अलीगढ़ और रवीश: शाह ने नोचा इंटरनेट का तार, मोदी ने तोड़ा टावर, नहीं हो रहा दुखों का अंत

मुझे चिंता अब पत्रकारिता की नहीं है क्योंकि इन सबकी दुकानें बंद हो रही हैं। मुझे चिंता उनके घरों की औरतों, बच्चियों, लड़कियों की है कि वो आखिर ऐसे बापों, भाइयों, दोस्तों और पतियों से किस तरह की उम्मीद लगाती होंगी।

जैसा कि हम सब जानते हैं कि रवीश कुमार के ग्रह, नक्षत्र, गोचर और दशा के साथ-साथ कुंडली के हर घर के स्वामी गलत जगहों पर बैठे हुए हैं, अतः समस्या यह हो रही है कि वो फेसबुक पोस्ट करते हैं, और वो गायब हो जाता है। उन्होंने राजीव गाँधी द्वारा कंधे पर ढो कर लाए गए ओरिजनल कंप्यूटर से भी पोस्ट करने की कोशिश की, वो भी नहीं हुई। फिर उन्होंने नेहरू जी द्वारा स्थापित एक अनुसंधान संस्थान की टेक्नॉलॉजी से निर्मित फोन से पोस्ट करने की कोशिश की, तो वो भी उड़ गई।

आपको यह भी बताता चलूँ कि इससे पहले भी ब्रह्मांड रत्न रवीश जी को प्राइम टाइम के सिग्नल भी मोदी सरकार के पहले दौर में गायब होते रहे हैं। सीबीआई से जाँच कराने पर पता चला कि जिन दो-चार दर्शकों ने उन्हें यह शिकायत की थी, उन्होंने उनका अपना सेट टॉप बॉक्स रीचार्ज ही नहीं कराया था। लेकिन सीबीआई तो केन्द्र सरकार का तोता है तो असली वजह, सूत्रों के हवाले से, यह आई है कि वहाँ मोदी जी ने अपने होलोग्राम को डिश की छतरी पर बिठा दिया था जो कि एनडीटीवी के सिग्नल को छतरी में घुसने से पहले ही कैच कर लेते थे और बग़ल में बैठे अमित शाह की जेब में डाल देते थे।

आगे सूत्रों ने बताया कि अमित शाह उन सिग्नलों को अम्बानी को बेच कर पैसा बना लेते थे जिसका उपयोग भाजपा ने चुनाव की फ़ंडिंग के लिए किया। इसी गुस्से में एक बार रवीश जी ने स्क्रीन काली करने की योजना बनाई, जिसका पता मोदी-शाह द्वय को चल गया। ऐन दिन, जब रवीश ऐसा करने वाले थे, तो उन्हें यह अक़्ल आ गई कि स्क्रीन काली करने से कोई आपातकाल के समय का इंडियन एक्सप्रेस नहीं बन जाता। साथ ही, एनडीटीवी के स्टूडियो में चाय के कप में बिस्कुट के टूट जाने को आपातकाल नहीं माना जाता।

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खैर, हुआ यूँ कि रवीश जी ने सोच लिया कि वो काली स्क्रीन नहीं करेंगे लेकिन अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के होलोग्रामों ने मिल कर उनके इस आत्मावलोकन के मौक़े को बेकार कर दिया जब उन्होंने विदेशी तकनीक से रवीश की आवाज काट-छाँट कर ‘यह अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर है’ वाला लेख खुद चला दिया। चूँकि डिश पर बैठ कर वो रंगीन सिग्नल चुरा रहे थे, क्योंकि अम्बानी उसके ज़्यादा पैसे देते हैं, तो सिर्फ काला सिग्नल ही एंटेना में घुस पाया और फिर जो हुआ वो पूरे देश ने देखा।

हाल की ख़बर यह कि रवीश जी की आवाज को दबाने की भरपूर कोशिश जारी है। वो अलीगढ़ वाले मामले पर कुछ लिखना चाह रहे हैं लेकिन चाहे वो लैपटॉप से लिखें, या मोबाइल से, पोस्ट गायब हो जाता है। साथ ही, उन्होंने पाठकों से यह भी पूछा कि उन्होंने जो अनुपम खेर वाला लिखा था, वो लोगों को दिख रहा है कि नहीं। अच्छी बात यह है कि रवीश कुमार ने अभी तक सीधे या परोक्ष तौर पर मोदी सरकार को इसका ज़िम्मेदार नहीं बताया है जो कि उनके कई प्रशंसकों को ठीक नहीं लग रहा। खैर रवीश जी के प्रशंसकों को तो आज कल बहुत कुछ ठीक नहीं लग रहा होगा लेकिन ‘सेड रीएक्ट्स ओनली’ तो दे ही रहे हैं पोस्ट पर।

