नागरिकता विधेयक: मुसलमानों को भगाने वाला कानून? नहीं ब्रो, वामपंथी कुत्ते की दुम प्रपंच फैला रहे हैं!

भारत सरकार का यह बिल न्यायोचित, संवैधानिक, और मानवीय मूल्यों के निकटतम है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों के लिए विश्व के अनगिनत देश हैं, वो लोग वैसे देशों की नाव पकड़ कर नारा-ए-जो-भी-होता-है चिल्लाते हुए जा सकते हैं।

इससे पहले कि इस विषय पर कोई चर्चा हो सके, मैं फेसबुक पर से अपने मित्र के एक पोस्ट का जिक्र करना चाहूँगा, जो कि संदर्भ को स्पष्ट करेगा और विषय पर आपके कुछ प्रश्नों का उत्तर देगा। ये पोस्ट मूलतः नितिन त्रिपाठी जी ने शेयर की है, जिसमें समुचित संपादन के बाद नीचे रख रहा हूँ:

“मेरी एक अमेरिका में जन्मी मित्र थीं। शक्ल तो भारतीय थी, लेकिन उन्हें भारत से सख़्त नफ़रत थी। नफ़रत छोटा शब्द है, उन्हें भारत से घृणा थी। ग़लती उनकी भी नहीं थी। उनके पिता जी भारतीय मूल के थे। दशकों पूर्व अंग्रेज़ उनके परिवार को अफ़्रीका लेकर गए। धीमे-धीमे वह युगांडा में बस गए। जैसे भारतीय मेहनती, पराक्रमी होते हैं, तो अपनी मेहनत से उन्होंने भी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ी और युगांडा में उनका बढ़िया व्यवसाय हो गया।

फिर सत्तर के दशक में युगांडा में तानाशाह आया ईदी अमीन। तानाशाह ने सारे भारतीयों की सम्पत्ति ज़ब्त कर उन्हें देश से निकल जाने का हुक्म दिया। इधर भारत में नपुंसक सरकार थी। भारत की सेकुलर सरकार ने इन भारतीयों को भारत वापिस लेने से इंकार कर दिया। यदि वह मुस्लिम होते तो दुनिया के दसियों देश स्वीकार कर लेते (उनके स्टाफ़ के कुछ मुस्लिम खाड़ी देश चले भी गए), पर इनकी समस्या यह थी कि ये हिन्दू भारतीय थे, जिन्हें उनका देश ही वापिस लेने को तैयार नहीं – सेक्युलरिज़म भंग होती थी।

उनके परिवार ने सालों शरणार्थी बन काटा। अंततः इंग्लैंड, अमेरिका जैसे देशों ने दया दिखाई। मित्र का परिवार अमेरिका पहुँचा। एकदम अनजान देश। जब आपकी कर्मभूमि आपको लात मार निकाल दे, और जन्मभूमि स्वीकार करने से इंकार कर दे, उस दुःख की आप कल्पना नहीं कर सकते। वह जो युगांडा में महल में रहते थे, अमेरिका में होटेल में वॉशरूम, लैट्रीन साफ करने वाली नौकरी करने को विवश हुए।पुरुषार्थी थे, बीस वर्षों में अमेरिका में भी होटेल के मालिक बने, लेकिन जिन बच्चों ने अपना बचपन खोया वो भारत को कभी माफ़ नहीं कर पाए।”

आगे नितिन लिखते हैं कि संसद में जब यह विधेयक पास होगा तो भारत के आस-पास बसे हिन्दुओं या उनके ही अंग-प्रत्यंगों, के अनुयायियों के पास घरवापसी का एक विकल्प होगा कि उन पर कोई विपत्ति आए, धर्म के आधार पर उन्हें प्रताड़ित किया जाए, तो वो पूरे विश्व में कम से कम एक देश की तरफ उम्मीद से देख सकते हैं।

क्या है यह बिल

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सरसरी निगाह डालने पर यह बिल भारत के तीन पड़ोसी देशों, अफगानिस्तान, बंग्लादेश, पाकिस्तान से आए हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी और ईसाई धर्मावलम्बियों को, अपने देश में धर्म के आधार पर प्रताड़ित किए जाने पर, भारत की नागरिकता प्रदान करने की बात करता है। इसमें मुसलमान नहीं हैं, क्योंकि ये तीनों देश मुसलमान-बहुल राष्ट्र हैं, और वहाँ मजहबी उत्पीड़न करने वाले लोग या सत्ता भी इस्लामी ही है, तो उन्हें यहाँ की नागरिकता देने का कोई सही कारण नहीं दिखता।

