एंटोनी साहब, आपने राष्ट्रहित नहीं, ‘कॉन्ग्रेस-हित’ के कारण राफेल सौदे में देरी की

मामा-फूफा टाइप लोगों के इस करार में शामिल न हो पाने से कॉन्ग्रेस बेचैन है। उसके हाथ से 2जी, कोलगेट, कॉमनवेल्थ की तरह एक और सोने की चिड़िया हाथ लग सकती थी लेकिन सत्ता परिवर्तन ने उन्हें हिला कर रख दिया है।

भारत के पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने राफेल सौदे को लेकर ऐसा बयान दिया है, जो उनके ही 2014 वाले बयान को काटता है। एंटोनी ने आज दो बातें कही। उन्होंने कहा कि राजग सरकार ने राफेल सौदे में देरी की। उन्होंने ख़ुद के बारे में कहा कि उन्होंने भी इस सौदे में देरी की। लेकिन, बड़ी सफाई से उन्होंने ख़ुद के फ़ैसले को ‘राष्ट्रहित’ से जोड़ दिया। बकौल एंटोनी, उन्होंने राष्ट्रहित में राफेल सौदे में देरी की। ये नेशनल इंटरेस्ट से ज्यादा कॉन्ग्रेस इंटरेस्ट प्रतीत होता है। अगर राफेल सौदा उसी समय निपट गया होता तो शायद आज राहुल गाँधी के पास केंद्र सरकार का विरोध करने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं होता। अगर राफेल हमारे पास होता तो आज भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच एक अहम रोल निभाता।

जब सत्ता में थे, तब अलग ही सुर अलापा था

स्वयं तत्कालीन केंद्रीय रक्षा मंत्री एंटोनी ने 2014 में यह स्वीकार किया था कि यूपीए सरकार के पास वित्त की कमी है, जिस कारण वे चालू वित्त वर्ष में राफेल सौदे को आगे नहीं बढ़ा पाएँगे। फरवरी 6, 2014 को ज़ी न्यूज़ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में एंटोनी के बयान का जिक्र था। उस रिपोर्ट में कहा गया था:

“पाँच साल की लंबी प्रक्रिया के बाद भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों के लिए फ्रांसीसी दसौं एवियेशन का चयन किया किया है। भारतीय रक्षा ख़रीद प्रक्रिया के अनुसार जो कम्पनियाँ सेनाओं की विशिष्ट आवश्यकता और निर्धारित मानकों पर खरे साजो-सामान को सबसे सबसे कम क़ीमत पर पेशकश करने को तैयार होती है उन्हें उसकी आपूर्ति का ठेका दिया जाता है।”

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नीचे संलग्न किए गए ट्वीट में एंटोनी का 2014 वाला वीडियो है जिसमे वे राफेल में देरी का कारण वित्तीय कमी को बता रहे हैं।

जिस कम्पनी का चयन यूपीए काल में ही हो चुका था, उसे लेकर अब हो-हंगामा मचाया जा रहा है। एक और ग़ौर करने वाली बात यह है कि आज के हिट-जॉब विशेषज्ञ अख़बारों और मामले को बिना समझे कुछ भी आक्षेप लगाने वाले नेता राजग सरकार द्वारा फाइनल की गई राफेल डील की तुलना उस डील से कर रहे हैं, जो कभी मूर्त रूप ले ही न सकी। यूपीए काल के दौरान ये डील ‘नेगोशिएशन स्टेज’ में थी जिस पर काफ़ी सुस्त काम हो रहा था। मोदी सरकार ने सारी प्रकिया पूर्ण कर इसे मूर्त रूप प्रदान किया। इस तरह एक अपूर्ण डील से एक पूर्ण डील की तुलना की जा रही है।

कर के दिखाना सबसे मुश्किल कार्य होता है

बहुत आसान होता है किसी ऐसी चीज से तुलना करना, जो कभी अस्तित्व में भी न आई हो। ‘तुमने ऐसा किया, लेकिन मैंने तो वैसा कर दिया था’, ”तुमने इत्ते रुपए ख़र्च कर दिए, मैं तो बस इतने ही ख़र्च करने वाला था।’- यह सब बोल कर डींगें हाँकना बड़ा आसान है। मुश्किल है कर के दिखाना, जो राजग सरकार ने किया। उस समय धन की कमी की बात कहने वाले एंटोनी आज देरी पर राष्ट्रहित का बहाना मार रहे हैं। आपने देरी की तो राष्ट्रहित हो गया, किसी ने उसे पूरा कर दिया तो वो राष्ट्रविरोधी हो गया। वाह रे कॉन्ग्रेसी लॉजिक।

