मोदी, शाह और भाजपा के 300+: कहाँ रहे सही और कहाँ हुई चूक

इस लेख में हम उन बिंदुओं पर बात करेंगें जिसके कारण चुनाव प्रचार में भाजपा सरकार को फायदा पहुँचा लेकिन छोटी-छोटी गलतियों के कारण विपक्ष ने उन्हें आड़े हाथों लिया।

2014 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आने वाली मोदी सरकार ने 2019 में भी पूरा दम-खम झोंक दिया है। ताज़ा आए एग्जिट पोल्स (10 में से 9) के रुझानों से प्रतीत होता है कि भाजपा पूर्ण बहुमत से एक बार फिर NDA की सरकार बनाने में सक्षम होगी।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के मुताबिक 2019 में उनके पास 11 करोड़ कार्यकर्ता हैं जो पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। हर ओर प्रधानमंत्री मोदी का प्रभाव देखने को मिल रहा है। शहर के एलिट क्लास से लेकर गाँव का पिछड़ा वर्ग भी मौक़ा मिलने पर मोदी सरकार के गुणगान करने से नहीं चूक रहा है। लेकिन, बावजूद इन सबके विपक्ष इन कोशिशों में जुटा हुआ है कि जनता के बीच भाजपा की कमियों और चूक को गिनवा कर उन्हें सत्ता से हटाया जाए ताकि देश में दोबारा से भ्रष्टाचार, घोटालों की राजनीति कायम हो सके।

हालाँकि, इस बात में दो-राय नहीं है कि किसी भी राजनैतिक पार्टी का दामन पूर्ण रूप से साफ़ नहीं होता है क्योंकि पार्टी से जुड़े लोग और नेता ही उसकी साख बनाने या बिगाड़ने का काम करते हैं। अब जैसे कॉन्ग्रेस पार्टी में सैम पित्रौदा और मणिशंकर अय्यर जैसे नेताओं के बयान पार्टी की गति के लिए स्पीड ब्रेकर का काम कर रहे हैं, वैसे ही भाजपा में भी दिग्गज़ नेताओं और नामी चेहरों की ओर से ऐसे बयान आए हैं जिन्होंने विपक्ष को मोदी सरकार पर उंगली उठाने का मौक़ा दिया है। इस लेख में हम उन बिंदुओं पर बात करेंगें जिसके कारण चुनाव प्रचार में भाजपा सरकार को फायदा पहुँचा लेकिन छोटी-छोटी गलतियों के कारण विपक्ष ने उन्हें आड़े हाथों लिया।

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शुरुआत उन कार्यों को गिनाने से करते हैं जिनका जिक्र प्रचार में भी हुआ है और जिनके कारण पूरा देश और साथ में मोदी सरकार भी इस बात को लेकर निश्चिंत है कि 2019 में दोबारा से भाजपा ही सत्ता में आएगी।

अखबार में छपने वाली योजनाओं को मोदी सरकार ने कार्यन्वित किया

2014 में शुरू हुआ मोदीकाल ऐतिहासिक है इस बात में कोई संशय नहीं है। 2016 में हुई नोटबंदी की आलोचनाएँ भले ही मोदी सरकार ने एक निश्चित तबके और गिरोह के लोगों के कारण झेलीं लेकिन हकीकत यही है कि नोटबंदी के कारण देश ने कैशलेश स्थिति में खुद को डिजीटल रूप दिया। ये मोदी सरकार की डिजिटल इंडिया योजना का ही परिणाम है कि 2014-15 में जहाँ मात्र ₹316 करोड़ के ट्रान्जेक्शन हुए थे, वहीं 2017-2018 में यह आँकड़ा ₹2,071 करोड़ तक पहुँच गया।

आँकड़ों में आए इन उछालों को हम तकनीक का प्रभाव कहकर मोदी की कोशिशों को दरकिनार करने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन हम हकीकत को नहीं बदल सकते हैं। जो लोग सक्रिय होकर डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो शायद आज नहीं लेकिन कल इस बात को जरूर स्वीकारेंगे कि बिना मोदी सरकार द्वारा लिए इन बड़े फैसलों के मुरमुरे बेचने वाले व्यक्ति को कैशलेश पेमेंट की जरूरत समझाना असंभव था।

