BBC को सोशल मीडिया पर बगदादी को बाप-चाचा टाइप प्यार देने पर पड़ी गाली, अब सुधर गए

बगदादी के मारे जाने के बाद वाशिंगटन पोस्ट ने 'इस्लामिक विद्वान' बताते हुए उसका महिमामंडन किया था। वहीं, बीबीसी ने बगदादी को 'अंतर्मुखी' और उसके परिवार को 'धर्मनिष्ठ' बता कर उसकी ख़ूब बड़ाई की थी।

बीबीसी ने आईएसआईएस के मारे गए सरगना अबू-बकर अल बगदादी के लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग किया था। बीबीसी ने बगदादी को ऐसे ही सम्बोधित किया था, जैसे किसी बड़े जनप्रतिनिधि अथवा प्रतिष्ठित लोगों को किया जाता है। बीबीसी की इसके लिए ख़ासी आलोचना हुई थी। जहाँ वाशिंगटन पोस्ट ने बगदादी को ‘इस्लामिक विद्वान’ बताते हुए उसका महिमामंडन किया था, बीबीसी ने उसे ‘अंतर्मुखी’ और उसके परिवार को ‘धर्मनिष्ठ’ बता कर उसकी ख़ूब बड़ाई की थी। बीबीसी बगदादी के बचपन और जवानी के किस्से लेकर आया था और उसे ‘महान’ बताने की कोशिश की थी।

लेकिन सोशल मीडिया में लताड़ क्या पड़ी बीबीसी ने बगदादी के लिए ‘थे‘ की जगह ‘था‘ का प्रयोग करना शुरू कर उसे सम्मान देना बंद कर दिया है। पहले बीबीसी ने लिखा था, ‘बगदादी छिपे हुए थे‘, और अब लिखा है “बगदादी इदलिब में क्यों था?” ये स्क्रीनशॉट बीबीसी के उस न्यूज़ का है, जिसमें उसने बगदादी को सम्मान दिया था:


बीबीसी ने ‘बगदादी मारे गए’ लिखा था

वहीं आलोचना के बाद अपनी दूसरी ख़बर में बीबीसी ने खूँखार आतंकी रहे बगदादी के लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करना बंद कर दिया है। इसे आप नीचे इस स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं:

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पहले बीबीसी ने वाशिंगटन पोस्ट से भी कई क़दम आगे निकलते हुए बगदादी को ऐसे प्रस्तुत किया था, जैसे वो मानव-सेवा के लिए बलिदान हुआ कोई सामाजिक कार्यकर्ता हो। जबकि बगदादी और उसका आतंकी संगठन आईएसआईएस 5 लाख से भी अधिक हत्याओं का गुनहगार है। यह भी कह सकते हैं कि बीबीसी ने बगदादी के मौत के बाद एक तरह से शोक मनाया और उसे ऐसे सम्मान दिया, जैसे वो कोई ऋषि-मुनि रहा हो। बीबीसी ने बार-बार उसके लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग किया था।

सबसे बड़ी बात कि बीबीसी ने इस लेख में ‘कथित इस्लामिक स्टेट’ का प्रयोग किया था। अर्थात, बीबीसी यह मानता ही नहीं है कि इस्लामिक स्टेट नामक कोई आतंकी संगठन इस दुनिया में है भी। बीबीसी का क्या ये मतलब था कि 4-6 लाख लोग यूँ ही हवा में मर गए, उन्हें किसी ने नहीं मारा?

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