Saturday, May 15, 2021
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संक्रमण काल की राजनीति में निचले पायदान पर उतरी कॉन्ग्रेस: झूठ, अफवाह, फेक न्यूज़ बना हथियार

उत्तर प्रदेश और बिहार ने भी अपने ऑर्डर और उसके साथ एडवांस भी निर्माता कंपनियों को दे दिए हैं। ऐसी शिकायत ओड़िसा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे विपक्ष शासित राज्यों से नहीं आई है पर ऐसा क्यों है कि केवल कॉन्ग्रेस शासित राज्यों से आई?

राहुल गाँधी का वह प्रसिद्ध वक्तव्य कि; पॉलिटिक्स सब जगह है, आपके पैंट और शर्ट में भी है, आए दिन चरितार्थ होता रहता है। लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष के बीच जिस समन्वय की बात अक्सर की जाती है, वह सरल नहीं होता, पर इतना कठिन भी नहीं होता जितना आए दिन हम अपने देश की राजनीति में देखते हैं।

एक आम भारतीय को लगता होगा कि पिछले एक वर्ष से दुनियाँ के अन्य देशों के साथ-साथ भारत जिस महामारी की चपेट में है, उससे लड़ने में जो प्रमुख बातें आड़े आ रही हैं, उनमें स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियाँ ही प्रमुख हैं। पर यदि पिछले एक वर्ष में केंद्र और राज्य के बीच या फिर राजनीतिक दलों के बीच समन्वय के बिंदु देखे जाएँ तो समझ में आएगा कि कैसे राजनीतिक समन्वय का न रहना इस महामारी से लड़ने में एक प्रमुख कारण है।

इस एक वर्ष में विपक्षी दलों द्वारा शासित कई राज्यों और केंद्र सरकार के बीच समन्वय कई बार अपने निम्न स्तर पर दिखाई दिया। लॉकडाउन पर हुए फ़ैसले से लेकर टीकाकरण और मूलभूत सुविधाएँ बनाने की बात पर सरकारों के बीच कई बिंदुओं पर सहमति की कमी नज़र आई। कई राज्यों से प्रवासी मजदूरों का पलायन राजनीतिक समन्वय की इसी कमी का नतीजा था जिसमें कई राज्य सरकारें प्रवासी मजदूरों से अपना पल्ला झाड़ते हुए बरामद हुईं।

इसके अलावा टीके को लेकर विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा शंका व्यक्त करने से लेकर भारत में बनने वाले टीकों के प्रति देश के नागरिकों के मन में अपने बयानों से संदेह पैदा करने का काम भी हुआ। ऐसा भी हुआ कि विपक्ष के कई नेताओं ने कोरोना रोकने के लिए आविष्कार किए गए इन टीकों को भाजपा का टीका तक बता डाला। कई नेता अफ़वाहें फैलाते दिखे जिसका जिक्र केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने भूतपूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को लिखे गए अपने पत्र में भी किया।

जबसे टीकाकरण के तृतीय चरण की घोषणा हुई है तब से बहस और अफवाहों का बाजार फिर से गर्म है। कभी टीके के निर्धारित मूल्यों को लेकर बहस और अफवाहें उड़ाई जा रही हैं तो कभी टीके बनाने वाली कम्पनियों पर आम भारतीय से अनुपयुक्त प्रॉफिट कमाने का आरोप लगाया जा रहा है। पहले से चल रही इन बहसों के बीच एक नया विषय आ गया जिसमें कॉन्ग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने टीकाकरण के तृतीय चरण के अभियान में अपने राज्यों की भागीदारी से इंकार कर दिया है। तृतीय चरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अट्ठारह से लेकर पैंतालीस वर्ष तक के नागरिकों को टीका लगेगा।

