नागरिकता विधेयक से मुसलमान बाहर: वामपंथियो! हम ‘sick a**hole’ भले हों, लेकिन चलेगी हमारी ही

क्या साहिल जोशी इसका समर्थन करेंगे कि शरणार्थी मुसलमानों से वंदे मातरम गाने, कभी फिलिस्तीन का समर्थन न करने, कश्मीर में हिन्दुओं की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों का विरोध न करने, हिन्दुओं का मतांतरण न करने और हिन्दू लड़कियों से शादी करने पर उनका मज़हब न बदलवाने पर लिखित और हमेशा के लिए समर्थन की शर्त रख दी जाए?

अल्पसंख्यक की परिभाषा क्या है? जो संख्या में ‘अल्प’ हो, कम हो। क्या 20 करोड़ की आबादी होने, देश की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या होने के बाद भी किसी को ‘अल्पसंख्यक’ कहा जा सकता है? अगर हाँ, तो 2-3% ईसाई, 1.5-2% सिख या बमुश्किल एक लाख से भी कम ईरानी, पारसी या यहूदी समुदाय क्या होंगे?

अल्पसंख्यक की अवधारणा के पीछे की विचारधारा को देखें तो उसमें यह पूर्वग्रह है कि जो संख्या में अधिक होगा (यानि ‘बहुसंख्यक’ होगा), ज़ाहिर सी बात है कि अल्पसंख्यक को ही उससे ‘दब’ कर रहना पड़ेगा। इसी पूर्वग्रह से, बिना इसकी ज़मीनी सत्यता जाँचे-परखे, बिना यह देखे कि यह पूर्वग्रह भारत के समकालीन समाज में कितना सच है और कितना गलत, एक पूरा ‘अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय’ बना हुआ है।

इसका काम ही इस दुराग्रह के साथ काम करना है कि जहाँ कहीं हिन्दू और गैर-हिन्दू के बीच विवाद होंगे, वहाँ गैर-हिन्दू के ही न्यायपूर्ण हित खतरे में होंगे। लेकिन भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं पर लागू इसी अवधारणा, कि “प्रताड़ित तो केवल बहुसंख्यक कर सकता है, अल्पसंख्यक नहीं”, का इस्तेमाल जब नागरिकता अधिनियम संशोधन विधेयक में इस्तेमाल होता है, तो लिबरल गिरोह और पत्रकारिता के समुदाय विशेष को याद यह आने लगता है कि नहीं-नहीं, प्रताड़ित तो हिन्दू-मुसलमान-सिख-ईसाई सभी हो सकते हैं- बशर्ते वे भारत के नागरिक न हों। भारत के नागरिक बनने के बाद हिन्दू हुए तो दुष्ट, शोषक और सताने वाले, गैर-हिन्दू हुए तो बेचारे, शोषित, सहानुभूति के पात्र।

सबसे पहला मानदण्ड- भारत के हितों की रक्षा

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भारत के हर एक कानून का सबसे पहला मानदण्ड भारत की, यहाँ रह रहे नागरिकों, और यहाँ की मूल संस्कृति की रक्षा होता है- चाहे यह किसी कानून में अलग से लिखित हो या न हो। आज भारत हर तरफ़ से (चीन और श्री लंका को छोड़कर) कट्टरपंथी इस्लामियों, जिहादी मुसलमानों के आतंकी संगठनों से घिरा हुआ है। पाकिस्तान में तो पूरा एक देश ही उन्हें अपना कहर बरपाने के लिए मिला हुआ है, अफ़ग़ानिस्तान में भी तालिबान को अमेरिका की पूरी ताकत केवल सत्ता के मुहाने से दूर रख पा रही है, और बांग्लादेश में भी सत्ता चाहे जिसकी आए-जाए, इस्लामी प्रभुत्व और जनसंख्या में हिस्सेदारी बढ़ते ही जा रहे हैं, गैर-मुस्लिमों की आबादी कम हो रही है, और देश कट्टरपंथ-कठमुल्लावाद की ही गर्त में और गहरा धँसता जा रहा है। 

ऐसे में जब हमें पता है कि बाहर से आना चाह रहे किसी एक समुदाय के लोग एक बहुत ही हिंसक और भयानक विचारधारा के समर्थक हैं, और उनके इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के साथ गहरे मज़हबी और सांस्कृतिक ताल्लुक हैं, तो उन्हें ला कर यहाँ की कमोबेश शांतिप्रिय आबादी को कट्टरपंथ की ओर धकेलने की ज़मीन तैयार करने का क्या औचित्य है? यह भारत के हितों के खिलाफ है, खतरनाक है- और अपने न्यूनतम हितों (अपनी वर्तमान आबादी की शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करना) किसी भी विदेश नीति या विदेशी के प्रति नीति का पहला दायित्व होता है।

