न मुमकिन है। इससे निकलने वाले जहरीले पदार्थ जैसे डायऑक्सिन, विनाइल क्लोराइड, एथिलीन डाइक्लोराइड, सीसा, कैडमियम आदि उस खाने और बोतल के पानी में भी घुलते हैं, जिसका हम नियमित तौर से उपयोग करते हैं। प्लास्टिक से निकलने वाले रसायन हमारे पीने के पानी और खाने को प्रभावित करते हैं, जिससे  कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। कई रिसर्च भी इस बात का प्रमाण दे चुके हैं।

प्लास्टिक की उपयोगिता को किन्हीं भी हालातों में जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। क्योंकि वास्तविकता में अब भारत या दुनिया का कोई भी देश इस स्थिति में है ही नहीं। इसके विकल्प ढूँढना अब हमारे लिए चुनाव की बात नहीं है, बल्कि खुद के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए बहुत बड़ी जरूरत है। एक शोध के अनुसार अगर समय रहते अभी भी रोकथाम नहीं हुई तो 2050 तक समुद्रों में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होगी।

पानी की बोतलों से लेकर, चिप्स, बिस्कुट के पैकेट तक इस समय समुद्र और पर्यावरण को दूषित करने का काम कर रहे हैं। और ऐसे में हमारे लिए शर्म की बात ये है कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम दावा करता है कि दुनियाभर से समुद्र में फेंके जाने वाले कूड़े का 60 प्रतिशत हम भारतीयों द्वारा डंप किया जाता हैं। सोचिए हमारी स्थिति क्या है? हम इसके कारण, प्रभाव और रोकथाम सबसे वाकिफ़ हैं। लेकिन फिर भी हम खुद में सुधार नहीं कर पा रहे, हम जानते है कि अपनी लापरवाहियों से हम पारिस्थितिकी और अपनी भावी पीढ़ी को अंधकार में झोंक रहे हैं। लेकिन फिर भी हम इस विषय कठोर कदम उठाने से बचते हैं।

इन्हीं परिस्थितियों को सुधारने के लिए स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर में प्लास्टिक के सिंगल यूज़ को बंद करने का आह्वान किया। उन्होंने 25 अगस्त को भी मन की बात के जरिए अपने इस प्रण को दोहराया और सबको साफ इशारा कर दिया कि इस बार वह प्लास्टिक के कारण पर्यावरण की सुरक्षा के लिए उठाए जाने वाले कदमो में कोताही नहीं बरतने वाले। उन्होंने प्लास्टिक के इस्तेमाल के खिलाफ युद्ध छेड़ने का ऐलान किया। जिसके बाद माना जा रहा है कि दिल्ली समेत देश भर में जल्द ही प्लास्टिक के सिंगल इस्तेमाल पर बैन होगा।

प्लास्टिक के बिना जीवन मुश्किल भले लगे, लेकिन असंभव नहीं है। भारत के कई राज्यों ने इस इस दिशा में कदम उठाकर कामयाबी हासिल भी की है। 1998 में सिक्किम पहला राज्य था जिसने डिस्पोसेबल प्लास्टिक बैग और प्लास्टिक बोटल को बैन करने के लिए कदम उठाया और प्लास्टिक बैग फ्री राज्य होने का तमगा हासिल किया।

इसके बाद आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड ने भी प्लास्टिक बैन पर कदम उठाए। दिल्ली में भी साल 2017 में इसे लेकर फैसला आया लेकिन पूर्ण रूप से कार्यान्वित नहीं हो पाया। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा इस विषय पर एक बार दोबारा जिक्र छेड़ने के बाद ये मुद्दा गर्माया हुआ है और पिछले एक हफ्ते से लगातार खबरे आ रही हैं कि बड़ी-बड़ी कंपनियाँ और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य इस विषय पर तत्काल प्रभाव से एक्शन ले रहे हैं। दिल्ली की दुकानों पर भी उनके आह्वान का असर देखने को मिल रहा है। अब देखना है कि 2 अक्टूबर से हम इस रास्ते कितने प्रभावी तरीके से आगे बढ़ पाते हैं।

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