Saturday, April 20, 2024
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अ शिगूफा अ डे, मेक्स द सीएम हैप्पी एंड गे: केजरीवाल सरकार का घोषणा प्रधान राजनीतिक दर्शन

घोषणा प्रधान शासन के मूल में शायद यही दर्शन है कि यदि घोषणाओं और वादों को पूरा कर दिया गया तो एक दिन सारी संभावित घोषणाएँ ख़त्म हो जाएगी और यदि ऐसा हुआ तो दल के राजनीतिक अस्तित्व का क्या होगा?

अ शिगूफा अ डे, मेक्स द सीएम हैप्पी एंड गे। एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कहावत की इस पैरोडी में अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक और प्रशासनिक दर्शन को एक वाक्य में समेट देने की क्षमता है। शिगूफा प्रधान उनका शासन पिछले कई सालों से यही करता आ रहा है। वे अपनी घोषणाओं से समय-समय पर दिल्ली की जनता को चमत्कृत करने का काम करते रहते हैं। जब नहीं कर पाते तो पंजाब, गोवा, गुजरात और ऐसे ही अन्य राज्यों की जनता को चमत्कृत करने निकल पड़ते हैं। इन राज्यों में भी उनका सारा प्रयास बिजली के इर्द-गिर्द रहता है। घोषणाएँ और वादे बिजली से शुरू होकर बिजली की गति से उसी पर ख़त्म होते हैं। वे जहाँ जाते हैं वहाँ की जनता को बताते हैं कि पूरे देश में सबसे महंगी बिजली उसी राज्य में है। वहाँ की जनता को चमत्कृत करके दिल्ली लौटते हैं और दिल्ली वालों को चमत्कृत करने का प्रयास नए सिरे से करते हैं।  

वैसे दिल्ली में भी उन्होंने बिजली की इसी महंगाई से बात शुरू की थी और चूँकि अपनी घोषणाओं की बिक्री में सफल रहे इसलिए वहाँ घोषणाएँ बिजली से आगे ले जाकर पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा पर भी कर लेते हैं। यह अलग बात है कि फ्री पानी कितना उपलब्ध है यह जगजाहिर है। अपने वादों और घोषणाओं के लंबे सिलसिले में उन्होंने पहले दिल्ली को सिंगापुर बनाने का वादा किया। बाद में शायद उन्हें लगा कि वादा पूरा करना मुश्किल है तो दिल्ली को लंदन बनाने का वादा किया। चूँकि उनके अंदर वादे भूल जाने का विशेष गुण है इसलिए उनके लिए वादे करने में सुभीता रहता है। दिल्ली वासियों को उनके घर की टोंटी में पीने का पानी देने का वादा वे लगभग हर साल करते रहे हैं। यमुना की सफाई करने का वादा भी लगभग हर साल करते रहे हैं। उनके अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में मोहल्ला क्लिनिक वाले मॉडल को अमेरिका में लागू करने का प्रयास हो रहा है।


हाल में मानसून की वजह से दिल्ली में शुरू हुए पानी के जमाव को लेकर सोशल मीडिया पर मीम आने शुरू ही हुए थे कि शिगूफों की अपनी सिलसिलेवार कहानी में अब उन्होंने एक नया शिगूफा जोड़ दिया है। उन्होंने Dilli@2047 नाम से एक प्लेटफार्म लॉन्च किया है जिसका उद्देश्य दिल्ली सरकार और CSR और अन्य परहितकारी संस्थानों (मूलतः एनजीओ पढ़ें) के बीच एक साझेदारी विकसित करना होगा। केजरीवाल ने अफसरशाही से स्टडी लीव लेकर एनजीओ बनाया और आज दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं पर शायद एनजीओ के प्रति उनके मन में जो स्थान है उससे निकल पाना उनके लिए असंभव सा लगता है। दिल्ली जैसे छोटे से राज्य में जहाँ शासन प्रणाली में बहुत सी जिम्मेदारियाँ केंद्र सरकार के पास हैं, उसमें अपनी योजनाओं को लागू करने में दिल्ली सरकार को एनजीओ की क्या आवश्यकता है?  

उन्होंने साथ ही यह घोषणा की है कि वे दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय अब सिंगापुर की प्रति व्यक्ति आय तक ले जाएँगे। दिल्ली को सिंगापुर बनाने वाली घोषणा केवल घोषणा रह गई तो अपनी नीतियों में सिंगापुर की एंट्री एक बार फिर प्रति प्रति व्यक्ति आय के बहाने कर दिया। घोषणा प्रधान शासन के मूल में शायद यही दर्शन है कि यदि घोषणाओं और वादों को पूरा कर दिया गया तो एक दिन सारी संभावित घोषणाएँ ख़त्म हो जाएगी और यदि ऐसा हुआ तो दल के राजनीतिक अस्तित्व का क्या होगा? 

दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय सिंगापुर के स्तर तक ले जाने के अलावा उन्होंने दो और महत्वपूर्ण घोषणाएँ की। पहली घोषणा यह है कि दिल्ली साल 2048 के ओलंपिक का आयोजन करने की मंशा रखती है और दूसरी घोषणा यह थी कि अगले चुनाव से पहले हर घर में पीने का पानी पहुँच जाएगा। इसके अलावा अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सड़कों को यूरोप की सड़कों सा बनाना चाहते हैं। प्रश्न यह उठता है कि साल 2021 में भी यदि हमारी सरकारें अपने लिए स्तर भी बाहरी देशों के अनुसार बनाना चाहती हैं तो फिर यह सोच क्या औपनिवेशिकता के प्रति हमारी मानसिक गुलामी को नहीं दर्शाती? पीने के पानी को लेकर केंद्र सरकार ने अपनी योजना की घोषणा कर ही रखी है जिसे समय पर पूरा करने का काम चल रहा है। ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि राज्य सरकार की घोषणा का क्या अर्थ है?  

हो सकता है अरविंद केजरीवाल की ये घोषणाएँ अगले दिल्ली महानगर पालिका चुनावों को ध्यान में रखकर की गई हों पर इनमें जो सबसे महत्वपूर्ण घोषणा है वह सरकार और एनजीओ के बीच साझेदारी को लेकर है। प्रश्न यह किया जाना चाहिए कि यह साझेदारी किस तरह की रहेगी और ऐसी साझेदारी के पीछे दिल्ली सरकार की मंशा क्या है? यह एक राज्य सरकार द्वारा सरकारी नीतियों में एनजीओ स्थान देने का वही खेल तो नहीं जो हम यूपीए की पहली सरकार के समय पर देख चुके हैं? या ये घोषणा केंद्र सरकार की उस नीति के विरोध में है जिसके तहत केंद्र सरकार ने इस तरह के संस्थानों को न केवल कानून और नियम मानने पर मज़बूर कर दिया बल्कि उनकी तरफ जाने वाली सरकारी फंड की धारा को भी रोकने की सफल रही? 

कारण जो भी हो, लगता यही है कि फिलहाल दिल्ली का वादों और घोषणाओं के चक्र से निकलना आसान नहीं क्योंकि केजरीवाल अपनी घोषणा प्रधान राजनीतिक दर्शन को त्यागने के लिए तैयार नहीं दिखते।

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