कश्मीर में जिहाद को रोकने के लिए अपनाने होंगे ‘out of the box’ विकल्प

विस्फोटक भरे वाहन टकरा देने की टैक्टिक भले ही डेढ़ दशक पुरानी हो चुकी लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी पुनरावृत्ति नहीं हो सकती।

पुलवामा में CRPF के काफिले से 350 किलो विस्फोटक से लदे एक वाहन को टकरा कर 40 से अधिक जवानों की प्राण लेकर जिहादियों ने पुनः अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं। हालाँकि ऐसी वारदातें पहले भी विदेशों में हो चुकी हैं लेकिन उन्हें ‘Lone Wolves’ कहकर भुला दिया गया है। ऐसे ‘लोन वुल्फ’ या अकेले छुट्टा भेड़िये आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए स्वतः प्रेरित होते हैं। इन्हें प्रेरणा मिलती है सोशल मीडिया और अन्य वेबसाइट पर निरंतर फैलते मज़हबी उन्मादी ज़हर से।

महत्वपूर्ण यह है कि किसी विस्फोटक भरे वाहन को ले जाकर भिड़ा देना, हमला करने का सबसे आसान तरीका होता है और यह पहले में भी कश्मीर में आज़माया जा चुका है। इसे Suicide Vehicle Borne Improvised Explosive Device (SVBIED) का नाम दिया गया है। संदीप उन्नीथन लिखते हैं कि यह तरीका लेबनानी गृह युद्ध में विकसित हुआ था जब अक्टूबर 1983 में बेरूत में इस्लामी जिहादी संगठन ने 241 अमरीकी मरीन सैनिकों की हत्या कर दी थी।

कश्मीर में पाकिस्तान पोषित आतंकवादी इस प्रकार की वारदातों को नब्बे के दशक में और पुनः 2001 से 2005 के बीच भी अंजाम दे चुके हैं। अप्रैल 2003 में जैश-ए-मुहम्मद ने फिदायीन हमले में एक विस्फोटक भरी कार को श्रीनगर में ऑल इंडिया रेडिओ स्टेशन के गेट से टकरा दिया था और वह धमाका इतना तीव्र था कि कार का इंजन कुछ सौ मीटर दूर स्थित एक ब्रॉडकास्टर के दफ्तर में जा कर गिरा था।

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इस प्रकार की वारदात एक झटके में अंजाम तो दी जाती हैं लेकिन इसकी तैयारी बहुत पहले से की जाती है। भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री लाना, उसे वाहन पर असेम्बल करना, कई दिन पहले से इलाके की रेकी करना और पूरा प्लान बनाने में अच्छा-खासा समय लगता है। यह स्थानीय सहायता के बिना संभव ही नहीं है।

आतंकवादियों ने विस्फोटक भरे वाहन से हमला करने की रणनीति करीब डेढ़ दशक पहले से नहीं अपनाई थी। संभवतः इसीलिए सुरक्षा बलों से चूक हुई। वरिष्ठ विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल अता हसनैन (सेवानिवृत्त) लिखते हैं कि ऐसे में गुरुवार की घटना को पूरी तरह से इंटेलिजेंस फेल्योर नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह घटना अपने आप में बहुत सारे सवाल खड़े करती है।

पहली बात तो यह कि इंटेलिजेंस का दायरा केवल विभिन्न इंटेलिजेंस एजेंसी के अधिकारियों तक ही क्यों सीमित रहे? कश्मीर की पूरी समस्या ही इंटेलिजेंस जुटाने और उसपर एक्शन लेने से संबंधित है। ज़्यादा मात्रा में मिलने वाली सूचनाएँ या कच्ची जानकारी (raw intelligence) में से कार्रवाई के लायक (actionable intelligence) सूचनाएँ निकालना एक चुनौती होती है। इंटेलिजेंस जुटाने के लिए कश्मीर में विभिन्न एजेंसियाँ दो प्रकार के एजेंट्स का उपयोग करती हैं।    

एक होते हैं डबल एजेंट जो सीमा पार पाकिस्तान के कब्जे वाले अड्डों में घुलमिल जाते हैं। उनसे हमें जो सूचनाएँ मिलती हैं वे अत्यंत गोपनीय होती हैं और दीर्घकालिक परिणाम देने वाली होती हैं। दूसरे होते हैं डुअल (dual) एजेंट जो पैसा लेकर तात्कालिक सूचना देते हैं। ये हमारे देश के इंटेलिजेंस अधिकारी नहीं होते। यदि जिहादी गुटों ने इनको ज्यादा पैसा दिया है तो ये सुरक्षा बलों की जानकारी उनको दे देते हैं। इंटेलिजेंस जुटाने का इस प्रकार का खतरनाक खेल कश्मीर में खेला जाता है।