जिस बदलते भारत की तस्वीर हम कल्पना में सोचते थे उसे मोदी सरकार ने 5 सालों में हकीकत का चेहरा देने की कोशिश की है। उन योजनाओं को जमीनी स्तर पर कार्यान्वित किया गया जो सिर्फ़ अखबार में प्रचार का हिस्सा बनकर रह जाती थी। उज्जवला योजना ने जहाँ हर घर, हर रसोई में गैस सिलेंडर भेजा वहीं मेक इन इंडिया के कारण भारत ने अनेकों उपलब्धियाँ हासिल की।

सैमसंग जैसी प्रतिष्ठित मोबाइल कंपनी जो अभी तक केवल विदेशों में अपने मोबाइल सेट का निर्माण करती थी, उसने पहली बार इसी बीच भारत में अपने मोबाइल बनाने शुरू किए। नौकरी से ज्यादा इस दौरान लोगों ने व्यवसाय पर फोकस करना शुरू किया। युवाओं में छिपी प्रतिभाओं को कौशल योजना के तहत पहचाना गया। उन्हें अपना स्टार्ट अप शुरू करने के लिए प्रेरित किया गया। जन-धन योजना के जरिए हर तबके के लोगों के बैंक में खाते खुलवाए गए। आवास योजना की मदद से गरीब लोगों को छत मुहैया कराई गई।

राष्ट्रहित में मोदी सरकार की उपलब्धियाँ

सामाजिक उत्थान के अलावा मोदी सरकार ने राष्ट्रहित में अनेकों ऐसे फैसले लिए हैं जिनके कारण 2019 के लोकसभा चुनाव में भी 2014 वाली मोदी लहर बरकरार है। बालाकोट में एयरस्ट्राइक, उरी में सर्जिकल स्ट्राइक, अभिनंदन की वापसी, मसूद अजहर के वैश्विक आतंकी होने की घोषणा वो हालिया मुद्दे हैं जो शायद ही किसी के भीतर से मोदी के बतौर भावी प्रधानमंत्री होने पर सवाल उठाएँ।

ये मोदी सरकार की उपलब्धि ही है कि इन पाँच साल के कार्यकाल में सीमा के भीतर कोई बड़ी आतंकी घटना नहीं हुई हैं, और जो घटनाएँ हुई हैं उनका सेना ने मुँहतोड़ जवाब दिया है। पिछली सरकार के कार्यकाल में जहाँ सेना को आदेशों का इंतजार करना पड़ता था वहीं मोदी के कार्यकाल में सेना को हर रूप से मजबूती मिली। अमेरिका की असहमति के बावजूद भी मोदी काल में भारत एस-400 मिसाइल रूस से खरीदने वाला विश्व का तीसरा देश बना है।

नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे भगौड़ों को देश वापस लाकर सजा दिलाने के लिए हर मुमकिन कोशिशे की गईं। इसी काल में अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले के बिचौलिया मिशेल एंडरसन को पकड़कर देश लाया गया। रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने के लिए मोदी सरकार ने कड़े कदम उठाए। पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को मोदी काल में पहचान मिली और कई शरणार्थियों ने मोदी सरकार के कारण पहली बार भारत में मतदान किया। असम में AFSPA हटाने का फैसला 29 साल बाद लिया गया। अब तक शहंशाह की जिंदगी गुजारने वाले रॉबर्ट वाड्रा पर ईडी ने शिकंजा कसा। डोकलाम जैसा विवाद मोदी काल में ही सुलझा है।

इसके अलावा देश में अन्य करों को खत्म करके जीएसटी लागू हुआ जिसका देश भर में निश्चित गिरोह द्वारा विरोध हुआ लेकिन विरोध में उठे सुरों पर खुद सवाल निशान लगे जब मनमोहन सिंह ने जीएसटी काउंसिल के लिए खुद अरूण जेटली को सम्मानित किया। मोदी काल में बड़े-बड़े राजनेताओं पर लगे आरोपों पर गंभीरता से कार्रवाई हुई।

मोदी से पहले भारत के नेता इजराइल और फिलीस्तीन की यात्रा पर जाने से बचते रहे थे लेकिन मोदी ने इस हिचक को तोड़ा। वह इजराइल भी गए और उन्होंने फिलिस्तीन की यात्रा भी की। मोदी ने इन दोनों देशों की अलग-अलग यात्रा कर कूटनीतिक स्तर पर दोनों देशों से रिश्तों को नई गर्मजोशी दी।