कॉन्ग्रेस ने मीडिया के एक वर्ग से लेकर अन्य सत्तालोलुप विपक्षी पार्टियों तक- सबको राफेल के रूप में एक ऐसा हथियार थमा दिया है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामले के साथ खिलवाड़ है। मीडिया लगातार हिटजॉब में संलग्न है और रक्षा मंत्रालय के काग़ज़ात चुराए जा रहे हैं। नेतागण न्यायपालिका को ही बुरा-भला कह रहे हैं। कैग सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं की रिपोर्ट्स की धज्जियाँ उड़ाई जा रही है। यह सबकुछ सिर्फ़ और सिर्फ़ राफेल विमान सौदे के राजनीतिकरण के कारण हो रहा है, जिसकी जिम्मेदार कॉन्ग्रेस है।

सबसे बड़ा विरोधाभास यहीं प्रकट होता है। कॉन्ग्रेस द्वारा राफेल सौदे पर आक्षेप लगाने का आधार है कि नरेंद्र मोदी ने कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा नेगोशिएट की गई डील को बदल दिया। उन्होंने विमानों की संख्या घटा दी और प्रति राफेल विमान ज्यादा दाम दिए। एंटोनी का कहना है कि उन्होंने जान-बूझ कर राष्ट्रहित में डील में देरी की। जब डील में देरी हो रही थी तो कॉन्ग्रेस का ये आरोप कहाँ तक सही है कि उसे बदल दिया गया? उसी यूपीए सरकार ने वित्तीय संकट का बहाना मार कर राफेल सौदे को अगले वित्त वर्ष के लिए टाल दिया था और आज वही कॉन्ग्रेस विपक्ष में बैठ कर डील को बदल देने के आरोप मढ़ रही है।

अब सौदों में कोई मामा-फूफा दलाल शामिल नहीं होता

क्या कॉन्ग्रेस को इस बात की चिंता सता रही है कि राफेल सौदे में पार्टी के प्रथम परिवार से जुड़ा कोई मामा या फूफा नहीं शामिल नहीं है? क्या दलालों के बिना सौदे का सफलतापूर्वक संपन्न हो जाना पार्टी को अखर रहा है? जहाँ दुनिया भर के देश रक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार और सेना के साथ खड़े होते हैं, यहाँ एक महत्वकांक्षी रक्षा सौदे को ही राजनीति में घसीट लाया गया।

ऐसे कई प्रोजेक्ट्स हैं जिसे कॉन्ग्रेस द्वारा शुरू किया गया था लेकिन उसे मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद ही पूरा किया जा सका। इसमें से कुछ प्रोजेक्ट्स तो ऐसे हैं जिन्हे नेहरू के प्रधानमंत्री रहते शिलान्यास किया गया था (जैसे- नर्मदा डैम)। उसे पूरा होने में पाँच दशक से भी अधिक लगे। क्या समय के साथ उनकी बनावट और योजना के स्वरूप में बदलाव नहीं आता? सालों से नेगोशिएट हो रही राफेल डील में अगर कुछ बदलाव कर उसे पूर्ण किया गया है तो इसमें दिक्कत क्या है? सितम्बर 2018 में मिन्हाज मर्चेंट के एक लेख में इस बारे में विस्तृत रूप में बताया गया था।

कौन है संजय भंडारी? कहाँ है वो?

इस लेख में उन्होंने बताया था कि कैसे रॉबर्ट वाड्रा से जुड़ी एक कम्पनी ने 2012 में राफेल ऑफसेट करार के लिए आवेदन दिया था। दसौं ने उसे अयोग्य पाया और रिजेक्ट कर दिया। क्या एंटोनी बताएँगे कि उस कम्पनी का मालिक संजय भंडारी आज कहाँ छिपा हुआ है? दरअसल, वह अब एक भगोड़ा है जिसकी तलाश भारतीय एजेंसियों को है। ऐसे लोगों के इस करार में शामिल न हो पाने से कॉन्ग्रेस बेचैन है। उसके हाथ से 2जी, कोलगेट, कॉमनवेल्थ की तरह एक और सोने की चिड़िया हाथ लग सकती थी लेकिन सत्ता परिवर्तन ने उन्हें हिला कर रख दिया है।

हमारी देरी राष्ट्रहित और आपकी गति भी राष्ट्रविरोधी! केरल के मुख्यमंत्री रहे एके एंटोनी को अक्सर कॉन्ग्रेस के ईमानदार नेताओं में से एक माना जाता है। वैसे ईमानदार, डॉक्टर मनमोहन सिंह भी रहे। अगर किसी मुद्दे को झूठ के आधार पर जबरदस्ती घसते रहने से वह घोटाला बन जाता है तो कॉन्ग्रेस को यह प्रयोग मुबारक। इस चक्कर में सरकार को घेरने के लिए जो असली ज़मीनी मुद्दे हैं, उनसे वो दूर होते जा रहे हैं।

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