कुल मिलाकर आतंकियों से लड़ने के लिए हमारी रणनीति आक्रामक (offensive) या प्रतिकारात्मक (counter offensive) होती है। लेकिन असली समस्या बंदूकधारी आतंकवादी नहीं हैं। समस्या है कश्मीर के नागरिकों की आतंकियों से साठ-गाँठ की संभावना। सेना और अन्य सुरक्षा बल इसे समाप्त करने के लिए बहुत सारे काम करते हैं। भारतीय सेना अस्पताल से लेकर स्कूल तक चलाती है। बाढ़ में तो कश्मीरियों को सेना ने अपने कंधों पर ढोया था, फिर भी कश्मीरी युवा बहक जाते हैं। इसका कारण है कि हम अपनी इंटेलिजेंस प्रणाली को सुधारने के लिए ‘आउट ऑफ़ द बॉक्स’ जाकर नहीं सोचते।

जनरल अता हसनैन ने ही एक बार कहा था कि हमें कश्मीर में लगभग 5000 ‘सूचना योद्धा’ अर्थात ‘information warrior’ तैनात करने चाहिए। इनकी आयु 25 से कम होनी चाहिए और इन्हें एक शोध संगठन के अधीन काम करना चाहिए जिसमें कश्मीर मामलों के जानकार, मनोवैज्ञानिक, और इस्लाम के जानकार शामिल हों। अमरीकी सेना ऐसे ‘सूचना-लड़ाकों’ को संवेदनशील इलाकों में तैनात करती है।

अब समय आ गया है कि हम केवल offensive या counter offensive न होकर ‘Subversive Measures’ अपनाएँ। इंटेलिजेंस प्रणाली में बड़े फेरबदल की आवश्यकता है। हमें ऐसे अधिकारी चाहिये जो कश्मीर की आब-ओ -हवा में घुल मिल जाएँ और वहाँ के नागरिकों के अंदर की मज़हबी कट्टरता को ‘dilute’, ‘manipulate’ और अंततः ‘subvert’ करने का कार्य करें। कोई संस्था वहाँ जमीन लेकर प्रवचन देने के लिए आश्रम तो बना नहीं सकती इसलिए यह काम इंटेलिजेंस एजेंसियाँ ही कर सकती हैं।

सबसे पहले इंटेलिजेंस एजेंसियों के बजट में वृद्धि करने की आवश्यकता है। आंतरिक सुरक्षा के लिए वर्ष 2017 में इंटेलिजेंस ब्यूरो का बजट मात्र ₹1577 करोड़ था। एक ऐसी काउंटर इंटेलिजेंस एजेंसी जिसके कंधों पर पूरे देश में आतंकी घटनाओं को रोकने का दारोमदार है और जिसके लिए कश्मीर सबसे बड़ी चुनौती है उसके लिए यह बजट बहुत ही कम है। विभिन्न इंटेलिजेंस एजेंसियों में कश्मीर में सर्वाधिक सक्रिय इंटेलिजेंस ब्यूरो है। लेकिन इन्हें किसी को गिरफ्तार करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। ये जम्मू कश्मीर पुलिस, सेना या CRPF को सूचना भर देते हैं जिसके आधार पर कार्रवाई होती है। ऐसे में आईबी को अधिक अधिकार और साधन सम्पन्न करने की आवश्यकता है।

आउट ऑफ़ द बॉक्स विकल्पों में अत्याधुनिक तकनीक जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग भी करना होगा। आधुनिक तकनीक जैसे बिग डेटा एनालिटिक्स की सहायता से आतंकवादी घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने के प्रयास पहले भी किये जा चुके हैं। अमरीका की मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वी एस सुब्रमण्यन ने ऐसी एल्गोरिदम की खोज की है जिससे उन्होंने इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर ए तय्यबा जैसे संगठनों की हरकतों की भविष्यवाणी की थी। वे इसे SOMA और Temporal Probabilistic Rules कहते हैं। इनकी सहायता से प्रोफेसर सुब्रमण्यन ने 2013 में नरेंद्र मोदी की पटना रैली में हुए बम धमाकों की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी।

इस प्रकार के तरीकों का प्रयोग करना आज समय की मांग है। विस्फोटक भरे वाहन टकरा देने की टैक्टिक भले ही डेढ़ दशक पुरानी हो चुकी लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी पुनरावृत्ति नहीं हो सकती। हमें यह समझना होगा कि कश्मीर में प्रॉक्सी वॉर चरम पर है। इसके कोई लिखित नियम नहीं हैं। सुरक्षा बलों पर हमला कर देश के मनोबल को गिराने का काम कई दशकों से चल रहा है। यह थका देने वाला मनोवैज्ञानिक युद्ध है अतः इससे लड़ने के उपाय भी पारंपरिक नहीं हो सकते।  


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