मोदी सरकार ने वंचित सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया, जिसकी किसी और सरकार से उम्मीद भी असंभव थी। पीएम ने किसान योजना के जरिए किसानों को साल में 6000 देने का वादा किया, जिसकी पहली किस्त किसान तक पहुँच भी चुकी है।

इन सबके अलावा मोदी के खिलाफ़ विपक्ष द्वारा की गई ओछी बयानबाजी मे भी चुनाव प्रचार में मोदी को काफ़ी फायदा पहुँचा है। जनता ने मोदी के खिलाफ होती बयानबाजियों में विपक्ष का असली चेहरा देखा है। जनता ये जानती और समझती है कि 2019 में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के अलावा देश के पास कोई और विकल्प नहीं हैं।

प्रधानमंत्री पर हुई ओछी बयानबाजियों को पढ़ने के लिए आप इस आर्टिकल को पढ़ सकते हैं- ‘मर्यादा’ का भार सिर्फ मोदी पर ही क्यों… विपक्ष ‘शब्दों की गरिमा’ का अर्थ भूल गया है क्या?

चुनाव प्रचार में हुई गलतियाँ

बेवजह अली और बजरंगबली में उलझे योगी आदित्यनाथ– मुख्यमंत्री योगी द्वारा चुनाव प्रचार में ‘अली और बजरंगबली’ वाला बयान काफ़ी विवादस्पद रहा जिसके कारण इसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ा। योगी पार्टी का एक मुख्य चेहरा हैं, लेकिन उनकी ऐसी ही बयानबाजी के कारण उन पर 72 घंटे का बैन लगा। जिस समय का इस्तमाल वो पार्टी के समर्थन में कर सकते थे, उसमें उन्हें मौन धारण करना पड़ा।

मेनका गाँधी का मुस्लिम वोटर्स पर बयान– मेनका गाँधी को अपने बयान पर काफ़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था, इस दौरान उन्होंने अपनी जीत का दावा करते हुए कहा था कि जीत के बाद अगर मुसलमान उनके पास काम करवाने आता है तो उन्हें इस बारे में सोचना पड़ेगा।

उदितराज का पार्टी छोड़ना- भले ही उदितराज को पार्टी ने इन चुनावो में एक बेहतर विकल्प के रूप में न देखा हो लेकिन ये बात सच हैं कि दिल्ली में उदितराज एक निश्चित तबके का चेहरा थे। अगर पार्टी चाहती तो उन्हें पहले निष्कासित किया जा सकता था, लेकिन उदितराज का इस तरह कॉन्ग्रेस में शामिल हो जाना। भाजापा की चुनाव प्रचार में हुई गलती की तरह है।

हेमंत करकरे से लेकर गोडसे पर साध्वी प्रज्ञा के बयान– भाजपा ने भोपाल सीट पर दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ साध्वी प्रज्ञा को उतारकर एक बड़ा दाव खेला था, लेकिन साध्वी प्रज्ञा के विवादित बयानों के कारण भाजपा सरकार को विपक्ष आड़ों हाथ लेता रहा।

जिन्ना के पक्ष में भाजपा नेता के बोल- मध्य प्रदेश में बीजेपी प्रत्याशी गुमान सिंह डामोर ने भी विवादास्पद बयान दिया था जिससे भाजपा पर सवाल उठे थे। गुमान ने इस दौरान कहा था कि अगर स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने प्रधानमंत्री बनने की जिद्द न की होती तो इस देश का बँटवारा नहीं होता। मोहम्मद अली जिन्ना एक एडवोकेट और विद्वान व्यक्ति थे। गुमान के इस बयान पर सोशल मीडिया पर उनकी काफ़ी आलोचना हुई थी।

इसके अलावा 2018 में भाजपा की लगातार तीन राज्यों में हार भी इस बात को दर्शाती है कि कहीं न कहीं भाजपा के कार्यकर्ता मोदी की पनाह में अतिआत्मविश्वासी हो गए जिसका खामियाजा उन्हें तीन राज्यों को गवाकर चुकाना पड़ा। कई जगहों पर पार्टी ने उन उम्मीदवारों को टिकट दिया जिनसे स्थानीय लोगों को शिकायत थी। ऐसे उम्मीदवारों ने जनता के बीच अपने कार्यों को गिनाने की बजाए मोदी के नाम पर वोट माँगे। इस कारण से मोदी की छवि भी धूमिल हुई और पार्टी की साख पर भी सवाल उठे।

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