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बदल गया भारत पर कॉन्ग्रेस अभी 1990 के दशक में, सत्ता की छटपटाहट के बीच सिब्बल के सवाल कितने प्रासंगिक

प्रश्न यह भी है कि पार्टी आज जिस स्थिति में पहुँची है उसके लिए क्या इस ग्रुप में शामिल नेता जिम्मेदार नहीं हैं? और प्रश्न यह भी है कि इन नेताओं का अपना जनाधार कैसा है? पिछले दो दशकों में जब पार्टी में निर्णय प्रक्रिया पार्टी के संविधान के अनुसार नहीं हुई, तब इन नेताओं ने कुछ क्यों नहीं कहा? तब कुछ क्यों नहीं किया?

पंजाब की राजनीतिक घटनाओं के कारण कॉन्ग्रेस पार्टी में मची अफरा-तफरी ने पार्टी के G-23 ग्रुप को एक बार फिर से प्रासंगिक बना दिया है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे और उसके बाद की घटनाओं को लेकर ग्रुप के प्रमुख नेता कपिल सिब्बल ने सवाल किया है कि पार्टी में फैसले कौन ले रहा है? इसके साथ ही ग्रुप के कई और नेताओं की ओर से बयान आने शुरू हो गए। इधर जब सिब्बल सवाल कर रहे थे तब राहुल गाँधी केरल में कहीं सावरकर और आइडिया ऑफ इंडिया पर की-नोट स्पीच दे रहे थे। सिब्बल के बयान का यह असर हुआ कि उनके घर पर गाँधी परिवार के समर्थक जमा हुए और उनके खिलाफ नारे वगैरह लगाकर उन्हें जल्द ठीक होने की शुभकामनाएँ भी दी। 

इसमें कुछ नया नहीं है। राजनीति में ऐसा होता है। एक नेता के समर्थक दूसरे नेता को पसंद करें, यह आवश्यक नहीं है। सिब्बल के समर्थकों (अगर कहीं हैं तो) को अधिकार है कि वे राहुल गाँधी को पसंद नहीं कर सकते हैं और राहुल गाँधी के समर्थकों को अधिकार है कि वे सिब्बल का विरोध कर सकते हैं। आए दिन कहा जाता है कि लोकतंत्र में विपक्ष का होना ही आवश्यक है। इससे लोकतंत्र मजबूत होता है। मैं तो कहता हूँ कि लोकतंत्र में केवल विपक्ष का ही नहीं विरोध का होना भी आवश्यक है। इससे भी लोकतंत्र में रौनक बनी रहती है। ऐसे में सिब्बल का सवाल और उनके सवाल के विरोध में हुए प्रदर्शन और नारेबाजी से कॉन्ग्रेस पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को फायदा ही पहुँचेगा। 

ऐसी परिस्थिति से कॉन्ग्रेस पार्टी के समर्थक और वोटर भले ही चिंतित होंगे पर लोकतंत्र के ‘आचार्यों’ को खुश होना चाहिए। प्रश्न यह नहीं है कि G-23 ग्रुप के नेताओं द्वारा किए गए प्रश्न सही हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी में जो कुछ भी हो रहा है वह क्या अचानक होने लगा है? पार्टी में बहस और निर्णय प्रक्रिया पिछले बीस वर्षों से क्या उसी तरह लोकतांत्रिक तरीके और परंपराओं के आधार पर चल रही है जैसे एक राजनीतिक दल में चलनी चाहिए?

प्रश्न यह भी है कि पार्टी आज जिस स्थिति में पहुँची है उसके लिए क्या इस ग्रुप में शामिल नेता जिम्मेदार नहीं हैं? और प्रश्न यह भी है कि इन नेताओं का अपना जनाधार कैसा है? पिछले दो दशकों में जब पार्टी में निर्णय प्रक्रिया पार्टी के संविधान के अनुसार नहीं हुई, तब इन नेताओं ने कुछ क्यों नहीं कहा? तब कुछ क्यों नहीं किया? क्या यह सच नहीं है कि आज इसी ग्रुप में शामिल नेताओं में से कुछ का आज से लगभग डेढ़ दशक पहले ऐसा मानना था कि राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए बस बीस कॉलम और संपादकीय काफी होंगे?

दरअसल पार्टी में उत्पन्न आज की परिस्थितियों को एक तरह का संकट केवल इसलिए माना जा रहा है क्योंकि आज पार्टी केंद्र में सत्ता में नहीं है। साथ ही जिन राज्यों में सत्ता में है, वहाँ भी आंतरिक असंतोष की वजह से समस्याओं से घिरी है। पार्टी के भीतर के आंतरिक लोकतंत्र और निर्णय प्रक्रिया पर तब ऊँगली नहीं उठी जब तक पार्टी सत्ता में थी, यह बात अलग है कि पार्टी के चाल चलन और निर्णय वगैरह लेने की प्रक्रिया पिछले दो दशकों से एक जैसी रही है। अंतर केवल इतना है कि पार्टी के कुछ कुशल मैनेजर आज पार्टी के साथ विभिन्न कारणों से नहीं हैं। पर यदि पार्टी केवल इस वजह से बिखरती हुई नजर आ रही है तो यह भी अपने आप में सबूत है कि पार्टी के भीतर निर्णय वगैरह लेने का काम केवल कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित था। 

दरअसल कॉन्ग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर रहने की आदत नहीं है। साल 2014 से पहले जब भी पार्टी सत्ता से बाहर हुई, कोई न कोई तिकड़म करके जल्द से जल्द फिर सत्ता में आ गई। 1997 में भी केवल दो वर्ष सत्ता से बाहर रहने के बाद पार्टी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने में सफल रही थी पर सत्ता वापस नहीं पा सकी थी। आज पाँच वर्षों से अधिक सत्ता में बाहर रहने के बाद और लगातार बदल रहे राजनीतिक परिदृश्य के बावजूद पार्टी सत्ता में वापसी के लिए वही सारे हथकंडे अपनाना चाहती है जो ढाई दशक पहले तक अपनाती थी। समस्या यह है कि भारत लगातार बदल रहा है और पार्टी 1990 के दशक से बाहर नहीं निकल पा रही। बहरहाल सिब्बल के सवाल और उनका विरोध पार्टी को कहाँ ले जाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। 

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