4 जून 1989 का दिन था, चीन की राजधानी बीजिंग में तियानमेन स्क्वायर पर हजारों छात्र, मजदूर और आम नागरिक इकट्ठा हुए थे। ये लोग लोकतांत्रिक सुधार, भ्रष्टाचार पर लगाम और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की माँग कर रहे थे।
इन लोगों को उम्मीद थी कि कुछ बदलेगा लेकिन यह दिन इन हजारों लोगों का आखिरी दिन बन गया। कुछ ही घंटों बाद सड़कों पर टैंक उतर आए, गोलियाँ चलीं और आंदोलन का दमन कर दिया गया।
37 साल बाद भी यह सवाल दुनिया भर में पूछा जाता है कि आखिर तियानमेन स्क्वायर में हुआ क्या था? चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया? उस समय चीन के वामपंथी नेताओं का क्या तर्क था? और सबसे महत्वपूर्ण, भारत के वामपंथी दलों ने इस घटना को किस नजर से देखा?
क्या था तियानमेन स्क्वायर प्रोटेस्ट आखिर क्यों हुआ था शुरू?
1980 के दशक में चीन आर्थिक सुधारों के दौर से गुजर रहा था। देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में बाजार आधारित सुधार लागू किए जा रहे थे। इन सुधारों से अर्थव्यवस्था तो तेजी से बढ़ी लेकिन इसके साथ भ्रष्टाचार, महँगाई और असमानता भी बढ़ने लगी।
15 अप्रैल 1989 को चीन के पूर्व कम्युनिस्ट नेता हू याओबांग का निधन हो गया। हू याओबांग को सुधारवादी नेता माना जाता था और छात्रों के बीच उनकी अच्छी छवि थी। उनकी मौत के बाद हजारों छात्र उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर में जुटने लगे।

धीरे-धीरे यह श्रद्धांजलि सभा एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल गई। छात्र सिर्फ शोक नहीं मना रहे थे, बल्कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई, प्रेस की अधिक स्वतंत्रता, राजनीतिक सुधार और सरकार में पारदर्शिता की माँग भी कर रहे थे।
कुछ ही हफ्तों में आंदोलन पूरे देश में फैल गया। बीजिंग के अलावा कई अन्य शहरों में भी प्रदर्शन होने लगे। लाखों लोग छात्रों के समर्थन में सड़कों पर उतर आए। यह कम्युनिस्ट चीन के इतिहास का सबसे बड़ा जन आंदोलन बन गया।
क्यों थे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर मतभेद?
तियानमेन आंदोलन को लेकर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर एक जैसी सोच नहीं थी। पार्टी के कुछ नेता मानते थे कि छात्रों की माँगों को सुना जाना चाहिए और बातचीत के जरिए समाधान निकाला जा सकता है।
उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव झाओ जियांग नरम रुख रखते थे। वे छात्रों के बीच गए और उनसे बातचीत की कोशिश भी की। उनका मानना था कि आंदोलन को बल प्रयोग से नहीं बल्कि राजनीतिक संवाद से समाप्त किया जाना चाहिए।
लेकिन पार्टी के दूसरे धड़े का मानना था कि यह आंदोलन सिर्फ सुधारों की माँग नहीं कर रहा बल्कि कम्युनिस्ट शासन को चुनौती देने की दिशा में बढ़ रहा है। उन्हें डर था कि अगर आंदोलन जारी रहा तो चीन में भी वही स्थिति पैदा हो सकती है जो उस समय सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के कई देशों में बन रही थी। आखिरकार कठोर रुख रखने वाले नेताओं का पक्ष भारी पड़ा और सरकार ने आंदोलन के खिलाफ सख्त कार्रवाई का फैसला कर लिया।
चीनी सरकार ने आंदोलन को कैसे किया खत्म?
