Wednesday, October 21, 2020
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प्रिय वामपंथियो! अपनी खून की प्यास को सही ठहराने के लिए माँ के गर्भ का ‘इस्तेमाल’ बंद करो

जिस देश में सफूरा के कारण पूरे भारत की मंशा पर सवाल उठ गए, उसी देश के इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई जैसी महिलाएँ भी हैं। वो जिन्होंने पीठ पर संतान को लेकर दुश्मनों को छठी का दूध याद दिलाया था और उसी देश में CRPF कमांडो सुनैना पटेल जैसी जिंदा उदाहरण भी हैं, जिन्होंने गर्भावस्था में भी नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा सँभाला।

दिल्ली में दंगे होते हैं। करोड़ों की संपत्ति तहस-नहस हो जाती है। किसी से उसका रोजगार छिनता है। कोई अपने परिजनों को हमेशा के लिए खो देता है। कुछ के घर के चिराग बुझ जाते हैं और कहीं-कहीं तो लोगों के हाथ में सिर्फ़ अपनों के टुकड़े आते हैं।

मगर, बावजूद इन सबके वामपंथी गिरोह के लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कहते हैं कि नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ शुरू हुआ प्रदर्शन बिलकुल शांतिपूर्ण था और इसे आयोजित करने वाले लोगों की मंशा बिलकुल साफ थी।

अब इसी कथन को खींचते-खींचते ऐसे लोग उन सभी आरोपितों की रिहाई की माँग भी कर लेते हैं, जिन पर पुलिस अपनी जाँच के दौरान ताबड़तोड़ एक्शन ले रही है।

सफूरा जरगर, इन्हीं लोगों में से एक है। बस फर्क़ ये है कि सफूरा वर्तमान में गर्भवती है। वरना उस पर लगे आरोप भी उतने ही संगीन और गंभीर हैं, जितने पिंजड़ा तोड़ की सदस्य देवांगना और नताशा पर।

पुलिस ने सफूरा जरगर को पर्याप्त सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया। इसके बाद उसे पुलिस ने तिहाड़ में रखा। बाद में, कई बार गिरोह के लोगों ने सफूरा के गर्भवती होने का हवाला देकर उसके लिए रिहाई की माँग की। मगर, गंभीर आरोपों के तहत हुई गिरफ्तारी के कारण कोर्ट ने भी उसे बेल नहीं दिया।

ऐसे में मीडिया गिरोह ने सफूरा के लिए नया रास्ता खोजा। उन्होंने सफूरा पर मार्मिक लेख लिखने शुरू किए। द वायर, इस क्रम में सबसे तेज निकला। इस मीडिया संस्थान ने अपनी रिपोर्टिंग से सफूरा जरगर के आरोपों के मद्देनजर प्रशासन को अत्याचारी दिखाने का हर संभव प्रयास किया।

हालात ये हो गई कि जब किसी एंगल से काम नहीं चला तो अपने हालिया लेख में द वायर ने भारत में मातृत्व प्रेम को अलग-अलग बताकर उस पर सवाल उठा दिए। इस लेख में, जिसमें भारत में मातृत्व की परिभाषा को सफूरा जरगर के हालातों से तोल दिया गया । उसमें उस हथिनी की भी बात हुई, जिसे अभी हाल में विस्फोटक खिलाकर बेसहारा मरने के लिए छोड़ दिया गया।

अब क्या सोचकर ये तुलना हुई है? ये लेख को लिखने वाली लेखिका ही जाने। मगर, जब ऐसे उदाहरणों का प्रयोग सफूरा के अपराध को ढँकने के लिहाज से केवल इसलिए कर दिया गया हो, कि हथिनी भी गर्भवती थी और सफूरा भी है। फिर भी लोग हथिनी के प्रति संवेदना जाहिर कर रहे हैं, मगर सफूरा को बेल तक नहीं मिल रही।

ऐसे में यह ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि जिस समय हथिनी गर्भवती थी और उसके साथ इस अमानवीय कृत्य को अंजाम दिया गया, उस वक्त अगर वह चाहती तो पूरे इलाके में बदहवास होकर काफी तबाही मचा सकती थी। किंतु उसने ऐसा कुछ भी नुकसान करने की बजाय, चुपचाप पानी में जाकर खड़ा होना मुनासिब समझा। 