इस विधेयक में कोई समस्या नहीं है सिवाय इसके कि कुछ लिबरलों को ‘मुसलमान’ शब्द की अनुपस्थिति खल रही है। चूँकि मुसलमान शब्द भारतीय राजनीति का एक बहुत बड़ा मुद्दा है तो इस बिल के बारे में तमाम भ्रांतियाँ फैलाई जा रही हैं कि ये मुस्लिम विरोधी है। जबकि, मुसलमान जनता ने इन तीनों देशों में, अपनी सत्ता के माध्यम से, वहाँ के अल्पसंख्यकों पर तरह-तरह के अत्याचार करते हुए, उनकी संख्या को लगातार गिराते हुए, लगभग नगण्य कर दिया है।

पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिन्दुओं की स्थिति बहुत खराब है। उनकी बहू-बेटियों के साथ बलात्कार होते हैं, उन्हें उनके पर्व मनाने पर बहुसंख्यक मुसलमान उन्हें धमकाते हैं, और अगर कुछ और न मिले तो ‘ब्लासफेमी’ कानून को नाम पर उन्हें फाँसी के तख्ते तक पहुँचा देते हैं, जहाँ मुसलमान ने अगर कह दिया कि फलाने ने उनके मजहबी प्रतीकों या पैगम्बरों की निंदा की है, तो सजा-ए-मौत ही मिलनी है।

इज़रायल यहूदियों का देश है। एकमात्र देश जो कहता है कि दुनिया में यहूदी जहाँ भी है, उसके लिए उनके द्वार खुले हैं। सनातनी हिन्दू युगांडा में मेहनत से व्यवसाय बनाता है, और जब उसे वहाँ से सब-कुछ छीन कर भगा दिया जाता है तो भारत उसे नकार देता है। आखिर हिन्दू, जिसने बार-बार इस्लामी आतंकियों और आक्रांताओं के हमले को, अत्याचार को, आगजनी और हिंसा को झेला है, वो अगर दुर्भाग्यवश भारत की सीमा से अंग्रेजों के कारनामों के बाद कहीं और चला गया, वापस आना चाहता है, तो वो कहाँ जाएगा?

मुसलमानों को भारत क्यों दे नागरिकता? जो यहाँ घुस आए हैं बांग्लादेश या म्यांमार से, वो चोरी, डकैती आदि से ले कर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की संभावना रखते हैं, और वो हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं। जो रोहिंग्या मुसलमान किसी राष्ट्र के बौद्ध लोगों को हथियार उठाने पर मजबूर कर देता है, उसे हम भारत का नागरिक बना लें?

मुसलमान तो बड़े ही गर्व से कहते हैं कि आधी पृथ्वी उन्हीं के मजहब के राष्ट्रों से पटी पड़ी है, तो फिर इन राष्ट्रों को आगे आ कर ले जाना चाहिए इन बेचारे मुसलमानों को जिन्हें पाकिस्तान से ले कर म्यांमार तक हर जगह से भगाया जा रहा है! कई बार तो लोग बांग्लादेश या पाकिस्तान के किसी भी वैश्विक सूचकांक पर भारत से ऊपर होने पर यहाँ के कुछ लोग खुशी मनाते हैं, वो लोग आज क्यों परेशान हैं, रोहिंग्या जैसे चले जाएँ उन्हीं देशों में।

क्या भारत आत्महत्या के रास्ते खोल ले?

पूरा नैरेटिव ऐसे गढ़ा जा रहा है कि पहले NRC और अब इस नागरिकता (संशोधन) विधेयक के द्वारा भारत से मुसलमानों को भगाने की कवायद हो रही है। ऐसे लोग प्रपंची और गिरी हुई गुणवत्ता के वैसे जीव हैं जिन्हें मानवमात्र की श्रेणी में रखना अनुचित है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इन दोनों ही तरीकों से भारत के लगभग बीस करोड़ भारतीय मुसलमानों की नागरिकता पर एक सवाल भी नहीं उठाया जा रहा, उन्हें बाहर फेंकने की बात तो रहने ही दीजिए।

