आज़म चड्डी खान की ज़रूरत है इस देश को, ऐसे लोगों को ज़िंदा रखा जाना चाहिए

मदरसों में जाते कौन हैं? क्या मदरसों में 'अल्लाहु अकबर' का नारा बुलंद करते हुए बाज़ारों में फटने वाले लोग जाते हैं? क्या मदरसों में 500 रुपए के लिए शुक्रवार की नमाज़ के बाद पत्थरबाज़ी करने वाले 7-8 साल के बच्चे जाते हैं?

आज़म खान और असदुद्दीन ओवैसी, दोनों ही, कथित तौर पर पढ़े लिखे लोग माने जाते हैं। माने ही जाते हैं, क्योंकि इनके बयानों से लगता तो नहीं कि वास्तव में पढ़े-लिखे हैं। एक विरोधी नेत्री के अंडरवेयर का रंग बताने से लेकर ग़ैरक़ानूनी उर्दू गेट को ढाहने पर हिन्दू-मुसलमान ले आता है, दूसरे की तो पूरी राजनीति ही यह झूठ बताने में जाती है कि सरकारी नीतियों का लाभ मुसलमानों को नहीं मिल रहा है।

हाल ही में दोनों ने बड़े अजीब बयान दिए हैं। पहले आज़म खान की बात करते हैं जिनका दिमाग ज़्यादा ढीला मालूम पड़ता है। अपनी और अपने पार्टी के अस्तित्व को बचाने के लिए, मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति का वर्षों से सहारा लेकर बचने वाले आज़म खान, जो हर इस्लामी आतंकी द्वारा किए गए हमले पर चुप रहते हैं, आज मदरसों के उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा का उदाहरण देते हुए कहा है कि मदरसों से गोडसे और प्रज्ञा जैसे लोग नहीं निकलते।

ये बिलकुल सही बात है क्योंकि मदरसों में अमूमन हिन्दू धर्म को मानने वाले नहीं जाते, तो वहाँ से गोडसे या प्रज्ञा जैसे प्रकृति तो छोड़िए, नाम वाले भी निकल आएँ तो आश्चर्य की ही बात होगी। फिर मदरसों में जाते कौन हैं? क्या मदरसों में ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा बुलंद करते हुए बाज़ारों में फटने वाले लोग जाते हैं? क्या मदरसों में सड़कों पर 500 रुपए के लिए शुक्रवार की नमाज़ के बाद पत्थरबाज़ी करने वाले सात-आठ साल के बच्चे जाते हैं? क्या सेना की गाड़ियों पर पत्थर, डंडे, रॉड से लेकर बम और रॉकेट लॉन्चर से हमला करने वाले मदरसों में जाते हैं?

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मैं बता नहीं रहा, मैं पूछ रहा हूँ कि आज़म खान जैसे नेता जब पूरे इतिहास से दो नाम निकाल पाते हैं, और उन्हें किसी मजहबी स्कूली व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश करते हैं, तो आप ऐसे चुटकुलों पर हँस भी नहीं सकते क्योंकि ये चुटकुला कोई कुणाल कामरा टाइप का सस्ता कॉमेडियन नहीं मार रहा, ये चुटकुला एक क़द्दावर नेता मार रहा है जो 30 साल से ज़्यादा समय उत्तर प्रदेश की विधायिका का सदस्य या कैबिनेट मंत्री बन कर गुज़ार चुका है।

अगर आज़म खान की बात करें और मदरसों को ले आएँ तो आज़म खान पहले यही बता दें कि ऐसी कौन सी शिक्षा मदरसों में दी जाती है, या नहीं दी जाती है कि मुसलमान समुदाय की मात्र एक प्रतिशत लड़कियाँ बारहवीं के बाद ग्रेजुएशन कर पाती हैं? क्या इसे मुसलमान समाज पर फेंका जाए या फिर मदरसों को तंत्र पर जहाँ के बाद आज के दौर में भी लड़कियों को ग्रेजुएशन तक नहीं करने दिया जाता?

ये सारे आतंकी क्या आरएसएस के स्कूलों में पढ़ते थे जिनके गुनाह साबित हो गए और जिन्हें फाँसी मिल गई? ये मजहबी उन्माद क्या हार्वर्ड में पढ़ाया जाता है कि काले झंडे पर इस्लाम का नाम लिखने वाले लोग भारत की गलियों में उगते और डूबते रहते हैं? ये मजहबी शिक्षा क्या रामकृष्ण मिशन या सरस्वती शिशु मंदिर में मिलती है जहाँ एक समुदाय के अल्लाह और पैग़म्बर के नाम पर बेगुनाहों की जान लेने में आतंकी हिचकिचाते नहीं?