हथिनी के उलट सफूरा जरगर, जो कि अकादमिक क्वालिफिकेशन के आधार पर पढ़ी-लिखी इंसान मानी जाएगी, उसने सीएए-विरोधी प्रदर्शन को हिंसक बनाने के लिए उसको और विस्तार दिया और बाद में उत्तर पूर्वी दिल्ली में कई हत्याएँ, आगजनी की घटनाएँ हुईं।

वामपंथी आज भले ही इस पूरी हिंसा के लिए छाती पीट-पीट कर कपिल मिश्रा को दोषी ठहराएँ। पर ये बात सब जानते हैं कि आखिर किस निराधार मुद्दे पर शुरू हुआ विरोध देखते-देखते दंगों में तब्दील हुआ। 

द वायर की लेखिका बिलकुल बोल सकती हैं कि मातृत्व की परिभाषा अलग होती है। लेकिन ये कहना कि भारत में मातृत्व का सम्मान नहीं है। बिलकुल बर्दाश्त योग्य नहीं है।

मातृत्व की परिभाषा सबकी दृष्टि में अलग होती है। पर इसको आधार बनाकर सफूरा जरगर के आरोपों के ऊपर मातृत्व का हवाला देना और भारत पर ऊँगली उठाना, केवल जरगर के अपराधों को छिपाने का एक छद्म प्रयास है।

जिस देश में सफूरा के कारण पूरे भारत की मंशा पर सवाल उठ गए। उसी देश के इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई जैसी महिलाएँ भी हैं। जिन्होंने पीठ पर संतान को लेकर दुश्मनों को छठी का दूध याद दिलाया था और उसी देश में CRPF कमांडो सुनैना पटेल जैसी जिंदा उदाहरण भी हैं जिन्होंने, गर्भावस्था में भी नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा सँभाला।

अब बताइए, संदर्भों को देखते हुए क्यों न रहे मातृत्व की परिभाषा अलग-अलग? सुनैना पटेल जैसी एक वो महिला, जिसने दो महीने का गर्भ धारण किए अपनी ड्यूटी ज्वाइन की और अंत तक अपना फर्ज निभाते-निभाते बच्चे को जन्म दिया। और दूसरी और वो महिला, जिसने गर्भावस्था के पहले माह में लोगों को भड़काने की साजिश रची और बात जब कुकर्मों के अंजाम की आई, तो उसी गर्भ को आड़ बनाकर अपने लिए दया माँगने लगी।

आज, लोकतंत्र की बातें करने वाले ही ये बताएँ कि किस किताब में लिखा है कि गर्भवती होने के बाद लोगों को भड़काओ और जब पकड़े जाओ तो विक्टिम कार्ड खेल लो? आज सोशल मीडिया पर गिरोह का दोहरापन देखकर ऐसे तमाम सवाल तैर रहे हैं। 

जो कुछ भी उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुआ, उसे भुला पाना असंभव है। दिलबर नेगी के साथ हुई क्रूरता, अंकित शर्मा के साथ हुई बर्बरता, इस्लामिक नारों के साथ गली में फेंकी गई विनोद कुमार की लाश… सबकी सिर्फ़ एक ही माँग है कि जो फरवरी माह में हुआ, उसे भड़काने वाला हर अपराधी सलाखों के पीछे हो या अपने जुर्म मुताबिक उपयुक्त सजा पाए।

सफूरा जरगर के लिए रिपोर्ट में मानवीय दृष्टिकोण रखने से पहले समझ लीजिए कि प्रेगनेंट होना किसी भी महिला को उसके अपराधों से मुक्ति नहीं दिलाता है। हाँ, स्वास्थ्य सुविधाएँ उस महिला को उपलब्ध करवाई जाती है, जो सफूरा को वर्तमान में करवाई जा रही है। मगर, बावजूद इसके गिरोह के ये प्रयास बताते हैं कि आज वामपंथी और कट्टरपंथी अपनी खून की प्यास को सही ठहराने के लिए माँ के गर्भ का इस्तेमाल करने लगने हैं।

जहाँ उन्हें ये याद नहीं रह गया कि जिस मामले में सफूरा गिरफ्तार हुई है, उसी के कारण 50 से ज्यादा निर्दोष लोगों की लाशें गिरी थीं और राष्ट्रीय राजधानी ने 1984 में सिखों नरसंहार के बाद मुख्य रूप से हिंदुओं को निशाना बनते देखा था। 