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) या राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सरकार इस देश के सही नागरिकों की पहचान करते हुए, घुसपैठियों, और गैरकानूनी रूप से घुसे लोगों की पहचान करेगी और उन्हें यहाँ के तंत्र से बाहर करेगी। ये संख्या सिर्फ असम में 50 लाख, पश्चिम बंगाल में 57 लाख और पूरे देश में लगभग 2 करोड़ बताई जाती है। वहीं रोहिंग्या मुसलमानों की बात करें तो कानूनी रूप से यूएन द्वारा रजिस्टर्ड लोगों की संख्या 14,000 है जबकि गैरकानूनी रूप से रह रहे इन मुसलमानों की संख्या 40,000 के करीब है।

2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में तिब्बत के बौद्ध शरणार्थियों की संख्या लगभग 1,92,000 है, और श्रीलंका से भागे और तमिलनाडु में रहने वाले लोगों की संख्या एक लाख के क़रीब बताई जाती है। पाकिस्तान से, अगर बँटवारे को अलग रखें, आए हिन्दुओं की संख्या लगभग 20,000 है, जिसमें से 13,000 को भारतीय नागरिकता दी जा चुकी है। अफ़ग़ानिस्तान में हिन्दुओं और सिक्खों की संख्या सिमट कर 5000 रह गई है।

घुसपैठिए अगर मुसलमान हैं, जो भारत में बस इसलिए घुस आए हैं क्योंकि यहाँ की सरकारों ने उन्हें ‘वोट बैंक’ बन जाने का मौका दिया, उन्हें राशन कार्ड जारी किए और आज वो असम, त्रिपुरा और बंगाल के कई इलाकों में ‘किंग मेकर’ की भूमिका में हैं। इन घुसपैठियों को निकालना आवश्यक है क्योंकि ये भारतीय मुसलमानों का वो हक मार रहे हैं, जो समस्त भारतीय टैक्सदाताओं के फंड से अल्पसंख्यक कल्याण हेतु जारी किया जाता है। इसलिए, भारत जैसे सीमित संसाधन वाले देश में, जहाँ गरीबी सर्वव्याप्त है, वहाँ हम इन दो करोड़ मुसलमान घुसपैठियों को नहीं रख सकते।

ये लोग छोटे-छोटे समूह में रहते हैं, और जरूरत पड़ने पर इन्होंने पूरी कॉलोनी का घेराव किया है, पत्थरबाजी की है। ये शरणार्थी तो बिल्कुल नहीं हैं, ये चोर हैं, जो किसी पार्टी के लालच के कारण भारत में घुस आए हैं और यहाँ उपद्रव फैला रहे हैं। सब नहीं फैला रहे, लेकिन भारत की इसमें क्या गलती है? मुसलमान हो, अपने देश में मन नहीं लग रहा, तो इस्लामी देश में जाओ जो तुम्हारी संस्कृति के करीब है। यहाँ जगह नहीं है।

कुछ स्मार्टीपैंट्स जो विधेयक में मजहब ढूँढ रहे हैं

‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राहुल कँवल काफी ‘डिस्टर्ब’ हो गए हैं, मानसिक तौर पर। उसी परेशानी में उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और धार्मिक प्रताड़ना को किनारे रख कर इसे हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा बना दिया। इन्हें हिन्दू-मुसलमान करने में बहुत आनंद मिलता है। हाल ही में इन्होंने बीएचयू में डॉ फिरोज खान की धर्म विज्ञान संकाय में नियुक्ति को ले कर आंदोलन कर रहे छात्रों को कलंक कह दिया था। लेकिन, मेरे हिसाब से पत्रकार जब पत्रकारिता छोड़ कर, अनभिज्ञता या अज्ञानतावश साम्प्रदायिक बातों को हवा दे कर दंगे कराने की पृष्ठभूमि तैयार करने लगे तो उसे कलंक कहा जाना चाहिए।