यह खतरा किसी भी अन्य गैर-इस्लामी समुदाय के साथ नहीं होता है- न ही हिन्दू ‘जय श्री राम’ कह कर छाती पर बाँधे हुए बम बाज़ार में फोड़ लेते हैं, क्योंकि रामायण में राम ने गैर-हिन्दुओं की हत्या का आदेश दिया हो, न ही बौद्ध, सिख या ईसाई किसी अन्य देश में अपने पंथ के लोगों के मुद्दे पर भारत में मोपला सामूहिक हत्याकाण्ड, या फिलिस्तीन के समर्थन में अमर जवान ज्योति पर हमला जैसा कुछ कर दें, इसका खतरा भारत के इतिहास में हुआ है। जैन तो खैर बेचारे ज़िंदगी भर इंसान क्या, किसी चींटी को भी चोट न लगे, ऐसे बच-बचाकर चलते हैं, और सल्लेखना कर बुढ़ापे में प्राण भी शांति से ही त्याग देते हैं।

अतः यह कहना कि किसी के साथ हो रही कथित प्रताड़ना को रोकने के लिए भारत अपनी खुद की शांति और सुरक्षा को खतरे में रख ले, यह साफ़ तौर पर भारत के हितों के विरोध की पैरवी करना होगा- जैसा कि राहुल कँवल कर रहे हैं। 

आस्था के आधार पर नागरिकता नहीं तय हो रही, खतरे का आकलन हो रहा है 

पता नहीं वामपंथी गैंग के लोगों को सही में कानून पढ़ना-लिखना नहीं आता, या इन्हें ऐसा लगता है कि बाकी जनता अनपढ़-मूर्ख है, जो ऐसी अनर्गल बातें करते फिर रहे हैं कि नागरिकता का आधार आस्था को बनाया जा रहा है। 

आस्था को खतरे के आकलन का आधार बनाया जा रहा है, न कि नागरिकता का। जब कोई भी देश किसी भी बाहरी को अपने यहाँ का नागरिक या स्थाई निवासी बनने की अनुमति देता है तो इसमें हमेशा एक जोखिम होता है- पता नहीं वह इंसान इस देश के नियम-कायदे-कानून, सभ्यता, नागरिक मूल्य और संस्कृति इत्यादि के साथ सामंजस्य बिठा पाएगा या नहीं। अगर ऐसा लगता है कि हाँ, प्रार्थी ऐसा कर सकता है, तो एक सतर्कता बरतते हुए जोखिम लेकर उसे नागरिकता दे दी जाती है। 

लेकिन अगर इन तीन देशों के मुस्लिम प्रार्थियों पर गौर करें तो एक समाज, एक समूह के तौर पर उन्होंने अपने व्यवहार में ऐसा कुछ नहीं किया जिससे भारत आश्वस्त हो सके कि वे भारत के बहुलतावाद में सामंजस्य बिठा पाएँगे। तीनों ही देशों में हिन्दू ही नहीं, सभी गैर-मुस्लिम समुदाय असुरक्षित हैं और संख्या में सिकुड़ रहे हैं, इन देशों में जिहादियों को स्थानीय लोगों का समर्थन है, भारत-विरोधी बातें करने वाले ही पाकिस्तान में तो हमेशा चुनाव में जीतते हैं, और अफ़ग़ानिस्तान-बांग्लादेश में भी भारत के समर्थक नेता को शक की निगाह से ही देखा जाता है। तो ज़ाहिर है कि इन देशों के बहुसंख्यक समुदाय, जिसे खुश करने के लिए भारत-विरोधी रवैया इन देशों के नेता रखते हैं, का मिजाज़ भी भारत-विरोधी ही है। तो ऐसे में सवाल फिर से लौटकर यह आ जाता है कि भारत ऐसे भारत-विरोधी मिजाज़ का प्रदर्शन करने वालों को भारत का नागरिक बनाने का खतरा क्यों ले?