कुछ दिनों पहले रवीश जी ने इसी तरह लोगों को बताया था कि टीवी का टीआरपी जो भी रहे, उन्हें यूट्यूब पर खूब लोग देख रहे हैं। यूट्यूब पर तो दीपक कल्लाल भी अपनी पसलियों को सहलाते हुए विराट कोहली से शादी करना चाहता है, जिसके व्यूज़ रवीश जी से तो ज़्यादा ही हैं, तो क्या यह माना जाए कि कल्लाल भाई बेहतर पत्रकारिता कर रहे हैं?

बात जो भी हो, निजी तौर पर मैं पत्रकारों की गायब होती पोस्ट को लेकर चिंतित हूँ। इसके तीन कारण हैं, जिसमें से एक ही बता पाऊँगा। ‘तीन कारण हैं’ कहने से ऐसा प्रतीत होता है कि आदमी जानकार है, और रवीश जी की तरह गंभीर चेहरा बना कर, कुटिल चवन्नियाँ मुस्कान देते हुए ऐसा कहा जाए तब तो मुझे वामपंथी भी आदर से देखेंगे। गायब होती पोस्ट की चिंता का कारण यह है कि अगर रवीश जी प्रोपेगेंडा न फैलाएँ, वो यह न लिखें कि अलीगढ़ की बच्ची के साथ जो हुआ वो जघन्य है लेकिन मुसलमानों के पक्ष में लोग तिरंगा यात्रा तो नहीं निकाल रहे, तो हमें कैसे पता चलेगा कि पत्रकारिता का यह स्तम्भ क्षरण का शिकार हो कर, आतंरिक कुंठा से भीतर ही भीतर घुलता जा रहा है!

रवीश कुमार बड़ी ही ख़ूबसूरती से ‘इज़ इक्वल टू’ करते नजर आए। बात है अलीगढ़ की, रवीश जी की गाड़ी कठुआ क्यों जा रही है? क्या कठुआ की बच्ची के केस में रवीश जी और उनके गिरोह ने पुलिस की रिपोर्ट, कोर्ट के फ़ैसले या फ़ोरेंसिक और मेडिकल जाँच के आने का इंतजार किया था या ख़बर आने के पहले ही घंटे में भारत को रेपिस्तान और हिन्दुओं को बलात्कारी धर्म बता दिया था? आधे घंटे नहीं लगे थे तब इन लोगों को।

आज रवीश कुमार ज्ञान दे रहे हैं कि अफ़वाह न फैलाएँ। ऐसा है रवीश जी कि अगर यहाँ पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट पर डॉक्टरों की राय पढ़ दूँ तो आपकी रूह काँप जाएगी क्योंकि आप भी एक पिता हैं। बात बलात्कार हुआ या नहीं, यह तो है ही नहीं क्योंकि जिस हालत में लाश मिली है, उससे न तो रेप कन्फर्म किया जा सकता है, न नकारा जा सकता है। इसलिए, इसमें कठुआ घुसाने का मतलब है कि आप चर्चा को कहीं और ले जाना चाह रहे हैं।

चर्चा कहीं और जाएगी नहीं क्योंकि टाइप करना और आवाज उठाना अब वामपंथियों या कॉन्ग्रेस-पोषित पत्रकारों की बपौती नहीं रही। इस केस में आप जो लिखना चाह रहे हैं वो वैसे भी हवाबाज़ी ही है तो गायब हो रही है तो आपको समझना चाहिए कि फर्जी बातें हवा में ऐसे ही 0-1 बन कर गायब हो जाती है। जब उस समय इस केस में हिन्दू, भाजपा, वकील, नेता सब घसीट लिए गए थे, और सत्य आप आज भी नहीं बता पा रहे क्योंकि वो आपके नैरेटिव को सूट नहीं करता, तो आपकी मजबूरी है कि योगी सरकार पर प्रश्नवाचक चिह्न के साथ ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ जैसी ग़ज़ब की बात भी लिख देते हैं।