वैसे ही क्लास के मॉनिटर का चुनाव जीतने पर खुश होने वाले वामपंथियों के नेता सीताराम येचुरी ने आदतानुसार छींकते-खाँसते हर बात में संविधान घुसाते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया। ये वामपंथी राष्ट्र की अवधारणा को क्यों तवज्जो देंगे! इनके युवा नेता केरल, बस्तर, पंजाब और कश्मीर को आजादी दिलाने पर तुले हैं, और इन्हें संविधान की याद आ रही है। अगर भारत राष्ट्र की चिंता है तो सारे वामपंथियों को झंडे का रंग भगवा कर के, उस पर लाल रंग से ‘ॐ’ लिखवा कर, नई पार्टी का गठन कर के ‘राम-नाम’ के जाप में शामिल हो कर आठ वर्षों के शुद्धीकरण के बाद नई पार्टी बना कर लोकतंत्र के पर्व में हिस्सा लेना चाहिए। आप कहेंगे, “अजीत जी, लेकिन आपने इनके प्रश्नों का उत्तर तो दिया ही नहीं!” मैं कहूँगा, “वामपंथी चम्पकों को लिए मेरे पास कटुपहास के अलावा कुछ है ही नहीं!”

किसी को ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ की याद आ रही है, कोई ‘ईथोस’ की बात करता दिख रहा है! भारत ने आखिर किसे शरण नहीं दी? मेरे सहयोगी, ऑपइंडिया के सब-एडिटर, मृणाल ने इसी विषय पर जो लिखा वो बिल्कुल सटीक है:

“अगर वो भारत के मूल्यों को ही जानना चाहते हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि भारत के शासक हमेशा ठोक-बजाकर ही शरण देते थे। जब पारसी ईरान में उन्हीं मुसलमानों के अत्याचार से जान बचाकर भारत पहुँचे, जिन्हें नागरिकता के लिए मना करने को ‘इंडिया टुडे’ के कार्यकारी संपादक साहिल जोशी जी भारत की अवधारणा के खिलाफ बता रहे हैं, तो भारत में जिस राजा के पास वे पहुँचे, उसने ऐसे ही शरण नहीं दे दी- उसने पहले उनके मज़हब को समझा, फिर उनके सामने शर्त रखी कि मूल उपासना-पद्धति के अलावा बाकी सारी संस्कृति हिन्दू ही अपनानी पड़ेगी, फिर शरण दी

महाभारत में भी जब अपना रथ निकालने में जुटे कर्ण ने सुविधानुसार शरणागति माँगी, तो भगवान श्री कृष्ण ने शर्त रखी कि वह हथियार छोड़ दे और हमेशा जिस राजा युद्धिष्ठिर की शरण में आ रहा है उसकी दासता में रहना स्वीकार करे। क्या साहिल जोशी इसका समर्थन करेंगे कि शरणार्थी मुसलमानों से वंदे मातरम गाने, कभी फिलिस्तीन का समर्थन न करने, कश्मीर में हिन्दुओं की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों का विरोध न करने, हिन्दुओं का मतांतरण न करने और हिन्दू लड़कियों से शादी करने पर उनका मज़हब न बदलवाने पर, लिखित और हमेशा के लिए समर्थन की शर्त रख दी जाए?”

ये कहिएगा तो वो भड़क जाएँगे कि ‘वंदे मातरम्’ कहना या न कहना ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और निजी चुनाव है। लेकिन मेरा तर्क यह है कि अगर किसी राष्ट्र में शरण ले कर, या पैदा होने के बाद, यहाँ की धूल-हवा-पानी में स्वयं को पाने के बाद, अगर यहाँ के राष्ट्रीय प्रतीकों या गीतों का सम्मान तुमसे नहीं हो पा रहा, तो फिर वहीं जाओ जहाँ ऐसी चीजों की अवधारणा नहीं है।

क्या यह सेकुलरिज्म के खिलाफ है?

सेकुलर शब्द की व्याख्या यह नहीं है कि दुनिया में मुसलमान कहीं भी हो, वो भारत में नागरिक बनने आ सकता है। सेकुलर शब्द की परिभाषा यह नहीं है कि भारत अपनी बहुसंख्यक आबादी को भूल जाए और दो करोड़ घुसपैठियों को यहाँ नागरिक बना दे, जो कि बाद में कहाँ बम फोड़ेंगे, कहाँ डकैती डालेंगे, कहाँ आतंकियों को समर्थन देंगे, कहाँ सजायाफ्ता मुसलमान आतंकवादी के जनाजे में शामिल होंगे… इनका हमें अंदाज़ा नहीं रहे!