भारत का ‘फैब्रिक’ और ‘ईथोस’ आत्महत्या पर नहीं टिके 

आजतक और इंडिया टुडे के कार्यकारी सम्पादक साहिल जोशी का कहना है कि इस बिल से भारत का ‘फैब्रिक’ बदल जाएगा, भारत के ‘ऐथोस’ के खिलाफ है यह बिल। उनके लिए शायद यह बहुत बड़े धक्के की और चौंकाने वाली बात होगी, लेकिन भारत के किसी ‘फैब्रिक’ या ‘ऐथोस’ में आत्महत्या को बढ़ावा देने का ज़िक्र नहीं है- और जैसा कि ऊपर प्रदर्शित किया गया है, जिस समुदाय से जिहादी और आतंकवादी निकल रहे हैं, उसकी संख्या भारत में गैर-ज़रूरी तरीके से बढ़ाना आत्महत्या ही है। हाँ, अगर भारत से गैर-मुसलमानों, खासकर कि हिन्दुओं, के खात्मे के एजेंडे को ही वे भारत का फैब्रिक, उसका ‘ऐथोस’ मानते हैं तो बात अलग है। यह सेक्युलरासुर, आसुरिक, जड़ संविधान के रूप में एक और ‘पवित्र किताब’-पूजक सरकारी तंत्र का फैब्रिक और ऐथोस हो सकता है, इस देश के जनसामान्य का नहीं। 

अगर वो भारत के मूल्यों को ही जानना चाहते हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि भारत के शासक हमेशा ठोंक-बजाकर ही शरण देते थे। जब पारसी ईरान में उन्हीं मुसलमानों के अत्याचार से जान बचाकर भारत पहुँचे, जिन्हें नागरिकता के लिए मना करने को जोशी जी भारत की अवधारणा के खिलाफ बता रहे हैं, तो भारत में जिस राजा के पास वे पहुँचे, उसने ऐसे ही शरण नहीं दे दी- उसने पहले उनके मज़हब को समझा, फिर उनके सामने शर्त रखी कि मूल उपासना-पद्धति के अलावा बाकी सारी संस्कृति हिन्दू ही अपनानी पड़ेगी, फिर शरण दी। महाभारत में भी जब अपना रथ निकालने में जुटे कर्ण ने सुविधानुसार शरणागति माँगी, तो भगवान श्री कृष्ण ने शर्त रखी कि वह हथियार छोड़ दे और हमेशा जिस राजा युद्धिष्ठिर की शरण में आ रहा है उसकी दासता में रहना स्वीकार करे। क्या साहिल जोशी इसका समर्थन करेंगे कि शरणार्थी मुसलमानों से वंदे मातरम गाने, कभी फिलिस्तीन का समर्थन न करने, कश्मीर में हिन्दुओं की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों का विरोध न करने, हिन्दुओं का मतांतरण न करने और हिन्दू लड़कियों से शादी करने पर उनका मज़हब न बदलवाने पर लिखित और हमेशा के लिए समर्थन की शर्त रख दी जाए? 

संविधान उनके लिए है जो नागरिक बन चुके हैं- उनके लिए नहीं जो बनना चाहते हैं 

स्वाति चतुर्वेदी वायर के लिए लिखतीं हैं, और वायर उन्हें बदले में शायद कुछ मेहनताना देता होगा। अब अगर मैं, जिसने न कभी वायर के लिए लिखा, न कोई लेना-देना, वायर के दफ़्तर में घुस जाऊँ और चिल्लाने लगूँ कि सिद्धार्थ वरदराजन (वायर के सम्पादक) मुझे भी उतना पैसा क्यों नहीं दे रहे जितना स्वाति को मिल रहा है, तो यह माँग पागलपन के अलावा क्या होगी? स्वाति का यह कहना कि यह अधिनियम संविधान का उल्लंघन है, कमोबेश ऐसा ही कथन है।

संविधान देश के वर्तमान  नागरिकों (न कि भावी, इच्छुक नागरिकों) का देश की सरकारी मशीनरी, देश के समाज के साथ अनुबंध होता है। इसका हिस्सा वही इंसान हो सकता है जो इन दोनों पक्षों (सरकार या नागरिक) में से किसी एक का सदस्य बन चुका  हो- वह नहीं, जो बनने का इच्छुक हो। सेक्युलरिज़्म भारत राष्ट्र का अपने देश के लोगों के साथ जो समझौता है, उसका एक हिस्सा है। जब समझौता ही नागरिकता से बाहर के लोगों पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि वे नागरिक बन नहीं जाते, तो उसका कोई हिस्सा अलग से कैसे लागू हो सकता है? 

हिन्दुओं को ‘सेक्युलर इंडिया’ ने दिया क्या है, जो उसकी मौत से चिंतित हों?

हिन्दुओं की जैसी दुर्दशा सेक्युलर भारत सरकार ने कर रखी है, उसमें हिन्दुओं को ‘सेक्युलरिज़्म’ की दुहाई देना वैसे ही है, जैसे कोई किसी नाज़ी यातना शिविर में पड़े यहूदी, चीनी यातना शिविर में बंद उइगर या हान मुस्लिम, इस्लामिक स्टेट के हाथों सर कलम होने का इंतज़ार कर रहे (और गला न रेता जाए, इसकी प्रार्थना कर रहे) ईसाई से यह प्रार्थना करे कि वह अपने शोषकों को जिलाए रखने के लिए कुछ कर दे। क्यों कर दें, भई अशोक स्वाइन?