20 मई 1989 को बीजिंग में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। सेना को राजधानी में भेजा गया लेकिन शुरुआत में प्रदर्शनकारियों और स्थानीय लोगों ने सैनिकों को आगे बढ़ने से रोक दिया। हालात लगातार तनावपूर्ण होते गए। आखिरकार 3 और 4 जून 1989 की रात चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को तियानमेन स्क्वायर और उसके आसपास के इलाकों को खाली कराने का आदेश दिया गया।
टैंक और बख्तरबंद वाहन सड़कों पर उतरे। सैनिकों ने भीड़ को हटाने के लिए बल का इस्तेमाल किया। कई जगह गोलीबारी भी हुई। इसके बाद आंदोलन पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
इस कार्रवाई में कितने लोग मारे गए, इसे लेकर आज भी विवाद बना हुआ है। चीन की सरकार संख्या को कम कर के बताती है, जबकि मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों और कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का दावा है कि मरने वालों की संख्या सैकड़ों से लेकर हजारों तक हो सकती है। हालाँकि एक बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि यह कार्रवाई बेहद हिंसक थी और उसने चीन के इतिहास पर स्थायी प्रभाव छोड़ा।
चीन ने 200 लोगों और कई सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने का दावा किया था। वहीं ब्रिटिश सरकार के एक डॉक्यूमेंट में सामने आया था कि चीनी सेना की कार्रवाई में कम से कम 10,000 लोग मारे गए थे।
चीन के वामपंथियों और कम्युनिस्ट सरकार का क्या तर्क था?
पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कार्रवाई को लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का दमन बताया लेकिन चीन की कम्युनिस्ट सरकार का नजरिया बिल्कुल अलग रहा।
सरकार ने आंदोलन के एक हिस्से को ‘काउंटर रिवोल्यूशनरी’ यानी क्रांति-विरोधी गतिविधि बताया। चीनी नेतृत्व का दावा था कि कुछ ताकतें देश में अस्थिरता पैदा करना चाहती थीं और कम्युनिस्ट शासन को कमजोर करने की कोशिश कर रही थीं।
देंग शियाओपिंग और उनके समर्थकों का मानना था कि अगर उस समय सख्त कदम नहीं उठाए जाते तो चीन भी सोवियत संघ की तरह राजनीतिक अराजकता और टुकड़ों में टूटने की ओर बढ़ सकता था। इसी वजह से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी आज भी आधिकारिक रूप से यह मानती है कि 1989 में उठाया गया कदम देश की स्थिरता और विकास के लिए जरूरी था।
सालों बाद भी चीन के कई सरकारी नेता इसी तर्क को दोहराते रहे हैं। उनका कहना है कि उस समय लिए गए फैसलों की वजह से चीन राजनीतिक रूप से स्थिर रहा और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सका।
तियानमेन स्क्वायर नरसंहार का जिक्र होते ही भारत में वामपंथी दलों की भूमिका और उनके रुख पर भी सवाल उठने लगते हैं। दुनिया भर में जहाँ लोकतंत्र समर्थक छात्र-युवाओं पर चीनी सेना की कार्रवाई की आलोचना हुई तो वहीं भारत के कई वामपंथी नेता और संगठन चीन की कम्युनिस्ट सरकार के बचाव में खड़े नजर आए।
सवालों के घेरे में भारतीय वामपंथी दलों का रवैया
वामपंथ के एक बड़े वर्ग ने चीन के आधिकारिक दावों को स्वीकार करते हुए सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की। उनका तर्क था कि चीन में राजनीतिक अस्थिरता और क्रांति के विरोध को रोकने के लिए कठोर कदम जरूरी थे। कई वामपंथी नेताओं ने पश्चिमी मीडिया पर घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप भी लगाया।