आपने जो ज्ञान देते हुए पूछा है कि क्या उन दरिंदों के साथ आप में से कोई खड़ा था, कठुआ की तरह किसी ने रैली निकाली, उससे आप स्वयं ही नग्न हो रहे हैं। आपने लिखा है कि यह कम जघन्य नहीं है लेकिन यह साम्प्रदायिक कैसे हो गया? सही बात है, मैं भी यही कहता हूँ। लेकिन फिर याद आता है कि आपने जिस तरह से कठुआ में रैली की बात की है, उससे आप ऐसे दिखाना चाह रहे हैं कि वो साम्प्रदायिक था, और उसका भार उन सारे लोगों को लेना चाहिए जो ‘आप में से’ नहीं है।

लेकिन किसी सौ-पचास लोगों की भीड़ का, किसी रैली का होना ही उसे साम्प्रदायिक कैसे बना देता है? क्या रवीश कुमार ने कठुआ की उस रैली में भाग लेने वालों से पूछा कि वो वहाँ क्यों थे? रिपोर्ट पढ़ने से पता चलता है कि स्थानीय पुलिस कथित तौर पर किसी को भी पूछताछ के लिए ले जा रही थी, और इसी के विरोध में लोगों ने रैली निकाली कि केस की जाँच सीबीआई करे। लेकिन रवीश कुमार के इंटरनेट की तार तो अमित शाह ने काट दी और मोदी के होलोग्राम ने मोबाइल फोन के टावर को तोड़ दिया तो इंटरनेट आते-आते रह गया। यहाँ पर तो रवीश जी ने दूसरा पक्ष जानने की कोशिश भी नहीं की और कठुआ के मामले को साम्प्रदायिक बता दिया।

हर ऐसे मुद्दे पर ये गिरोह इसी तरह की बेहूदगी ले आता है। बंगाल के दंगों की कवरेज पर जब लोगों ने सवाल किए तो कहा गया था कि इससे बाहरी इलाकों में अशांति फैल सकती है, इसलिए मीडिया ने संयम दिखाया है। जबकि यही संयम भाजपा शासित प्रदेशों में होने वाले सामाजिक अपराध को भी राजनैतिक या मजहबी रंग देते वक्त नहीं दिखाया जाता।

ये मुद्दा बिलकुल साम्प्रदायिक नहीं है, न ही कठुआ वाला मुद्दा था। लेकिन, इसके साम्प्रदायिक न होने की वजह से अब भारत के मुसलमान शर्मिंदा नहीं हैं, न ही बॉलीवुड की लम्पट हस्तियाँ शर्मिंदगी के बोझ से मेकअप पिघला पा रही हैं, न ही पत्रकारों में वो मुखरता देखने को मिल रही है कि वो अपनी बेटी से नज़रें नहीं मिला पा रहे कि हम तुम्हारे लिए कैसा समाज छोड़े जा रहे हैं।

मतलब, रवीश और उनके गिरोह के सदस्य तभी संवेदनशील हो पाते हैं जब मामला इनके हिसाब से साम्प्रदायिक हो। और इनका हिसाब क्या है? इनका हिसाब है कि पीड़ित या पीड़िता मुसलमान या दलित हो, अपराध करने वाला हिन्दू या सवर्ण हो। इस पोस्ट के ज़रिए रवीश ने यह बताया है कि वो कब-कब संवेदनशील होते हैं और कब ऐसी जघन्य हत्याएँ, क्रूरतम अपराध बस इसलिए चर्चा में नहीं आने चाहिए क्योंकि उसका एंगल सही नहीं बैठ रहा… क्योंकि उसमें आरोपितों के नाम जाहिद, असलम और मेंहदी हसन है।

मुझे चिंता अब पत्रकारिता की नहीं है क्योंकि इन सबकी दुकानें बंद हो रही हैं। मुझे चिंता उनके घरों की औरतों, बच्चियों, लड़कियों की है कि वो आखिर ऐसे बापों, भाइयों, दोस्तों और पतियों से किस तरह की उम्मीद लगाती होंगी। मुझे चिंता इस बात की है कि हमारे समाज में जिन लोगों को कुछ लोग आदर्श मानते हैं, वो ऐसे मामलों में नैरेटिव सूट नहीं करने पर उसकी क्रूरता से भागते हैं और चर्चा को पटरी से उतारने की हर संभव कोशिश करते हैं।

ऐसे समाज में रहने का ख़तरा असलम, जाहिद और मेंहदी हसन से तो है ही, लेकिन उसी समाज को रवीश और उसके गिरोह से भी डरना चाहिए जो बलात्कार में साम्प्रदायिकता ढूँढता है, जो बताता है कि ये कम जघन्य नहीं है लेकिन कहीं योगी सरकार मुस्लिम तुष्टीकरण तो नहीं कर रही थी!

वाह रवीश जी, वाह! एक ही ज़मीर है, कितनी बार बेचोगे?

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