हमारे मंदिर का चढ़ावा तुम लूटो, हमारे पुजारियों को पगार के नाम पर टुकड़ों से भी कम फेंक कर भूखा मरने पर तुम मजबूर करो, सबरीमाला से लेकर शनि शिगनापुर तक मंदिर तुम्हारा सेक्युलरिज़्म अपवित्र करे, संविधान में अनुच्छेद 25-30 के पंथिक संरक्षण से केवल हम बाहर, RTE के नाम पर आर्थिक बोझ बढ़ाकर स्कूल केवल हमारे बंद हों, और सेक्युलरिज़्म भी हम ही बचाएँ? माथे पर कोई खास अक्षर जो लिखा हुआ था, उसे मिटा चुके हैं हिन्दू।

शशि थरूर की संविधान की जानकारी स्वाति चतुर्वेदी जितनी- दुःखद परन्तु सत्य 

शशि थरूर ने ले-देकर वही घिसी-पिटी “ये संविधान के खिलाफ है” की लाइन दोहरा दी। स्वाति चतुर्वेदी के लिए तो यह कॉलर ऊँची करने वाली बात हो सकती है कि विपक्ष का सबसे चर्चित और सम्मानित सांसद, व मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए चुनौती दे सकने में दूर-दूर तक सक्षम इकलौते चेहरे का संविधान-ज्ञान उनके बराबर है, लेकिन शशि थरूर के लिए इससे ‘बुरे दिन’ हो नहीं सकते। कहाँ आईएफएस अफ़सर, 19 बेस्टसेलर किताबों के लेखक, संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी कुर्सी के एक इंच पास तक पहुँच जाने वाले वे, और कहाँ… स्वाति चतुर्वेदी!! 

जहाँ तक संविधान की भारत की अवधारणा बनाम पाकिस्तान की अवधारणा की बात है, तो शशि थरूर खुद यह कई मौकों पर मान चुके हैं कि गाँधी और नेहरू के “आईडिया ऑफ़ इंडिया” की स्वीकार्यता घटती जा रही है- बल्कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा गाँधी का कोई बड़ा नामलेवा नहीं है, और नेहरू को तो कॉन्ग्रेस भी याद नहीं करती। अगर मोदी गाँधी का नाम न लें तो कुछ सालों में “हिंदुओं को अपना गला प्लेट पर रख कर मुस्लिम भाईयों के आगे हाजिर रहना चाहिए” पढ़ाने वाले गाँधी कब बिसर जाएँगे, किसी को याद भी नहीं रहेगा। नेहरू ने मृत/निर्जीव ढाँचों बाँधों को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा था- यह आध्यात्मिक रूप से सजीव और सप्राण मंदिरों का ही अपमान नहीं था,साथ में इस बात की भी तस्दीक थी कि भारत का प्रधानमंत्री देश की उस करोड़ों जनता से कटा हुआ है, जो एक मंदिर बचाने के लिए आखिरी बच्चे तक पूरा-का-पूरा गाँव मरने-मारने के लिए प्रस्तुत रहती थी। 

तो ऐसे लोगों के आईडिया ऑफ़ इंडिया से तो भारत जितना दूर हो रहा है, हिंदुओं के लिए तो उतनी ख़ुशी की बात है। 

हम ‘sick a**hole’ भले हों, लेकिन चलेगी हमारी ही 

संयुक्ता बासु जैसे लोग सत्ता की, हनक की भाषा ही समझते हैं, इसलिए उन्हें तो केवल इतना जवाब देना ही मुनासिब होगा, “मेरा चौकीदार, मेरी सरकार, मेरी मर्जी।” जब आइएगा वापिस सत्ता में किसी दिन, तो पलटने की हिम्मत या कोशिश कर लीजियेगा। या दो-चार गालियाँ और दे कर देखिए, वो भी बिना स्टार के- क्या पता अमित शाह शर्म और विषाद में ही बिल पलट दें। 

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शरजील इमाम
शरजील इमाम वामपंथियों के प्रोपेगंडा पोर्टल 'द वायर' में कॉलम भी लिखता है। प्रोपेगंडा पोर्टल न्यूजलॉन्ड्री के शरजील उस्मानी ने इमाम का समर्थन किया है। जेएनयू छात्र संघ की काउंसलर आफरीन फातिमा ने भी इमाम का समर्थन करते हुए लिखा कि सरकार उससे डर गई है।

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