Monday, May 25, 2020
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…और ऐसे ख़त्म हो गई ‘मसीहा पत्रकारों’ के गैंग की मौज: मशहूर न्यूज़ एंकर से समझिए पूरी क्रोनोलॉजी

मंत्रालय में घुसकर काम करा लेना, लाईजिनिंग, मंत्री बनवाने का काम, टिकट दिलवाने का काम सरपट दौड़ रहा था। प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति के प्लेन में रिपोर्टिंग के नाम पर घूम आने का मज़ा लूटा जा रहा था। तभी एक 'बाहरी' ने आकर सबकी...

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क्रोनोलॉजी समझाने वालों की क्रोनोलॉजी मैं समझाता हूँ आपको। इनकी लाइफ मजे में चल रही थी। ‘खाओ और खाने दो’ के दिन थे। मसीहा पत्रकारों की मौज थी। मंत्रालय में घुसकर काम करा लेना, लाईजिनिंग, मंत्री बनवाने का काम, टिकट दिलवाने का काम सरपट दौड़ रहा था। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के प्लेन में मुफ्त में रिपोर्टिंग के नाम पर घूम आने का मज़ा लूटा जा रहा था। विदेशी दौरों पर विदेश मंत्रालय के कर्मचारियों के लिए बस या वैन लगती थी, मसीहा पत्रकारों के लिए चमचमाती कारें आती थीं। प्राइवेट चैनल के कार्यक्रम के लिए राष्ट्रपति भवन वेन्यू बन जाता था।

फिर अचानक एक दिन एक ऐसा नेता जो लुटियन्स गैंग का नहीं था, वो पीएम की कुर्सी की तरफ बढ़ने लगा। इनको दिक्कत उस व्यक्ति के पार्टी से नहीं थी, क्योंकि उसमें भी कइयों के साथ शैम्पेन खोलने का सिलसिला चलता था पर ये व्यक्ति तो बिल्कुल बाहरी था, ‘गैंग’ का नहीं था। दिक्कत वहीं शुरू हुई। पहले पीएम की कुर्सी पर पहुँचने से रोकने की कोशिश हुई। वो फेल हो गई। फिर इनको लगा कि भाई भी सेट हो जाएगा। वो कोशिश फेल हो गई। अवार्ड्स जिनकी बपौती थी, वो अवॉर्ड मिलने बंद हो गए। विदेशी दौरों के लाले पड़ गए। विदेशी फंडिंग रुक गई। शेल कम्पनियों पर ताले लग गए। ‘भाई लोग’ तिलमिला गए।

फिर शुरू हुआ कभी अवॉर्ड वापसी, कभी EVM में झोल, कभी लिंचिंग तो कभी हिन्दू आतंकवाद को इस देश की नई तस्वीर बताने का सिलसिला चालू हो गया। फेक न्यूज़ फैलाने का प्रोपगेंडा चल पड़ा। पर उसमें दिक्कत थी मीडिया का एक तबका तार्किक सवाल पूछकर इन कोशिशों की हवा निकाल रहा था। फिर ईजाद किया गया ‘गोदी मीडिया’। आरिफ मुहम्मद खान साहब सही कहते हैं कि जब किसी को तर्क से नहीं हरा सको तो उसकी नीयत पर हमला कर दो। इस गैंग ने वही रास्ता चुना। लोगों के दिमाग में भरना शुरू किया कि ये सब मोदी से मिले हुए हैं। मोदी से खुद की नफरत औरों में वायरस की तरह फैलाने लगे।

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इस काम में वक्त लगा लेकिन आज एक खास तबका जिसे मोदी अथवा भाजपा से हमेशा से नफरत थी, उसे इन लोगों ने आसानी से टारगेट कर लिया। हालात ये हो गए कि कोई इस रोबोटिक भीड़ से ये भी पूछ ले कि CAA के बारे में पता है या नहीं या NRC तो अभी आया नहीं, तो उसे भी गोदी मीडिया बताकर हमले होने लगे। भीड़ तो भीड़ है। उसको इनके गैंग के हर एक सदस्य का थोड़े ही पता है। एक आध इनके लोग भी धो डाले। इनकी आत्मा आहत हुई तो उनकी रिपोर्ट दिखा दी, बाकी जहाँ-जहाँ दूसरे पत्रकारों पर हमले हुए उसके मज़े लेते रहे। चुप्पी साध ली या इफ/बट के साथ निंदा कर दी खानापूर्ति के लिए।

लेकिन याद रखिए कि भीड़ बनाना आसान होता है, उसे नियत्रित और संयमित रखना मुश्किल। ये भीड़ वैसी ही है। अभी और हमले होंगे। पर इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये ना आपके हैं, न किसी और के। ये कभी किसी को गोदी मीडिया बताकर तो कभी किसी के सवालों को उसकी कुंठा या नफरत बताकर बच निकलेंगे। लेकिन धीरे धीरे ही सही, पब्लिक सब देख रही है। इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने उन पुराने मालदार अच्छे दिनों का इंतज़ार है। बाहर से आया वो व्यक्ति पीएम की कुर्सी से हट जाएगा, इनकी दुकान चल पड़ेगी। आप इनका मोहरा हैं। बस मोहरा। जागिए और बचिए।

(ये लेख ‘इंडिया टीवी’ के न्यूज़ एंकर सुशांत सिन्हा के ट्विटर थ्रेड पर आधारित है और उनके विचार हैं।)

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