आलोचकों का कहना है कि जो वामपंथी दल भारत में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की बात करते हैं, वही चीन में छात्रों और नागरिकों के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई पर अक्सर दोहरे मापदंड अपनाते दिखाई देते हैं। उनके अनुसार, वैचारिक नजदीकी के कारण कई वामपंथी नेता चीन की कम्युनिस्ट सरकार की आलोचना करने से बचते रहे हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया में 16 जून 1989 को प्रकाशित एक लेख के अनुसार, CPI(M) और CPI ने इस कार्रवाई की खुलकर निंदा नहीं की। इन दलों के नेताओं ने इसे चीन का आंतरिक मामला बताया। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि छात्रों का आंदोलन राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रहा था, इसलिए चीनी सरकार की कार्रवाई को गलत नहीं माना जाना चाहिए।
इसका उदाहरण CPI(M) के वरिष्ठ नेता और केरल के मंत्री एम वी गोविंदन का बयान है। उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी यह नहीं मानती कि तियानमेन स्क्वायर आंदोलन को खून में डुबो दिया गया था।
16 जनवरी 1990 को टाइम्स ऑफ इंडिया के एक संपादकीय में कहा गया कि CPI(M) ने सार्वजनिक रूप से तियानआनमेन स्क्वायर में हुई कार्रवाई का बचाव किया था। CPI(M) के आधिकारिक मलयालम अखबार ‘देशाभिमानी‘ ने छात्र प्रदर्शनकारियों को उपद्रवी बताया था। अखबार में चीनी सरकार द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई के समर्थन में भी बातें कही गई थीं।
7 नवंबर 1990 को लोकसभा में विजय कुमार मल्होत्रा ने आरोप लगाया था कि तियानआनमेन स्क्वायर में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन को टैंकों से कुचले जाने के बाद भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने चीनी सरकार का समर्थन किया था।
राजनीतिक स्तर पर चीन के प्रति नरम रुख अपनाने वाले नेताओं की वजह से भारतीय वामपंथ की भूमिका लगातार विवादों और आलोचनाओं का विषय बनी रही। इसलिए तियानमेन स्क्वायर की चर्चा में भारतीय वामपंथी दलों को ले कर ये कहा जाता है कि उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की तुलना में वैचारिक प्रतिबद्धता को अधिक महत्व दिया।
टैंक मैन की तस्वीर कैसे बन गई प्रतिरोध का वैश्विक प्रतीक?
तियानमेन स्क्वायर की चर्चा बिना ‘टैंक मैन‘ के अधूरी मानी जाती है। 5 जून 1989 को एक तस्वीर दुनिया भर में प्रकाशित हुई। तस्वीर में एक अकेला व्यक्ति हाथ में बैग लिए टैंकों के सामने खड़ा दिखाई देता है। वह टैंकों के रास्ते में खड़ा होकर उन्हें आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश करता है।

उस व्यक्ति की पहचान आज तक आधिकारिक रूप से नहीं हो सकी है। लेकिन उसकी तस्वीर दुनिया भर में साहस, प्रतिरोध और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में देखी जाती है। कई लोगों के लिए तियानमेन स्क्वायर की पूरी कहानी इसी तस्वीर में समा जाती है, एक तरफ राज्य की ताकत और दूसरी तरफ अकेला नागरिक।
37 साल बाद भी तियानमेन स्क्वायर दुनिया में चर्चा का विषय क्यों है?
तियानमेन स्क्वायर सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं है। यह आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा है। चीन में इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा बेहद सीमित है। इंटरनेट पर सेंसरशिप लागू रहती है और इस घटना की वर्षगाँठ पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी जाती है। कई बार स्मरण कार्यक्रमों और श्रद्धांजलि सभाओं पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं।
दूसरी तरफ मानवाधिकार संगठन लगातार इस घटना की निष्पक्ष जाँच, मृतकों की सही संख्या और जवाबदेही की माँग करते रहे हैं। इसी कारण हर साल 4 जून आते ही दुनिया भर में तियानमेन स्क्वायर की चर्चा फिर शुरू हो जाती है।