फिर गोडसे का नाम क्यों? गोडसे ने जो किया, उसे उसकी सजा मिली। साध्वी प्रज्ञा पर केस चल रहा है, और अगर वो गुनहगार है तो उसे इसी देश की कोर्ट सजा देगी जिसने सुबह के चार बजे तक अपने दरवाज़े मुसलमान आतंकी की फाँसी रोकने के लिए खोले हैं। और कोई नाम है तो आज़म खान ले आएँ, उसका भी समुचित जवाब दिया जाएगा।

लेकिन आज़म खान अपनी भी घटिया शिक्षा का उद्गम स्थल बता देते ताकि हमें पता तो चलता कि कारगिल को फ़तह करने वाले सैनिकों में हिन्दू और मुसलमान लाने के पीछे की पढ़ाई किस जगह पर होती है। वो बता देते कि किस मदरसे में उन्होंने ऐसी बेहतरीन शिक्षा पाई जहाँ बच्चों की आँखें और विचार इतने बौने हो जाते हैं कि वो स्त्रियों के अंडरवेयर का कलर तक मालूम कर लेते हैं। वो बता देते कि किस मजहबी शिक्षा की जड़ें इतनी खोखली हैं जो मजहबी बयानबाजी में इतना आगे निकल जाता है कि संभल की रैली में मुसलमानों को मुज़फ़्फ़रनगर दंगों का बदला लेने को उकसाता है?

आज़म खान की पहचान ही इस बात से है कि वो निहायत ही घटिया बातें बोलते हैं। वो अगर बेहूदगी न करें तो देश को पता भी न चले कि खुद को मुसलमानों का ज़हीन नेता मानने वाला, और प्रोजेक्ट करने वाला, ये आदमी किस दर्जे का धूर्त है। ये वही आदमी है जो प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पत्नी के अलग-अलग रहने को लेकर घृणित बयान देता है कि जो अपनी पत्नी के साथ न रह सका वो देश के साथ कैसे रहेगा।

अब ये तो पता चले कि ये मदरसा छाप हैं या फिर संघ के विद्यालयों में इनकी ऐसी घटिया सोच विकसित हुई है। आज़म खान जैसे नेता ही मुसलमानों के प्रति फैली दुर्भावना के लिए ज़िम्मेदार हैं। ये व्यक्ति पेरिस में हुई इस्लामी आतंकी घटना को ज़ायज ठहराता है क्योंकि कहीं और किसी दूसरे देश ने पहले मुसलमानों के ऐसा करने को उकसाया।

ऐसे आदमी सिर्फ इसलिए खुले में घूम रहे हैं क्योंकि ये नेता हैं और हमारी सरकारी व्यवस्था में ऐसे लोग इस तरह से बोल सकते हैं। ये वैचारिक दंगाई है जो मज़हब के नाम पर लोगों को उकसाता है, और चाहता है कि दंगे हों ताकि इनकी दुकानें चलें। अगर ऐसा नहीं है तो सरकार द्वारा मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने को लिए बनाई जा रही नीति का स्वागत करने की जगह ये महामूर्ख इसमें गोडसे और प्रज्ञा कहाँ से ले आता है?

आज़म खान जैसे लोग कभी नहीं चाहते कि उनका समुदाय बेहतर शिक्षा पाए क्योंकि मदरसों में अगर दुनिया के समानांतर शिक्षा मिलने लगेंगी तो कोई क्यों पत्थर लेकर सड़क पर खड़ा हो जाएगा? कोई शरीर में बम बाँध कर मज़हब के नाम पर खुद को क्यों उड़ा देगा? शिक्षा बेहतर सोच विकसित करती है। शिक्षा का उद्देश्य मानवता की भलाई होता है, लेकिन उसी शिक्षा के नाम पर अगर मजहबी उन्माद की धीमा ज़हर छोटे बच्चों में डाला जाए तो वो कट्टरपंथी बनेगा और उसे एक मशीन की तरह, अपने कुत्सित विचारों को अमल में लाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

अगर ऐसा नहीं होता तो पत्थरबाज़ी का कलंक किसी एक मज़हब के लोगों के सर पर नहीं होता। अगर ऐसी शिक्षा नहीं दी जाती तो सात साल के बच्चों के चेहरे पैलट गन के छर्रों से नहीं बंधे होते। अगर मजहबी उन्माद न बोया जा रहा होता तो आरडीएक्स से भरी गाड़ी सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले से अब्दुल अहमद डार नहीं मिलता। अगर इस्लाम की हुकूमत लाने की पढ़ाई इन मदरसों में नहीं दी जा रही होती तो हर साल लगभग दो सौ की दर से ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे और ख़िलाफ़त की राह में इस्लामी आतंकी नहीं मर रहे होते।

गोडसे और प्रज्ञा तो दो नाम हैं। मेरे पास तो इसी शिक्षा पद्धति से जुड़े लोगों के इतने नाम हैं कि उन्हें व्यक्तिवाचक संज्ञा की जगह जातिवाचक रूप में बताना पड़ रहा है। लेकिन आज़म खान जैसों का रहना बहुत ज़रूरी है इस देश में। ये लोग अगर नहीं रहेंगे तो समाज के वो नकारात्मक आदर्श गायब हो जाएँगे जिन्हें देख कर माँ-बाप अपने बच्चों को कह सकेंगे कि देखो बच्चे, ऐसा इन्सान मत बनना।

ओवैसी की बेहूदगी पर चर्चा दूसरे आर्टिकल में होगी

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