2-2 बार सीएम को धूल चटाई, राहुल गाँधी के करीब आते ही 10 महीने में 2 बार हारे

राहुल से करीबी होने की कीमत क्या होती है, रणदीप सिंह सुरजेवाला से बेहतर कॉन्ग्रेस में शायद ही कोई जानता हो। कभी ​हरियाणा के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर देखे जाने वाले 'जाइंट किलर' सुरजेवाला 10 महीनों के भीतर दूसरी बार चुनाव हारे हैं।

कॉन्ग्रेसी हर वक्त गॉंधी परिवार और उसके युवराज राहुल गॉंधी की करीबी हासिल करने के तीन-तिकड़म में लगे रहते हैं। सोनिया गॉंधी जब से पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनीं हैं, तब से राहुल के करीबियों को किनारे किए जाने की चर्चा भी जोरों पर है। लेकिन, राहुल से करीबी होने की कीमत क्या होती है, रणदीप सिंह सुरजेवाला से बेहतर कॉन्ग्रेस में शायद ही कोई जानता हो।

कभी ​हरियाणा के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर देखे जाने वाले ‘जाइंट किलर’ सुरजेवाला 10 महीनों के भीतर दूसरी बार चुनाव हारे हैं। जनवरी में जींद उपचुनाव में वे तीसरे नंबर पर रहे तो अब कैथल की विधायकी हाथ ​से निकल गई है। चुनावी मैदान में उनका ग्राफ कॉन्ग्रेस प्रवक्ता बनने के बाद से गिरा है। यह जिम्मेदारी दिसंबर 2017 में पार्टी का अध्यक्ष बनते ही राहुल गॉंधी ने उन्हें थमाई थी। पार्टी के कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट का मुखिया भी बनाया। लेकिन, इससे सुरजेवाला की वो जमीन ही गायब हो गई जिसकी वजह से वे राहुल की नजरों में चढ़े थे। जिससे राहुल के करीबी होने का सुख मिला था।

सुरजेवाला को राजनीति विरासत में मिली है। पिता शमशेर सिंह सुरजेवाला हरियाणा में मंत्री और कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। इसलिए, उन्होंने राजनीति के गुर तेजी से सीखे। 17 साल की उम्र में रणदीप हरियाणा प्रदेश युवा कॉन्ग्रेस के महासचिव बन गए थे। 21 की उम्र में बतौर वकील प्रैक्टिस शुरू की। 1987 से 1990 के बीच पिता के साथ रह सांगठनिक काम सीखा, जो उस समय हरियाणा कॉन्ग्रेस के मुखिया थे। मार्च 2000 में वे युवक कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। इस पद पर पहुॅंचने वाले वे हरियाणा से पहले शख्स थे। वे फरवरी 2005 तक युवक कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे। यह इसके इतिहास का सबसे लंबा कार्यकाल है।

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दिसंबर 2004 में रणदीप सुरजेवाला हरियाणा कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने 67 सीटें हासिल कर राज्य की सत्ता में वापसी की। इसके बाद सुरजेवाला भी करीब 10 साल तक हुड्डा के कैबिनेट में बने रहे। 2014 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की करारी शिकस्त के बावजूद सुरजेवाला नहीं हारे।

राष्ट्रीय स्तर पर सुरजेवाला को सुर्खी 1996 और 2005 के हरियाणा विधानसभा चुनाव से मिली। दोनों बार उन्होंने ओम प्रकाश चौटाला को पटखनी दी। दिलचस्प ये है कि दोनों बार चौटाला बतौर मुख्यमंत्री चुनाव लड़ रहे थे। इन्हीं नतीजों की वजह से उन्होंने जाइंट किलर के तौर पर सुर्खियॉं बटोरी और राजनीतिक विश्लेषक उनमें भविष्य का सीएम देखने लगे। ऐसे में राहुल गॉंधी ने जब उन्हें अपनी टीम में शामिल किया तो माना गया कि हरियाणा कॉन्ग्रेस के वे ही भविष्य हैं। लेकिन, समय का पहिया ऐसा घूमा कि इस बार सुरजेवाला उस कैथल से हार गए, जिस सीट पर 2005 से ही उनके परिवार का कब्जा था।

रणदीप सुरजेवाला अक्सर बताया करते हैं कि कैसे राजीव गॉंधी ने उनकी जान बचाई थी। बकौल सुरजेवाला- एक बार वे हैपेटाइटिस बी के चलते कोमा जैसी स्थिति में पहुँच गए थे। पीजीआई चंडीगढ़ के डॉक्टरों को एक इंजेक्शन की जरूरत थी जो उस समय इंग्लैड में ही मिलता था। ऐसे वक्त में राजीव गॉंधी ने अपने एक पायलट दोस्त से बात की और इंग्लैंड से इंजेक्शन मॅंगाया गया। सो, इस बात की उम्मीद रखनी भी नहीं चाहिए कि सौम्य और मृदुभाषी सुरजेवाला कभी उस टीस को बयॉं करेंगे जो उन्होंने राहुल गॉंधी की नजदीकियों से हासिल किया। भले ही वे चुप रहें, लेकिन सोशल मीडिया में ऐसी प्रतिक्रियाओं की भरमार है, जिनमें कहा गया है कि महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव से राहुल गॉंधी के दूर रहने के कारण ही कॉन्ग्रेस की स्थिति थोड़ी बेहतर हुई है। अब देखना है कि सुरजेवाला अपनी मुक्ति का मार्ग कैसे तलाशते हैं!

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