तृतीय चरण के टीकाकरण को लेकर जहाँ अन्य राज्यों ने समय पर टीका निर्माताओं जैसे सिरम इन्स्टिटूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक को अपने ऑर्डर दे दिए हैं वहीं पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे कॉन्ग्रेस शासित राज्यों ने इस चरण के टीकाकरण को शुरू करने से इंकार कर दिया है। इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों का कहना है कि वे अपने राज्य में तृतीय चरण इसलिए शुरू नहीं कर सकते क्योंकि टीका निर्माता कंपनियों ने उन्हें टीके का स्टॉक उपलब्ध न होने की जानकारी दी है। इन राज्यों ने केंद्र पर यह आरोप लगाया कि केंद्र ने पहले से ही सारे टीके खरीद लिए हैं जिसके चलते इन राज्यों के लिए टीके बचे ही नहीं हैं।

यह गंभीर आरोप है पर यहाँ प्रश्न यह है कि ऐसा आरोप केवल कॉन्ग्रेस शासित राज्यों से ही क्यों आ रहा है? जब तृतीय चरण के टीकाकरण का निर्णय हर राज्य को एक ही दिन बताया गया तो फिर ऐसा कैसे हैं कि बहुत से और राज्यों ने टीके की खरीद का अपना ऑर्डर निर्माता कम्पनियों को दे दिया पर वही निर्माता कॉन्ग्रेस शासित राज्यों को टीका देने से मना कर रहे हैं?

उत्तर प्रदेश और बिहार ने भी अपने ऑर्डर और उसके साथ एडवांस भी निर्माता कंपनियों को दे दिए हैं। ऐसी शिकायत ओड़िसा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे विपक्ष शासित राज्यों से नहीं आई है पर ऐसा क्यों है कि केवल कॉन्ग्रेस शासित राज्यों से आई?

ऐसे में इसके पीछे राजनीति नहीं तो और क्या है? राज्यों की माँग पर ही केंद्र सरकार ने अट्ठारह और पैंतालीस वर्ष के बीच के नागरिकों के लिए टीकाकरण की रज़ामंदी दी थी, इस शर्त के साथ कि इसका खर्च राज्य सरकारों को उठाना होगा क्योंकि केंद्र सरकार पहले से ही पैंतालीस वर्ष और उससे ऊपर के नागरिकों के लिए टीकाकरण का खर्च उठा रही है।

टीके को लेकर केंद्र सरकार की नीति एक मायने में स्पष्ट रही है जहाँ वह प्राथमिकता की दृष्टि से पैंतालीस वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को हाई रिस्क ग्रुप मानती है और इसलिए इस ग्रुप को पहले टीका देना चाहती है।

अट्ठारह और पैंतालीस वर्ष की उम्र के नागरिकों के टीकाकरण के अलावा विपक्ष और कॉन्ग्रेस के नेता की ओर से विदेशी टीकों के आयात की अनुमति की माँग भी ज़ोर-शोर के साथ उठाई गई थी जिसे केंद्र सरकार ने मान ली थी। जिन भारतीय टीकों के निर्माताओं द्वारा समय पर टीके न दिए जाने का आरोप कॉन्ग्रेस शासित राज्यों के नेता लगा रहे हैं, उन्हीं टीकों के स्तर को लेकर एक कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री और उनके मंत्री पहले बहुत हल्ला मचा चुके हैं। टीके की इस कमी की बात राजस्थान की सरकार ने भी किया है। राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री ने भी तृतीय चरण के टीकाकरण की शुरुआत एक मई से करने में अपनी असमर्थता जताई।

राहुल गाँधी ने एक ट्वीट अपील करके हर कॉन्ग्रेसी को दिन-रात काम करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश भी की पर उसका असर दिखाई नहीं दे रहा।

देश में चीनी वाइरस की दूसरी लहर बहुत तेज रही है और उसकी वजह से हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर उसका व्यापक प्रभाव पड़ा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि राज्य सरकारें अपने दायित्व का पालन करें और नागरिकों को मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराने के अलावा तृतीय चरण के टीकाकरण की शुरुआत अपने-अपने राज्यों में करें। संक्रमण के लगातार बढ़ते ख़तरे को देखते हुए यह आवश्यक है कि यह काम युद्ध स्तर पर हो ताकि देश जल्द से जल्द इस महामारी पर काबू पा सके।

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