पिछले 6 महीनों में दक्षिणपंथी न्यूज़ वेबसाइटों पर बढ़ा ट्रैफिक, वामपंथी में उतार-चढ़ाव

मोदी-विरोध में नकारात्मकता और निराशा का एजेंडा आगे बढ़ाने का काम आज ज़्यादातर वामपंथी पोर्टल कर रहे हैं। इसी नकारात्मकता से देश के उकताने का परिणाम है कि देश एक वैकल्पिक नैरेटिव की तलाश में है, जो कि दक्षिणपंथी मीडिया में उसे मिल रहा है।

दक्षिणपंथी न्यूज़ पोर्टलों का बेहतरीन प्रदर्शन

यदि वेबसाइटों पर रहे ट्रैफिक को जनता के मूड के पैमाने के तौर पर देखें तो दक्षिणपंथी विचारधारा आम भारतीय जनमानस में तेज़ी से जगह बना रही है। वेब ट्रैफिक को इकठ्ठा कर उसमें रुझानों का विश्लेषण करने वाली वेब एनालिटिक्स कंपनी सिमिलरवेब द्वारा जारी फरवरी तक के वेब ट्रैफिक डेटा से इसकी पुष्टि होती है।

सिमिलरवेब द्वारा इकट्ठे किए गए आँकड़ों के अनुसार भारत के शीर्ष दक्षिणपंथी न्यूज़ पोर्टलों स्वराज्य और ऑपइंडिया ने बीते 6 महीनों (सितम्बर 2018 से फ़रवरी 2019 तक) में वेब ट्रैफिक में बेहतरीन बढ़ोतरी दर्ज की है। स्वराज्य पोर्टल पर उपरोक्त समय में मासिक ट्रैफ़िक जहाँ बढ़कर 17 लाख से 30 लाख तक जा पहुँची, वहीं ऑपइंडिया ने 10 लाख (सितम्बर 2018) से बढ़कर लगभग 17 लाख (फ़रवरी 2019) मासिक ‘विज़िटर्स’ तक छलाँग लगाई। इसी बीच ऑपइंडिया ने अंग्रेज़ी के साथ-साथ अपना हिंदी संस्करण हिंदी पइंडिया भी शुरू किया।

वामपंथी न्यूज़ पोर्टलों में उतार-चढ़ाव का माहौल

वहीं इसी समय सीमा के दौरान वामपंथी रुझान वाले न्यूज़ पोर्टलों पर ट्रैफ़िक या तो सुस्त या उतार चढ़ाव वाला रहा। वामपंथी रुझान वाले न्यूज़ पोर्टलों में शीर्ष पर मौजूद ‘द वायर’ में जहाँ नवम्बर के बाद से वेब ट्रैफिक लगातार ढलान पर है, वहीं दूसरे पायदान पर मौजूद द क्विन्ट इस साल (वर्ष 2019 में ) वेब ट्रैफ़िक में बढ़ोतरी देखने वाले चुनिंदा पोर्टलों में शामिल है। पर सिमिलरवेब द्वारा संज्ञान में लिए गए पूरे छः महीनों की समयसीमा पर यदि गौर करें तो ‘द क्विन्ट’ का भी मासिक ट्रैफ़िक ~65 लाख से गिरकर ~50-55 लाख हो जाना एक सुरक्षित अनुमान होगा।

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रामायण के वर्तमान भारत नहीं बल्कि वर्तमान ईरान-अफ़ग़ानिस्तान में घटित होने जैसे विवादस्पद लेख छापने वाला पोर्टल ‘स्क्रॉल’ लगातार उतार-चढ़ाव के बीच सितम्बर, 2018 में 50 लाख से थोड़े कम से बढ़कर फ़रवरी, 2019 में 50 लाख से ज़रा ही ऊपर तक पहुँचने में सफल रहा।

आजतक चैनल चलाने वाले इंडिया टुडे ग्रुप का ‘डेली-ओ’ भी उतार-चढ़ाव भरी छमाही के अंत में अंततोगत्वा लगभग उतना ही ट्रैफ़िक (~9 लाख) जुटा पाया जितना कि छमाही के शुरू में था।

पुलवामा में हताहत हुए सीआरपीएफ जवानों की जातिगत गणना करने व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल के पुत्र पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने को लेकर विवादों का केंद्रबिंदु बने “कारवाँ” न्यूज़ पोर्टल को सबसे तगड़ा झटका लगा है। 5 महीनों में 2 लाख मासिक से बढ़कर 4.4 लाख मासिक तक पहुँचा कारवाँ का वेब ट्रैफ़िक फरवरी में लगभग 1 लाख का गोता लगाने के पश्चात् 3.4 लाख पर जा टिका।

नकारात्मक पत्रकारिता को नकारा

इसमें कोई दोराय नहीं कि मोदी सरकार न रामराज्य है और न ही उसकी वैचारिक भिन्नता के चलते आलोचना करना गलत या आपराधिक है, पर वामपंथी समाचार पोर्टलों ने मोदी-विरोध और देश-विरोध में कोई अंतर ही नहीं छोड़ा है। मोदी-विरोध में सच-झूठ का अंतर भुला देने और ख़बरों की यथास्थिति रिपोर्टिंग करने की बजाय एक नकारात्मकता और निराशा का एजेंडा आगे बढ़ाने का काम आज ज़्यादातर वामपंथी न्यूज़ पोर्टल कर रहे हैं।

और इसी नकारात्मकता से देश के उकताने का परिणाम है कि देश एक वैकल्पिक नैरेटिव की तलाश में है, जो कि दक्षिणपंथी मीडिया में उसे मिल रहा है।

एक बात और गौर करने लायक है कि अधिकांश दक्षिणपंथी मीडिया आउटलेट अपना वैचारिक आग्रह (ideological bias) खुल कर घोषित कर देते हैं (और जनता भी हमारी बातों पर विश्वास-अविश्वास उसी परिमाण में करती है जितने कि हम निष्पक्ष असल में रह पाते हैं)।

इसके ठीक उल्टे शायद ही कोई वामपंथी समाचार पोर्टल अपना वैचारिक आग्रह सर्वप्रथम आगे रखता है। आप, प्रिय वामपंथियो, अपना एजेंडा निष्पक्षता की ओट में चलाते हैं, जब कि अधिकांश दक्षिणपंथी पत्रकार और मीडिया संस्थान घोषित आग्रह के बावजूद यथासंभव निष्पक्षता-पूर्वक ख़बरों का विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं, और खबर व अपनी राय को अलग-अलग परोसते हैं।

सिमिलरवेब और आंकड़ों के बारे में

वेब ट्रैफ़िक के आंकड़ों को इकठ्ठा और विश्लेषित करने वाली सिमिलरवेब इकलौती कंपनी नहीं है, और न ही इन आंकड़ों को ‘अंतिम तौर पर’ निर्णायक माना जा सकता है, चूँकि यह आँकड़े सिमिलरवेब की सीमित, मुफ़्त सेवा का प्रयोग कर इकट्ठे किए गए हैं।

पर इन तमाम सीमाओं के भीतर भी यह आंकड़े किसी भी विवेकशील व्यक्ति को यथास्थिति का भान कराने के लिए पर्याप्त हैं।

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