उस समय अनिल स्वीट हाउस में काम करने वाले दिलबर सिंह नेगी के हाथ-पाँव को दंगाइयों की भीड़ ने तलवार से काटा था और बाद में बचे शव या कहा ये भी जाता है कि ज़िंदा ही उनको आग में जलने के लिए फेंक दिया था।

उन्हीं जैसे लोगों के भड़काने की वजह से इस्लामिक भीड़ खुलेआम सड़कों पर आ गई थी और मौका पाते ही उन्होंने अंकित शर्मा को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। सबसे पहले इस उन्मादी भीड़ पर अंकित को ताहिर हुसैन की बिल्डिंग में खींचकर ले जाने और धार-दार हथियार से ताबड़तोड़ वार कर मौत के घाट उतार देने का आरोप है। बाद में अंकित का शव चाँद बाग नाले से बरामद हुआ।

उन्हीं जैसे तथाकथित क्रांतिकारियों ने नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के मुसलमानों को इतनी हिम्मत दी कि ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे के बीच में उन्होंने विनोद को मार डाला और सभी हिंदुओं को धमकी दी कि वह पूरी रात उन्हें ऐसी लाशें भेजेंगे।

इसके बाद 19 साल के विवेक के सिर में ड्रिल मशीन से हमला किया गया और घर से बच्चे के लिए दूध लेने निकले दलित दिनेश को भी गोली मारकर खत्म कर दिया गया। दिलीप कुमार की दुकान जली, अनूप कुमार के गर्दन में गोली लगी।

इन सब घटनाओं का जवाब कौन देगा? क्यों न किया जाए सफूरा से सवाल? दिल्ली दंगे क्या कोई फिल्म का सीन था, जिन्हें स्मृतियों से डिलीट कर दें? या कोई काल्पनिक घटना थी, जिसे हिंदुओं ने अपने मनमुताबिक गढ़ लिया? सब रची-रचाई साजिश थी। जिसे सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया गया।

अब सफूरा का पूरे दंगों में क्या रोल था? ये सब सिद्ध करना दिल्ली पुलिस का काम है। किंतु बेवजह एक आरोपित के लिए इतनी संवेदनाएँ उड़ेलना, इस बात को प्रदर्शित करता है कि सफूरा की आड़ में आज भी भारत की छवि को बिगाड़ने का प्रयास वामपंथियों द्वारा जारी है। फर्क शायद सिर्फ़ ये है कि पहले हिन्दूफोबिया के बैनर तले लेख लिखे जा रहे थे, अब मातृत्व भावना को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। पहले आतंकियों का प्रोफेशन खोजा जा रहा था, अब सफूरा के लिए लेखों में स्कॉलर जैसे शब्द का इस्तेमाल हो रहा है।

अगर, आज भारत की न्यायपालिका सफूरा के गर्भवती होने के बावजूद उसके लिए ऐसे कड़े निर्णय ले रही है, तो इस बात को समझिए। सफूरा पर तय आरोप छोटे-मोटे नहीं है और यदि वामपंथी उन आरोपों को झुठला नहीं सकते हैं, तो उनका कोई अधिकार नहीं है कि वो पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए या दिल्ली हिंसा के किसी आरोपित को माफ करने की बात कहें।

आज से पहले भी कई गर्भवती महिलाओं ने जेल में अपनी सजा काटी है। संभवत: उनमें से अधिकांश हिंदू भी हों। मगर, कभी इस गिरोह ने उनके लिए अपनी आवाज बुलंद नहीं की। लेकिन जैसे ही सफूरा जरगर गिरफ्त में आई, उसकी पढ़ाई-लिखाई से लेकर उसकी बौद्धिकता तक को आधार बनाकर दिल्ली पुलिस को गलत साबित करने का प्रयास हुआ। शायद इसीलिए, ये बात सच है कि सबका मातृत्व एक जैसा नहीं होता। वामपंथियों से ऐसा प्रेम चाहने के लिए आरोपितों को समुदाय विशेष से होना पड़ता है और दूसरा अपराध करने के दौरान उसे प्रेगनेंट होना पड़ता है।

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