भारत की जनसंख्या में दो करोड़ तो रहने दीजिए, लाख लोगों को भी जोड़ने की जगह नहीं है। कुछ हजार हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, सिख, ईसाई आदि जो अपने धर्म के नाम पर इन तीन देशों के मुसलमानों द्वारा सताए गए हैं, उन्हें भारत छोड़ कर और कौन नागरिकता देगा? साथ ही, इन देशों में किसी हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई या सिख ने शरीर पर बम बाँध कर खुद को बाजार में फोड़ा नहीं। इनकी आस्था और संस्कृति भारतीय संस्कृति और आस्था के करीब है। ईसाई को छोड़ दिया जाए, तो बाकी धर्म के लोगों को लिए पूरी दुनिया में कहीं भी जाने का विकल्प नहीं है। क्या भारत अपनी ही धरती पर जन्मे धर्म के लोगों को मरने के लिए छोड़ दे?

मुसलमानों को कौन सता रहा है? पाकिस्तान में या बांग्लादेश में मुसलमानों को सताने वाले भी मुसलमान ही हैं। उनके पास तो 1947 में ये विकल्प था कि वो भारत आएँ या मुसलमानों के लिए अलग देश में जाएँ। अब, जब उधर चले गए, भारत ने तुम्हें रहने की जमीन दी, पैसे दिए, 71 में आजाद भी कराया, फिर अगर, अब भी शिया-सुन्नी, अहमदिया-सुन्नी खेल रहे हो, तो इसमें भारत तुम्हारी मदद क्यों करे? जिधर देख कर नाम जपते हो, उधर ही नाव का पाल खोल कर निकल लो।

सेकुलर होने का मतलब यह नहीं है कि दुकान खोल कर बैठ जाएँ कि आओ भाई, पर्चा भरो, भारतीय बनो। सेकुलर हम हैं, भारत में हैं, बीस करोड़ मुसलमानों के साथ रह रहे हैं। कोई मुसलमान कहीं कमलेश तिवारी की गला रेत कर हत्या कर देता है तो हिन्दू सारे मुसलमानों को उसका गुनहगार नहीं मानता। कोई मुसलमान किसी हिन्दू का बलात्कार करते वक्त उसे ‘भगवान नहीं, अल्लाह के नाम पर रहम की भीख माँग’ कहता है, तो हिन्दू लोग सारे मुसलमानों को उस घृणित सोच से सना हुआ नहीं बताते। कुछ मुसलमान सिर्फ हिन्दुओं को प्रेम जाल में फँसा कर, अपने बाप, भाई, या दोस्तों से उसका रेप करवा कर, हत्या कर देता है तो यहाँ का हिन्दू इकट्ठा हो कर सारे मुसलमानों को भगाने की अपील नहीं करता।

वो इसलिए, क्योंकि हिन्दू कहीं भी हो, कट्टर नहीं है। वो सामाजिक अपराध कर सकता है, धार्मिक आतंकवादी नहीं बनता। लेकिन, बांग्लादेशी मुसलमान यहाँ दीमक की तरह फैल रहे हैं, और समाज को खोखला कर रहे हैं। इन्हें बाहर फेंकना समय की माँग है, इसलिए इन्हें नागरिकता देने का तो सवाल ही नहीं उठता। इन्हें चिह्नित कर के घरों से खींच कर बाहर निकाला जाए और इनके देशों की सीमाओं पर छोड़ दिया जाए। उसके बाद इनके लोग क्या करें वो उनका सरदर्द है।

भारत के पास दो करोड़ घुसपैठियों या कई करोड़ ‘इच्छुक’ मुसलमानों को भारत में बसाने के संसाधन नहीं हैं। यहाँ जो 130 करोड़ हैं, उन्हीं को पालने में समस्या है। मुसलमानों को छोड़ कर बाकी धर्म के लोगों के पास भारत छोड़ कर कहीं जाने का विकल्प है नहीं क्योंकि यही उनके पुरखों और देवताओं की भूमि है। अतः, भारत सरकार का यह बिल न्यायोचित, संवैधानिक, तर्कसंगत और मानवीय मूल्यों के निकटतम है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों के लिए विश्व के अनगिनत देश हैं, वो लोग वैसे देशों की नाव पकड़ कर नारा-ए-जो-भी-होता है चिल्लाते हुए जा सकते हैं। गंगा-जमुनी तहजीब के चक्कर में जमुना वैसे भी मृतप्राय हो चुकी है।

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